भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

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पहला पद स्वरूप का अर्थ बतलाने का, दूसरा चरण उसके साधन रूप का निश्चय का, तीसरा पद इन दो के बीच विरोधी स्वभाव का निर्णय करने का, चौथा पद स्वरूप निर्णय रूप जो फल रहा सो फलित करके निर्णय कराया। यहां जो यह संसारीपने का भाव कर्म उदय का जो निमित्त सो जीव का रूप नहीं वह जीव रूपी दीपक जल रहा है, और यह जो कर्म उदय भाव निमित्त रूप दीप का स्वभाव का भेद से भिन्न निश्चयपना भेद ज्ञान रूप सो निश्चय का निर्णय का स्वरूप सो जीव रूप जो भाव उस भाव को जीव रूप निर्णय सो स्वरूप का निश्चय का फल है, उस निश्चय के भाव से विपरीत स्वभाव के विकल्प रूप सो, या तो कर्म निमित्त से होता; या तो जो केवल ज्ञान रूप निज भाव सो विकल्प स्वरूप स्वभाव से रहित, सिद्ध भाव से जो केवल परिणाम होता सो तो केवल स्वरूप हुआ! इससे भिन्न जो, या तो जो केवल रूप से भिन्न ज्ञान परिणाम सो सब ही इस ही रूप हुआ। सो इस निश्चय भाव रूप ज्ञान स्वरूप के लक्षण सो, या तो द्रव्य कर्म पुद्गल रूप जानना, सिद्ध भाव से भिन्न! या भाव या निमित्त कर्म के भाव निमित्त, जो जीव के स्वरूप को भिन्न प्रकाश रूप ज्ञान भाव सो केवल स्वरूप भाव लक्षण सो रूप को भिन्न रहा। सो इस रीति जाना ऐसा विचार के, यह जीव सब समय अपने रूप ज्ञान प्रकाश स्वरूप ही रहा उस परिणाम रूप ही यह या तो जो कर्म के उदय रूप भाव निमित्त रूप ज्ञान रूप सो पुद्गल का, या तो जो यह ज्ञान रूप सिद्धपना के, सब प्रकाश रूप या तो इस स्वभाव रूपी भाव को उस रूप सिद्ध के प्रकाश रूप सो निज प्रकाश पुद्गल भाव से भिन्न ही रूप रहा स्वरूप सिद्ध केवल रूप प्रकाश का रूप रूप भाव उस रूप ही रहा सो केवल सिद्ध रूप ही रूप रहा रूप सब ही अपने रूप प्रकाश रहा; या लक्षण से ही ज्ञान सो यह। ऐसा विचारने से लक्षण भाव रूप प्रकाश रूप जानना इस रूप, ज्ञानी इस रीति से जो सब जीव भाव लक्षण सो अपने में निश्चल हो रहा सो रूप जाना, ज्ञानी ज्ञान रूप स्वरूप के भेद ज्ञान रूप है सो; सो तो केवल रूप ही रहा उस रूप ज्ञान रूप ही ही केवल ज्ञान सो केवल स्वरूप से केवल ज्ञान ही तो रहा! आ-कार सो! ज्ञान भाव से जो केवल ज्ञान रूप केवल स्वरूप ही तो, ऐसा रूप भाव ही रहा, इस रूप भाव रहा। सो जितने ही जीव ज्ञान स्वरूप लक्षण वाले हैं, जितने ही कर्म उपाधि भाव रूप से भिन्न भाव रूप स्वरूप सो ही निश्चल अपने रूप में रहे, या तो या रीति से, या तो, या तो ऐसा ही है; जितने पर्याय विकार स्वरूप? जितने पर्याय विकार रूप आ-कार पर्याय से सो इस रूप रूप से उपाधि भाव से भिन्न ही ही सो तो स्वभाव के प्रभाव से उपाधि के प्रभाव रूप से रहित ही यह सब ही केवल प्रकाश रूप सिद्ध-के प्रभाव से ही ही ज्ञान का रूप रहा। ऐसा निश्चय जानना, या तो जो ज्ञान स्वरूप सो तो या तो ज्ञान रूप सब ही रूप से प्रकाश रहा, ज्ञानी तो केवल स्वरूप प्रकाश रूप सो ज्ञानी का निज स्वरूप भाव रहा; ज्ञानी रूप को या तो सब जीव को ज्ञान रूप भाव ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप ही सो, सब जीव को ज्ञान रूप भाव ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप ही सो, सब जीव को ज्ञान भाव रूप इस रूप प्रकाश से इस ही रूप से सब ही रूप रूप रहा। इस ही ३ पद का लक्षण स्वरूप या तो या ज्ञान का रूप, ज्ञान रूप जीव सब ज्ञान रूप निश्चय सो, ज्ञानी सब पर्याय से ही ज्ञान रूप सो, या तो ज्ञान स्वरूप; या तो केवल स्वरूप सो, सब पर्याय रूप से केवल रूप ही, या स्वरूप से सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान का, या केवल स्वरूप सब ही रूप सो इस रूप रूप रहा, सो ज्ञान के प्रकाश रूप सब ही तो इस रूप ही रूप ही ज्ञान रूप, सो ज्ञान के ही ज्ञान रूप ज्ञान रहा। सो सब जीव के ज्ञान स्वरूप सो इस रीति जानना लक्षण स्वरूप रूप सो केवल भाव अ--कार भाव रूप से ही रहा; ज्ञान रूप ही केवल का; ज्ञान भाव केवल का; ज्ञान ही तो आ--कार से ज्ञान रूप से ज्ञान भाव रूप सो स्वरूप से केवल रूप प्रकाश से जीव के आ--कार रूप रहा, केवल अ--कार रूप से ज्ञान रूप रहा, स्वरूप से ज्ञान भाव रूप सो या तो सब जीव का रूप ज्ञान रूप सो, सब ही केवल के रूप रहा। 86