एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसमस्त विषय वासना, कामिनी कांचन सम्बन्धी वासना मनमें भरी हुईहै, हृदय भगवानके प्रेमसे शुन्य है, विमल निष्काम प्रेमरूपामृतकी बूंदका स्वाद तो आजतक कभी हम पाही नहीं सके सांसारिक भोगों रूपी मद्यको पीकर सदा मतवाले बने हुवे भोगों भोगते हुए चौबीसों घण्टोंमेंसे एक मिनटके लियेभी भगवान्का स्मरण नहीं; सब सुख और सामग्री ईश्वरने देकर दया का प्रकाश हमारे ऊपर किया, पर कृतघ्न होकर हम उसका स्मरण नहीं करते वरन दूसरोंको कष्ट पहुंचाते, ईश्वरके नियमका उल्लङ्घन कर दिन-रात पाप सञ्चय करते हैं। यह कौन कहसकेगा, कदाचित् कहसकेगा, कि परमात्मा दयालु नहीं है। ईश्वरपर दोषारोपण क्यों कियाजाय? जबतक कि सम्पूर्ण काम, कामना विषयों का त्याग नहोजावे, तब तक न तोपरमेश्वरका निष्काम सच्चा प्रेमही इस चित्तमें आवेगा, औरन दर्शन होसकतेहैं, केवल बातोंसे परमात्मा नहीं मिलसकते। इस विषयमें यह निश्चय समझना चाहिये कि जबतक इस मनमें विषय वासना रूपी कामरूपी-शत्रुहै, तबतक परमेश्वरका वास मनमें नहीं होसकेगा, यह बातभी हैकि जहां अन्धकार रहता है वहां प्रकाश कभी टिकनहीं सक्ता और जहां प्रकाश होताहै वहां अन्धकार टिकनहीं सक्ता। इस विषयमें किसी महात्माने बहुत सुन्दर दृष्टान्त दियाहै कि जबतक राजा सिंहासन पर बैठाहै औरमहाराजके सामने दासदासियां सब हाथबांधे हुवे खड़ेहैं राजा सिंहासन छोड़कर जब महलमें चलाजाता है तब सब दास दासी मनमानी चेष्टा करनेलगेहैं और राजाके सिंहासनपर भी बैठ जातेहैं परन्तु ज्योंही राजा, फिर महलमें से निकलकर आताहै राजाको आते देखकर सब दास दासियां हाथबांधे अपने २स्थानोंपर नम्र होकर खड़े होजातेहैं औरसिंहासनको खाली छोड़देतेहैं इसी प्रकार जबतक इस मन रूपी सिंहासनपर काम, क्रोधादि विकारों का राज्य रहताहै तबतक ईश्वर रूपी राजाका पदार्पण इस मनरूपी मन्दिरमें नहीं होता औरजब यह विकार दूर होजातेहैं, अन्तःकरण शुद्ध होकर ईश्वरकी झांकी इस मनरूपी मन्दिरमें होने लगती है; फिरतो काम क्रोधादि, न जाने कहां भागजातेहैं, और चित्त शान्त... हो जाताहै इसलिये कामरूपी विकारको सब पापों की मूल जड़ समझकर इस को मार भगावे--जिससे मनमें शान्ति मिले औरपरमात्मा के प्रेम रूपामृतका रस मिले औरपरमात्मा की प्राप्ति होकरसदाके लियेआनन्द प्राप्त होसके। सब सन्तों का यही उपदेशहै कि जबतक वासनाको नहीं छोड़ेगा तब तक कुछ नहींहोगा, केवल बकवाद करनेसे कुछ काम नहींहोता मनके फेरनेसेही सब बात बनसकतीहैं। वासना किसको कहते हैं? उत्तर, सांसारिक पदार्थों की, कामिनी कांचनकी चाहनाका नाम वासना कहलाता है? ईश्वरको निष्काम, अहैतुक प्रेमसे भजना, सांसारिक सुख सम्पत्तिके लिये भगवद्भजन का व्यापार न करना चाहिये क्यों? निष्काम-उपासना सर्वोत्तम कहीहै, सकाम-उपासना अल्पफलवाली होतीहै सकाम उपासना करने वालेको भी, भगवान्का दर्शन और प्रेमामृत नहीं प्राप्त होता यद्यपि ईश्वर को सब सुख सम्पत्ति देनेका सामर्थ्यहै पर ज्ञानी महात्मा ईश्वरसे नश्वर- पदार्थों की कभी चाह नहीं करते भगवान्की भक्ति केवल भगवान्के प्रेम के लियेही करनी चाहिये? नश्वर पदार्थों की चाहना भक्ति में विघ्नस्वरूपहै। ईश्वरके प्रेममें, नश्वर-पदार्थों की चाहना क्यों हो, अविद्यारूप अन्ध-कूप भोगविलासके लिये, नहीं जी, कदापि-नहीं? यदि यह कहोगे कि सब भोगों की, वासना का त्याग करें, केवल काम और मोक्ष विषय-वासना की चाहना रखें तोक्या कोई हानि वा दोषहोता है? उत्तर यह, यह दोनों कामनाएं वासना--की उत्पत्तिकरने वाली हैं इसलिये त्याज्य हैं, यह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली न हैं? शङ्का हुई, मुक्ति परमात्माका स्वरूप होनेसे सब दुखों की और पापों की निवृत्त करनेवाली और परम आनन्द रूप होनेसे मोक्ष की वासना बुरी क्यों मानी जातीहै कारण कि इस वासनासे तो पाप और नश्वर सुखों का त्याग होताहै तो मुक्ति इच्छाको पाप रूप त्यागयोग्य क्यों माना जाय और इससे ईश्वर प्राप्तिमें क्या विघ्नहै उत्तर यहकि जब चित्त शुद्ध निर्मलहुवा तो फिर मुक्ति की क्या आशा? स्वतःसिद्ध ही मुक्तिहोगी यह शङ्का क्या सिद्ध हुई? मुमुक्षुताका जब उदय होता है तब मुक्ति इच्छा होती है इससे सिद्ध हुवा कि मोक्ष विषयकवासना निष्काम दशाके लिये प्रतिबन्धकहै इसलिये मुक्ति इच्छा त्यागने योग्यहै निष्काम उपासकके केवल यह भाव रहे, परमात्मा को प्रेम रहे, आत्मसमर्पणका भाव सदा रहे, चाहे नरकमिले चाहे स्वर्ग रहे, जहां भी वास मिले वहांही भगवान्के चरणों का ध्यानलगावे, केवल निष्काम भक्ति चाहे इस दशा वाले महात्मा पुरुषका संसार में कुछ कर्त्तव्य शेष नहींरहता केवलभगवत् चिन्तनमात्र इनका स्वरूप होताहै, जब तक, ऐसा प्रेम ईश्वरके साथ नहोजावे तबतक कल्याण की सम्भावना नहींहो सक्ती इस वासना रूपी कीचड़ लगे अन्तःकरण में ईश्वर, प्रकट हो सकें, कदापि यह सम्भव नहींहो सक्ता हे प्यारे भ्राताओ! ईश्वरके भजनमें चित्त लगाओकि जिससे संसारका भय मिटकर आनन्द प्राप्त होवे ईश्वरके चरणोमें ऐसा अनन्य प्रेमभाव धारणकरो कि संसार का सब मोह छूट जाय औरपरमात्मा विश्राम-पद मिले॥ 33