एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 322 में से
संदर्भ में पढ़ेंविचार कहाँ तक करें? जीव का संसार भी अनादि ही रहा ही इसलिए पर से भिन्न स्वयं की खबर ही कहाँ थी जो भेद ज्ञान, वैराग्य आदि बातें सोचता विचारता ही कभी नहीं फिर जब कभी समागम मिला भोग ही तो चाहा, पर स्वयं का भला किस में है यह तो ही नहीं देखा सदा पर को ही-ही देखा और पर को दुख देने से खुद न तो भगवान् बना कभी किसी, तो दुःखी जरूर बनाया ही रहा ही खुद को सदा ही कष्ट में, तो विषय रस का फल है दुःख, ही दुःख। वो ऐसा भाव करो, "मुझे पर द्रव्यों का त्याग कभी नहीं करना" सब कुछ जानो, समझो अपने ही स्वरूप को जानने का अभ्यास हो, तब स्वभाव व्यक्त रूप होकर स्वयं प्रकाश रूप प्रकट होता रहे, परिणाम निर्मल बने सब पर से मोह छूटे और तब ही स्वाध्याय सार्थक होगा ही, भव्य जीव ध्यान देकर सब को सुनो और समझकर फिर आचरण स्वाध्याय का आचरण करना ही त्याग का भाव मत करो मोह को बस छोड़ो ही आत्मा को ध्या, मोह छोड़ भगवान् सुख प्राप्त कीजिए। जिसका सब ज्ञेयाकार ज्ञान स्वयं रूप से, ज्ञान रूपी समुद्र ज्ञान का, ज्ञान रूपी अमृत है! ऐसा ज्ञेय भगवान् का ध्यान करो भव्य जीव जो भवो, भवों तक भव भोग का फल तो पा ही रहा तब तक तो भगवान् के ही रस को रस न मन में लिया केवल अज्ञान रस को ही तो रस मान रहा, पर अब तो रस ऐसा लो ज्ञान रस जिसका कभी अभाव न, त्याग तो उस रस को कभी नहीं करो, जिसका रस ज्ञान रूपी अमृत भरा ही रस रहा है आत्मा ज्ञान रस का सागर, जिसका स्वाद ही भिन्न रस का रस ऐसा ही सब करो, "मुझे तो स्वरूप रस कभी नहीं छोड़ना भव्य जो सब स्वाध्याय का फल यही पाना बस" पर स्वाध्याय का ही अर्थ ही विचार आचरण आत्मा स्वरूप होना, वो स्वरूप में बस ध्यान लगाओ बस, वो समय पर स्वयं प्रकट हो कर सहज रूपी ज्ञान, वो पर भगवान् के स्वाध्याय का स्वाध्याय रूपी फल सब को स्वाध्याय का ज्ञान ही सब भव्य जीवों को स्वाध्याय के ही फल सो ही स्वाध्याय से ही आत्मा का स्वरूप ज्ञान प्रकट हो सकता ही सकता है, तो ऐसा स्वाध्याय! पर ही स्वाध्याय से ही स्वरूप प्रकाश हो सकता आचरण रूप हो कर ज्ञान करो ही, भव्यो आत्मा स्वाध्याय से भव्य मोक्ष सुख सब ही पावेगा ही, आत्मा को ज्ञान रूपी मन से ज्ञान ही स्वाध्याय ज्ञान रूप सदा ही पर को त्याग कर ज्ञान को ही अपनाओ तब ही ज्ञान का आदर स्वाध्याय का रस ज्ञान सागर ही पाओ, सदा रोम-रोम में ज्ञान प्रकाश ज्ञान सब का प्रकाशक हे, त्याग तो स्वरूप के स्वरूप ज्ञान रूप को त्याग ना करो जी, रोम-रोम रस का वासी, आत्मा ज्ञान स्वाध्याय रूप ही स्वाध्याय स्वरूप सुखमय बनो स्वरूप का त्याग ना, पर सब स्वाध्याय का ज्ञान करो सब स्वरूप ज्ञान ही हो सो भव्य स्वाध्याय, सब भव्य जीव सब भव्य त्याग स्वाध्याय रूप स्वाध्याय है? भव्य, स्वाध्याय, करो भव्यो, भव्य ही सब ज्ञायक स्वरूप रहो, सदा ऐसा भव्य भाव हो! भव्य तो सब रोम-रोम बस रहो, ज्ञान धारा सदा रोम रोम रोम-रोम का प्रकाश रूप स्वाध्याय सब हे आत्मा, त्याग स्वाध्याय तो कभी स्वाध्याय त्याग मत करो हे आत्मा त्याग रूपी स्वभाव को सदा आचरण करो ही तो भव्य आत्मा हो, वो हे भगवान् स्वाध्याय रूप स्वाध्याय स्वरूप वो ऐसा भाव करो जो पर से ही स्वाध्याय का फल सदा पाओ जी, वो ही त्याग सब पर द्रव्य-पर्यायों से, पर त्याग स्वरूप, स्वरूप ज्ञान "पर का तो त्याग हो सके स्वरूप का ना हो सके या त्याग कभी मत" स्वाध्याय आत्मा का फल, त्याग तो स्वरूप न स्वाध्याय पाओगे, भव्यो, स्वाध्याय, सब भव्य को त्याग न करो स्वरूप ज्ञायक स्वरूप हो स्वाध्याय स्वरूप--हो, स्वाध्याय! सब तो स्वरूप का त्याग ना, सब स्वाध्याय स्वरूप स्वरूप स्वाध्याय स्वाध्याय सब सब ज्ञान ही तो ज्ञान स्वरूप, बस ही त्याग स्वरूप... ॥ भव्य स्वाध्याय का तो फल ऐसा रोम-रोम सदा ही तो रस पाओगे रूप ही पर ज्ञान सब आत्मा स्वरूप का भाव सदा ज्ञान ही तो स्वरूप ज्ञान का, ज्ञान ही सदा ज्ञान का रस ही त्याग ना करो सदा ज्ञान रस रहो जी, स्वाध्याय 95