भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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तब राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदर नामक योग्य मन्त्रिवरको साथ ले चक्रवर्तियोंके समान ठाठबाट बनाकर उस मनोरञ्जनाके विशाल महलमें गया सुदामनके, पास पहुँचा नृपतिराज। नृपको आते देख न मनोरञ्जनाके हृदयमें हर्ष हुआ नउमंग केवल शिष्टाचारके वशीभूत होकर वह नृपके साथ बैठ गई उस सिंहासन पर। महोदर मन्त्री तो अपनी कुटिलतानुसार ही यह चेष्टा करता ही रहा कि यह बात किसी प्रकार सुदामनके कानोंमें पहुँच जाय, जिससे उसका हृदय विदीर्ण होकर वह प्राणों को त्याग कर यमके दर्शन करे। परन्तु सुदामन तो नृपके आगमन पर भयभीत हुआ न हर्षित प्रत्युत उदासीन ही बना रहा। पर उस समय मनोरञ्जना सुदामन पर ही अपनी दृष्टि लगाये हुए थी। उस समय महोदरने राजा सुबाहु मन्त्री होकर भी चापलूसों जैसी बातें करते हुए सुदामनको लक्ष्यकर कहा कि महाराज यह तो बड़ा अनर्थ हुआ। इस साधारण पुरुषका क्या विचार चक्रवर्ती राजाके सदृश बैठना! सो इस समय ही, उचित दण्ड दिलाकर महोदय, इस धृष्ट मनुष्यको इस महलसे बाहर निकाल दिया जाय। यह सुन राजा सुबाहु मुस्कराते व बोले राजा सुबाहु बोले, "इस साधारण मनुष्यमें ऐसा कौन सा पराक्रम भरा हुआ है मन्त्री जी, जो इस समय बाहर न जाकर बैठा हुआ नितान्त प्रसन्न" राजा सुबाहु इतना कहकर सुदामन मणिकारकी ओर सम्बोधित कर तो यह बात कह गये किन्तु मन्त्री महोदर अपने कपटी विचारोंमें चूर होता हुआ कहने लगा कि राजन इस पुरुष का यह बड़ा भारी अपराध है। इस दुर्जनको तो मार ही डाला जाय। राजन् यह कैसा? क्या यह कोई कामी पुरुष? अथवा इसपर कोई भूत लगा हुआ जिससे भयभीत होकर बैठा है, या फिर यह कोई पागल पुरुष मनोरञ्जनाके इस विशाल महलमें बैठा हुआ है। राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदरके इस प्रकारके, कथनोंको सुन बोले? महोदरका यह वचन? सुनकर मनोरञ्जना तो जल भुनकर राख हो गई, फिर भी वह क्या कह सकती? अब तक सुदामन जो कुछ मौन होकर अवलोकन करता रहा उस समय राजाके सामने आकर वह बोल उठा। नृप सुबाहुके इस न्यायकी प्रशंसा करने लगा। मन्त्री महोदरकी कुटिल बातोंका उत्तर देते हुए कहा कि हे मन्त्रिवर तुम मुझे जैसा निर्बल मानकर अपमानित करते हुए कह रहे हो वैसा नहीं हूँ। मैं पापों के भयसे ही डरता हूँ। यदि मुझे पापका डर नहो तो तुम जैसे नीच मन्त्रीका मर्दन कर दूँ। बात ठीक ही कही है, कि जब तक पाप का उदय, रहता तभी तक हर कोई हर किसी पर भारी पड़ता है? इस संसारमें जो दुर्बलको दुःख देता रहता--है, वह मूर्ख, यह न--हीं सोचता कि इस दुर्बलका भी कोई रक्षक है। अरे भाई जब कोई भी रक्षक न हो तो धर्म ही उस समय उस दुर्बल का रक्षक, काम करता रहता है। राजा सुबाहुको तो कुछ दया आई पर मनोरञ्जना का सुदामन पर केवल भाव बढ़ा। अब यह सुदामन कुछ समय पर्यन्त ठहर कर उस स्थान से चल दिया। मनोरञ्जना अपने भवनमें पश्चात्ताप की आग में जलने लगी। उसके हृदयमें सुदामनके प्रति निष्कपट प्रेम उमड़ पड़ा। वह सोचने लगी कि, हाय मैंने निष्कपट सुदामन को कष्ट पहुँचा कर भारी पाप किया। अब मैं क्या करूँ? जिससे, इस पापसे मेरा उद्धार हो सके, सो इस समय केवल! ही यह बात रह गई कि जिससे सुदामनके साथ विवाह रचाकर मैं, इस कलंक को धोकर अपने जीवन को धन्य करूँ। केवल यही इसका एक उपाय हो सकता है। इधर राजा सुबाहु, भी अपने घर, गया ओर सुदामन भी चिन्ता का समुद्र सा होकर घर गया तो माता और पिताने उसका उदास मुख देखकर पूछा कि बेटा! तुम इस प्रकार भयभीत क्यों दिख रहे हो। तुम्हारे चेहरेका तेज क्यों नष्ट हो गया; सो बताओ, किस पापी दुर्जनने तुझे, किस बात के लिए दुःख दिया है? जो बात तुम्हारे हृदयमें भरी हुई, सो शीघ्र बताओ, जिस बात का हम उपाय, कर के तुम्हारा भय दूर किया जाय। माता पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सुदामन कुछ नहीं बोला, शान्त ही बना रहा किन्तु माता? पिता बारम्बार, यही पूछते रहे! तब वह केवल इतना ही कह सका कि चिन्ता छोड़ो माँ, अब क्या हो सकता इस संसारमें किसी का कोई नहीं है न कोई किसीका सहारा न ही सहायक हो सकता, बस इतना ही कह कर, वह शान्त होकर बैठ गया। सुदामनके मनमें इस समय जो बात लगन लगी सुदामन के मन रूपी घर में वास कर गयी वह बात तो केवल यही सोच रहा था कि किस समय इस शरीररूपी मटकी को फोड़ दूँ? क्या मणिकार सुदामन को वैराग्य प्राप्त हो गया या संसारमें सब कुछ स्वार्थ भरा जब रात का समय हुआ, सब लोग सुख चैन से सोये, उस समय यह वैरागी पुरुष, चुप चाप उठकर श्मशान भूमिकी ओर चल पड़ा, सो केवल वैराग्यके वशीभूत होकर। सोचने लगा, जिन बातोंके निमित्त सब झगड़ा है, उनका त्याग ही क्यों नकर दिया जाय? इस प्रकार वह घर, बार सब को छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर दिया तथा वह, एक वन में पहुँचकर, किसी वृक्षके नीचे बैठ कर, श्री जिनभगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर स्तुति पाठ किया। संसारके सब नश्वर मोह माया, ममता आदि बन्धनों को तोड़कर वह, श्री जिनेन्द्र देवका स्मरण कर कायोत्सर्ग ध्यान करने 37