क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिए व्यवहारनयका पक्ष त्याग कर इस शुद्धात्माका पक्ष या अनुभव-स्वरूप जो प्रत्यक्ष वा प्रसिद्ध आत्मा है उसको अंगीकार करो। इस बात को समझो, निर्णय को प्राप्त करो क्योंकि व्यवहार पक्ष तो आत्मा को परद्रव्य का, विकारी पर्यायों तथा देहादि रूप कहता है, निश्चय नयरूप जो पक्षपात उसका स्वरूप भी परद्रव्य रूप नहीं है, मात्र विकल्पी पक्षपात अवश्य होता किंतु निश्चय का पक्षपात भी परम विशुद्ध आत्मा को नहीं पाता। आत्मा का जो स्वरूप ज्ञान का ज्ञेय रूप है, जिसमें पर ज्ञेय की अपेक्षा का किंचित् भी सम्बंध नहीं, पक्षपातरूप जो विकल्प था राग का अंश था उसका भी नाश रूप केवलज्ञान का अंश प्रकट कर समयसार परमात्मा रूप ‘स्वरूप का अनुभव प्रत्यक्ष’ प्राप्त करो ऐसा अर्थ। 055/ छंद ज्ञानीजन का कथन ऐसा ‘समयसार, केवलज्ञानादिक को तो जानते हो?’ इस पर मंद कषाय जीव को यह शंका उत्पन्न हो व कहे, जीवको तो सर्व तत्त्वज्ञान का विचार बहुत काल सम्यक् रूप अनुभव पश्चात् ही हो सकता या शास्त्रों का अभ्यास हो, तो निश्चय स्वरूप को समझे। अध्यात्मिक शास्त्रों द्वारा ऐसा स्वरूप जान, पश्चात भेद का ज्ञान करो जैसे ज्ञान-दर्शन, दर्शन-ज्ञानका भेद कहा गया उसे व्यवहारिक निश्चय कहो, वर्णादिक राग, देहादि रूप जो राग अनुभव किया, त्याग करो, पश्चात भेद, राग ज्ञान- को पृथक् कर ज्ञान मात्र स्वरूप आत्मा सिद्ध पर्याय को साध्य मानकर प्राप्त किया जाताहै, सम्यक्त्व, चारित्र का परिणम हो कर मोक्षामृत का पान करते हैं? इस पर कथन क्या? इस पर कथन ऐसा कहा, इस ही तो भेद को व्यवहार कहा जा रहा यह भेद स्वरूप है, व इस कथन को पक्षातीत जो स्वरूप का रस ज्ञान मात्र रूप है अनुभव न कर पाया, केवल ही व्यवहार का पक्षपात ले बैठा इस कारण जो पक्षपात मात्र कथन किया जाता था पक्षपात ही उस व्यवहारिक को ग्रहण कर लिया। इस समय केवल आत्मा को ‘समय’ परमात्मस्वरूप कहा जा सकता जिस रूप से एकाकार हो व्यवहार- पक्षपातका सर्व प्रकार नाश होकर ज्ञान स्वरूप को प्राप्त हो सकेगा। पक्षातीत का कथन केवल ज्ञान के स्वरूप निश्चय रूप ही कथन किया जाता है सो सुनो, जिसे निश्चय स्वभाविक रस प्राप्त हुआ सम्यग् ज्ञान को निश्चय पक्षपात रूप भी न जान सके। क्या व्यवहार का ही स्वरूप है? पक्षातीत का व्यवहार कहा गया या पक्षातीत ज्ञान मात्र का नाम कहा? यह पक्षपात का कथन था, कथन मात्रका ही त्याग कर दिया है? पक्षातीत स्वरूप ही पक्षातीत रस का स्वरूप ज्ञान, जो व्यवहार रूप न होगा, जिसे इस समय ग्रहण कराया गया, केवल समय मात्र का ही ज्ञान कहा गया, स्वरूप ज्ञान, पक्षातीत का स्वरूप है, केवल स्वरूप पक्षातीतता मात्र ही स्वरूप कहा गया है पक्ष रहित रूप स्वरूप, समय परमात्मा, समय स्वरूप, समय समयसार- यह मात्र ‘रस’ का स्वरूप ही कहा गया ‘रस’ का पक्ष इस प्रकार से ‘रस’ का नाम स्वरूप रूप ही जान उस समय पक्षातीत स्वरूप कहा जा सकता है, पक्षातीत स्वरूप तो जो ग्रहण किया जा- रहा मात्र उस स्वरूप को ही ग्रहण करवाया पक्षातीत को तो जान लो, इस ही स्वरूप सदा अनुभव करो, ऐसा उपदेश दिया गया। निश्चय का पक्ष केवल ज्ञान का रूप कहा गया सो केवल ज्ञान रूप ही पक्ष मात्र व्यवहार, पर जो इस रस रूप ज्ञान को ‘रस’ का पक्षातीत स्वरूप कहा था, सो ‘रस’ मात्र कहा गया सो केवल स्वरूप स्वरूप का पर्याय- मात्र ज्ञान का नाम दिया सो केवल स्वरूप ‘रस’ मात्र था, जो ‘रस’ मात्र ज्ञान का स्वरूप था उसका पक्षातीतरूप से सब प्रकार से कथन किया, सो उस पक्षातीतरूप का त्याग कर एकाकार रूप ही ‘रस’ था, नाम मात्र था। इस समय जो अनुभव रूप ज्ञान स्वरूप, परम केवल ज्ञान मात्र उस समय भेद- का पक्षपात का स्वरूप था, सम-ता स्वरूप का ज्ञान स्वरूप था, पक्षातीत ज्ञान स्वरूप मात्र सो ‘रस’ भाव- रूपमें अनुभव मात्र स्वरूप पक्षातीतरूप ज्ञान कहा गया स्वरूप ‘रस’ का ‘रस’ ही नाम से जाना गया ‘रस’ का ‘रस’ ही पक्षातीतरूप का नाम था केवल ज्ञान मात्र उस सम-भावका सम- भाव था।