भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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यद्यपि तपश्चर्याका फल अपने आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्तकरके कैवल्य पदका पाना ही था और इसी को पाकर वह सदा सर्वदा सुखीरहता व संसार चक्र, जो जन्म मरण का रूप था, उससे छूट कर अक्षय सुख को प्राप्त करता, तपश्चर्या का फल यही मोक्ष लक्ष्मी का पाना था तथापि यह, तपश्चरण करते समय जो आत्मस्वरूप को प्राप्त करने के लिये तप तप रहा था उसपर रीझ कर इन्द्र पद या अहमिन्द्र, अहमिन्द्रोंके देवलोकों का सुख भोगने लगता था। और जबतक कर्म का फल भोगता रहताथा तब तक संसारमें रहताथा तीसरे काल तक जब तक मनुष्य जीते थे तब तक, सुख ही ही भोग भोग कर या भोगों भोग कर समाप्त होते थे क्योंकि भोग भूमि के उन मनुष्यों को कर्म नहीं करना पड़ता था न विद्या की, न व्यापार आदि की चिन्ता थी न सेवा की और न शिल्प शास्त्र सीखनेकी चिन्ता थी न कृषी करने चिन्ता थी। वहां तो दस कल्प वृक्ष थे वही इन जीवों को सब मन वांछा सामग्री देकर ही सब प्रकार सुखी बना दिये रहते थे, चौथे काल के प्रारंभ में जब भोग भूमि मिटी, कर्म युग प्रारम्भ हुआ। जीवों को खाने पीने की चिन्ता हुई तो राजाओं, के भी राजा श्रीऋषभ भगवान् सब जीवों को असि, मसि और कृषि करना सिखाने का उप उपदेश दिया। इसके पीछे, प्रजाने नियम रूप एक एक का आदर सत्कार कर जो आज्ञा अपनी भलाई केलिये निकाली, मान-कषाय विहीन होकर सिरपर धारण किया, प्रजाने नियम के विरुद्ध चलने वालेको, अपने कुटुम्बियोंतक को सब तरहका दण्डदिया, बात ऐसी फैल गई थी कि एक बार 'हा', कह देनेपर ही वह अपने किये पापको हृदय में धारण कर लेता था किसीको केवल इतना ही दण्ड था, इसके आगे कुछ नहीं समय पाकरके यह सब आदर सत्कार या नियम का रूप बदल तो गया नहीं, परंतु नियम भंग करने पर मार पीट अथवा फाँसी तकका दण्ड दिया जानेलगा या कारागार का दण्ड था इस तरह का सब राजा प्रजाके सुधारके लिये करते थे। उस समयके सब ही बड़े बड़े मनुष्य, जो कि सब बातों को व नियम प्रजाको सिरपर रख कर करने का उपदेश देते थे उन सबने नियम व न्याय की रक्षाके व नियमों, को पालने वाले सदा व नियमों पर ही आश्रित रहने वाले महा भाग जीव कहलाये। समय का चक्र फिरा, यह बात भी, उस ही प्रकार बदली, प्रजाके इन नियमों संबंधी नियमों का पालनकर्ता राजा रूप एक ही का नियम या अधिकार रहा, जो कि मनमानी प्रजासे, जो न्यायसंगत नियम चले आ रहेथे उनका उलटाकर अपने स्वार्थके अर्थ काममें ली, और सब तरह का न्याय प्रजापालक का जो काम था? केवल यही कि अपनी रक्षा अपने हाथ से? दूसरेसे जो कुछ नुकसान हो तो उस का बदला वह अपनी ताकत लगाकर प्रजा को ही ले--लेना था जिसे सब जन ही सब उपाय से कर ही सकते थे, प्रजाके उस जन, प्रजाके ही जन-- समुदाय का जो सम्मत धर्म अथवा न्याय के अनुकूल बना हुआ नियम था जो धर्मका, अपने कर्तव्य पालन सम्बंधी सम्मत-नियमों बना या हुआ, वह सब अपनी ताकत और अधिकार के बलपर चूर चूर कर या बदलकर रख दी, सब ही प्रकार प्रजाके विचार को बंद करके यह कहा गया जिसका कि सब धर्म सम्मत प्रजाके अधिकारोंका नाश करना मात्र ही तन-मन रूप काम रहा, कि प्रजा तो सर्वसाधारण जन केवल राजा प्रजाके पालनेवाले को ही तो सब प्रकार व सर्वथा रूप से सब कुछ करने काअधिकारी? उस समय केवल यह, केवल एक व्यक्ति को सब तरह का अधिकार प्रजाके सम्बन्धी-सम्बन्धों सम्बन्धी बातों का सौंप दिया कि राजा चाहे जो कुछ भी न्याय विरुद्ध आज्ञा देवे या आज्ञा निकालेगा, वह सब प्रजाको शिरोधार्य करनी ही होगी चाहे उस आज्ञासे प्रजा व उस प्रजाका भलाईके बदले नुकसान और हानि भी क्यों न हो, ऐसा केवल अज्ञानता फैलाने वाले लोगोंने राजा तथा राजाके इन सब को सिखा दिया था, जिससे सब प्रजाको यह! डर हो जाताथाकि धर्म का लोप करनेपर जो भी किया जावेगा उचित होगा राजा प्रजाके इन सब धर्म न्याय सम्मत नियमों तथा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, उस स्वामित्त्व तथा अधिकारों को जो प्रजाके ही पास परम्परागतसे चले आ रहेथे राजा तन-मन धन का स्वामित्त्व छीन के, सब ही अधिकार को अपने आधीन किया? क्या यह छल--कपट छल कपटकर जो प्रजाके पास धन या स्वतंत्रता आदि सब कुछ था उसका-- हरण ही सब प्रकार प्रजा का तन मन धनका अपव्यय करना नहीं कहलावेगा? हाँ, स्वार्थान्ध जन सब ही युग तथा काल में न्याय के स्थान में अन्याय का काम ही करते चले आये हैं, चाहे वह कोई भी हो, सब ही अपने को इसी तरह का शिकार बना ही लेतेहैं, बात ऐसी दशा में केवल यही ही हो सकती है; जिसे इस प्रकार की बात अथवा ज्ञान अपने आत्मामें सम्भवित रहा, वह ही इससे बचेगा? जो इस पर सब ओर, हर एक दिशा ध्यान दे सकता होगा तन-मन धनको बचा सकेगा जिसे यह ज्ञान, सब ही प्रकार व प्रकार! सर्वथा सम्भवित होगा वहीही, इस व 77