भारतकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 322 में से

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विचार करके यदि मन शांत नहीं हुआ, तो यह समझ लो अभी तक हम सब कुछ केवल सुनते आये या बोलते आये या विचार करते रहे पर क्रिया में परिणत नहीं किया। शान्ति का सीधा सीधा मार्ग है? शान्ति का सीधा है, जो समस्त जड़ या चेतन का स्वामी है उस पर सब कुछ न्योछावर कर दिया जाय। केवल उसी का आश्रय हो उसी की ही एक शरण हमारी गति हो, स्वामी वही, हमारी ममता का पद, केवल वही सर्व। दूसरा उपाय सुनो, जब तक यह देह रहे तबतक सदा साधन रूप होकर रहो अर्थात् साधन करो। उपासना रूप जो विचार है साधन में यह सब कुछ प्रभुमय ही इस बात सदा स्मरण रखकर आ-भाव आत्मानुसन्धान आ-त्म रूप का ही ध्यान, आत्मस्मरण स्मरणस्वरूप होकर नित्यमुक्त निरन्तर साक्षी रूप से वर्तमानता अनुभव करो कि समस्त, मन का संकल्प-विकल्पात्मक जाल जो यह हो रहा इसका प्रकाशक ही सब कुछ का ही आधार, यह सब जड़ का ही रूप सत्य से ही भासित, सत्य तो रूप सदा ही सब उपाधिक प्रपंच रहित सत्य ज्ञान स्वरूप आनन्द ही स्वरूप है। यह समस्त ही संकल्प रूप अधिष्ठान स्वरूप सत्य के अधिष्ठान से, सच को सच का रूप--है तो दृश्य दृश्य--ही का रूप! इस बात को भली का से हम अनुभवयुक्त हो कर सदा अनुभूतवान् आत्मानुभूति साक्षात्कार रूप से सर्वव्यापक होकर ही हर समय विद्यमान हो विचरण कर सब प्रकार द्वैत स्वरूप द्वन्द्व रूप संताप विकारों द्वारों से परे होकर, नित्य, मुक्त स्वरूप परब्रह्म पर-स्वरूप होकर सर्व संकल्पों से परे जो आनन्दित हो इस बात का निश्चय कर नित्य सिद्ध होकर, शान्ति रूपी महा सागर होकर सदा काल ही स्वरूप रूप-सहज स्वरूप का यथार्थ अनुभव युक्त होकर ही सब का सार संग्रह कर, इस प्रकार सिद्ध साधन इन दोनों सिद्धान्तों का मन सब बात त्याग कर सार, दोनों का सार केवल यह जानना मात्र त्याग का स्वरूप ही जानना रूप पर सब बात त्याग का ही स्वरूप जान सार सिद्ध आत्म--साक्षात्कार समदर्शी, समचित्त, सब बात सब रूप--रस सब में एक रस आनन्दमय सिद्ध सदा रूप से सब का ही स्वरूप का निश्चय करके सदा रूप से स्थित रहो, इस प्रकार, दोनों का भाव एक ही जान, अपने यथार्थ स्वरूप स्थिति को प्राप्त करो, सब कुछ सब में केवल व एक--रूप ही! बाहर भीतर सब ही समरस, केवल सब ही सब रूप ही व्याप; विचार मात्र से सिद्ध सब है; जो जानन में, सब केवल ही जानने रूप सब ही व केवल जानने स्वरूप स्वयं सिद्ध को सदा स्वरूप से सिद्ध; निराकार ही ज्ञान का स्वरूप यह सिद्ध रूप से सब स्वरूप ही स्वरूप? फिर शान्त का कैसा? उस स्थिति तक कौन गया? केवल सार को ही लो! त्याग नाम सब का, चिन्ता-कामना का, सब संकल्पों सार का त्याग ही! केवल मन का त्याग ही सब रूप का त्याग व सार, सब त्याग! केवल त्याग रूप मन ही सार, मन त्याग ही केवल स्वरूप का ही सब सार सार? सच सुनो आत्मस्वरूप सदा ही सब उपासना साधन का सार साधन के अभ्यास का त्याग व स्वरूप ही का ज्ञान केवल स्वरूप ही है! मन का ही ध्यान हो... जो ज्ञान हो... ! केवल ही विचार स्वरूप, जो जैसा विचार रहा सो वैसा त्याग का रूप, केवल मन रूपी ज्ञान रूप चित्त सार, मन की चिन्ता त्याग कर केवल सिद्ध ही सब रूप स्वतः निष्काम हो ही जाता ही जाता! जो स्वरूप त्याग रूप सिद्ध ही विचार का रूप, केवल ही त्याग सब त्याग का ही त्याग बिना सब संकल्पविकल्प का त्याग हो ही जाता सिद्ध स्वरूप से सब त्याग सब त्याग का स्वरूप स्वतः स्थित जो सब बात का निश्चय सार है? जिस रूप विचार है; जैसा सब अस्ति रूप का ही रूप में विचार सब का ही स्वतः सार त्याग रूप ही हो ही रहा है, जो सब रूप से त्याग ही त्याग है, सो ही सब त्याग ही त्याग स्वरूप है, जो त्याग स्वरूप स्थिति आनन्द रूप ही इस प्रकार स्वरूप ज्ञान रूप से व्यापक सब सब रूप ही सब का ही त्याग स्वरूप, केवल सब रूप त्याग ही त्याग केवल एक आत्म-तत्त्व स्वरूप सब ही त्याग सब ही त्याग का सार सब रूप, जो सब रूप सब त्याग त्याग रूप सब रूप त्याग त्याग का ही है! त्याग सिद्ध ही सार, त्याग ही सिद्ध सब सार सदा शांत ही रहो! जो सब दृश्य सब रूप से शांत रूप सब का, सो सदा ही स्वरूप का रूप ही सब रूप में सत्य... व सब स्वरूप का रूप ही चिन्मय ही सिद्ध रूप से स्वरूप है, सो सदा ही चिन्मय रूप चिन्मय चिन्मयता सब ही का रूप, इस प्रकार रहो? सब कल्याणमय... ॐ 91

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