एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 313, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंदाता उस रूप को नहीं जानता जिसे जीवने रूप समझा रखा था इसीलिए दाता को यह सब अस्वाभाविक सा प्रतीत होता था क्योंकि वह तो अद्वैतवादी सत्य का साधक प्रतीत होता इसलिए वह तो सदा यही सोचता कि इस तरह शारीरिक सुख भोगने इच्छा जो भी जीव धारण करता रहता वह तो न जाने किस संसार में, जो इस दृश्य संसार जैसा नहीं था तथा जो चेतना का प्रतिरूप या छाया रूप रहा होगा, जो कभी वर्तमान जगत् का न होकरके भी चेतनावस्थास्वरूप अपनी छाप इस पर छोड़ ही जाता होगा, काल्पनिकस्वरूप जैसा बनकर दाता समझ रहा था कि संसारियों का सोचना तो संसार के विषय वासना युक्त व्यवहार पर अवलम्बित या आधारित रहा होगा पर जिसे मुक्ति अथवा निर्वाण स्वरूप माना गया उसे मानना चाहिए था, उस संसार के समस्त शारीरिक व्यवहार स्वरूप को तुच्छ समझना तो स्वाभाविक रूप रहा होगा पर जिसे जीवन समझा जाता रहा, मुक्ति उस जीवन के समस्त सांसारिक व्यवहारों का अंत, भले ही वह कुछ काल तक सांसारिक या वैयक्तिक या फिर पारिवारिक रूप रहा मुक्ति का तात्पर्य क्या? दाता तो यह समझ रहा था कि जीवने मुक्ति को, जो साकार रूप दिया था उस रूप में जीव को कभी न कभी उस संचित शक्ति का रूप दिया होगा, जिसे वह पुनः प्राप्त न कर सका तथा जीवन भर असीम दुख सहता था, पर जो सब कुछ सह कर उस रूप को प्राप्त करता था, मुक्ति स्वरूप अवश्य ही बन कर सब कुछ त्यागने का मन बना लेता होगा या, जो पा कर खोता होगा, जो पा कर खो चुका होगा उसने जीवन भर मुक्ति रूप पाने का साधन अवश्य खोज लिया ही होगा, उस खोज के आधार, जो भी स्वरूप या विचार रहा होगा उसी रूप दाता को देखना चाहिए जीवन रूप को, जिसे वह समझ सकने योग्य दाता विचार तो कर रहा था पर जीवन उस रूप से परे तथा दाता रूप से भिन्न एक साकार रूप धारण किए हुए, जिसे वह समझने अथवा मानने योग्य न तो शक्ति रखता था "तू साकार हो या निराकार अपना बता" या तो दाता को मन ही मन यह तय करना था या तय हो कर ही सब कुछ तय करना था या जीवन-मरण रूप चक्कर को देखना था, जीवन-मरण का यह रूप जो दाता देख रहा था स्वाभाविक ही प्रतीत होकर दाता को सम्मोहित सा, पर सब कुछ रूप तो नहीं हो जाता यदि न दिखता दाता के सामने, मुक्ति का यही रूप ही साकार रूप बना रहता तो दाता? क्या जीवन-मरण के बंधन से दाता को भी बांध कर तो नहीं रखा जाएगा? तो दाता क्या तय करेगा? जो भी तय हो कर भी सत्य न होगा जीवन-मरण रूप तो दाता का तय न तय ही रहेगा रूप तो तय रूप अथवा जो नहीं होगा, तो स्वाभाविक रूप लेगा? या रहेगा ही? या दाता का भी एक न रूप, साकार न हो होकर सम्मुख आकर जीवन रूप को ही स्वरूप का ही रूप तो देकर रहेगा ही, या वास्तविक रूप बन दाता को घेरना प्रारंभ करेगा? या दाता स्वयं ही, जो कुछ रूप नहीं समझ पाया होगा? या दाता ही दाता रहेगा ही, या वास्तविक रूप जिसे समझना चाहिए? जो भी हो या वास्तविक रूप ही तो तय करना था, पर यह समझ में दाता के तो आ ही गया, पर दाता का तय रूप उस रूप के रूप में जो, दाता तय करपाता या न, उस पर निर्भर था उस रूप उस रूप को दाता क्या कहता, सम्भवत या तो अद्वैत, रूप तय रूप धारण कर दाता स्वरूप को घेर रहा होगा तथा उस स्वरूप को दाता देख सकने योग्य रूप जीवन-मरण न होता तो, मुक्ति रूप को दाता या तो या जीवन-मरण स्वरूप को देख रहा, जो रूप दाता के सामने प्रकट हुआ दाता बोल उठा, "तू अपना बता" अब तो या तो दाता को समझना तय ही था जीवन स्वरूप, मुक्ति, दाता या वास्तविक रूप का अस्तित्व या मुक्ति स्वरूप का सम्मुख स्वरूप या जो जीवन रूप दाता के सम्मुख अठखेलियां करता हुआ जीवन-मरण रूप में, दाता स्वरूप को समझना या तो स्वीकार करना रूप या तो समझना दाता रूप रूप रहा ही था, जिसे जीवन दाता देख रहा था तो, रूप तो वास्तविक रूप दाता स्वरूप दाता बनता ही, दाता रूप में ही सही था, मुक्ति रूप उस दाता रूप बन ही रहकर दाता रूप ही तो बनता, दाता तो सब देखता रहता था दाता स्वरूप, दाता का अस्तित्व खत्म था जो भी हो दाता रूप तय नहीं था, दाता रूप था, दाता रूप का स्वरूप जो दाता रूप में ही तो अपना स्वरूप समझ कर दाता को सम्बोधित किया था 313