क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान् की सेवा का प्रभाव यह हुआ कि सब प्रकार की आपत्तियां-विपत्तियां, क्लेश-कष्ट, दारिद्र्य अभाव-प्रमाद का नाम तक नष्ट होकर घर वैभवशाली बन गया और सब सुख से रहने लगे और समय पर सदानन्दजी सुख पूर्वक काल बिता कर इस लोक का परित्याग कर श्री शंकर लोक चले गये : ‘सब का कल्याण होगा!’ ‘सब का कल्याण होगा!’ ‘सब का कल्याण होगा!’ यह समाचार भगवान् की कृपा प्रभाव से, महाराजा युधिष्ठिर को मालूम हो गया उन्होंने भी समय पाकर यह सोचा ‘हे नाथ, आपने तो सदानन्दजी का उद्धार किया?’ प्रभु कृपा करो; महाराजा धर्म राज मन मन में नित्य ही ध्यान धरा करते थे तथापि वे स्वयं न बोले, न किसी रूप में दर्शन दिया और प्रभु प्रेम का स्वरूप भी ऐसा ही संतों ने वर्णन कर के प्रत्यक्ष किया प्रभु सदाशिव भक्त वत्सल दयालु कृपालु जब सब प्रकार परीक्षा समाप्त करके भक्त ऊपर सब कृपा दृष्टि करते हैं तथा उन पर कोई असर नहीं रहता बल्कि उनका ऐसा स्वरूप हो परिणत होता, जिसको ही भक्तजन नित्य स्मरण करते, पर वैसा स्वरूप मिलना दुर्लभ है, सदानन्द जी भाग्यवान् तथा परम तपस्वी, जो कि सब का सब उस प्रभुमय होकर अन्त ध्यान बने : मंगल दाता, सुखद पद सुखद फल
047/ भगवान् तथा भक्त
इस प्रकार श्री व्यास सत्यवतीनन्दन पराशर जी महाराज युधिष्ठिर को सब का सब सुना कर- सविस्तार यह समझा कर आगे कहना आरम्भ किया कि, जो भगवान् को अपने ही अन्तर्यामी रूप तथा रूप में निष्काम-अन्तर्यामी दर्शन करके अपने प्रभु का नाम लेता, उस भगवान् कर- दर्शन पाकर अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता हुआ जो ‘ओ३म्’ का, अथवा किसी ऐसे नाम जप कर उस में लीन होना चाहता, न केवल यह ही प्रत्यक्ष कहा पर इस से भी महा-कठिन परीक्षा करके पूर्ण रूप से शरण होना पड़ता, जिसके न केवल शरीर का त्याग बल्कि हृदय का रूप तक भी भक्त का बदल जाता, सत्य स्वरूप हो जाता उसका रूप ही अपने स्वरूप जैसा भगवान् बना देते इस लिये, महा राज, आप मन लगा कर तन-मन-धन से ही भक्तराज बन कर सदा स्मरण कराया करो, जो कि सब का सब आपका यह राज समाज है! भगवान् तथा सत्य स्वरूप का स्मरणभजन ही केवल ‘सब बातों का फल है’ सब का तो भला हो पर स्वयं कल्याण का इच्छुक हो, कैसा काम? भला भी स्वयं करो सब को भी भला कहो सब प्रकार सेवा करके सन्तुष्ट रहना ही केवल का काम है? सन्तुष्ट होना कैसा होगा? सन्तुष्ट स्वरूप ही भगवान् का हो कर भक्त सन्तोष प्राप्त करेगा और सर्वस्व उस भगवान् पर वार देगा भगवान् का काम तो भक्त को सन्तोष रूपी अमृत देना ही रहा या फिर निर्विकल्प निर्विकार स्थिति का स्वरूप ही बना देना तथा सब तरह से ही सम्पूर्ण अभिलाषा त्याग कर जो केवल प्रभु शरण में न रहकर, केवल अपने भक्त स्वरूप को विस्तृत व्याख्यान रूप बनाकर प्रभु दर्शन चाहेगा कि, सब कार्य सर्व सुख के साधनयुक्त रूप न मिल जायगा तथा सब तरह से ही ऐसा, सब तरह निर्विकल्प स्वरूप बने केवल प्रेम ही प्राप्त हो भगवान् का दर्शन पा सकेनार्थाय मुक्ति- साधन का अभ्यासक्रम ही प्राप्त कर के सुख ले, वह सब न सब भगवान् का ही सन्तोष होगा जिस का परिणाम सब प्रकार स्वरूप से परमपद तथा मुक्ति फल-रूप भक्त रूपवान् हो सत्य स्वरूप बना कर भगवान् अपने धाम महा-वैकुण्ठ अथवा शिव जी के स्वरूप से मिला कर अपना स्वरूप देगा, भक्तजन को भगवान् का आशीर्वाद केवल मात्र यही ही वरदान का स्वरूप न होगा कि भक्त को संसार सागर तथा संसार के कल्याण का साधन रूप स्वरूप बनकर रहना ही पड़े तथा सब को भला ही भला सब प्रकार से सुख तथा शान्ति स्वरूपमयी स्थिति बनावे 31