क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंव्यवसाय संबंधी या अन्य या पारिवारिक कार्य तथा योग्य समय पर आहार-विहारादिक का नित्य नियमपूर्वक काल निश्चय करके काम करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य, मनका सं- यम वा आलस्य-प्रमादादि का निवारण सदा रहकर सब काम ठीक बने और सदाचार बढ़ता रहे न कि आलस्य, काम की अधिकता, समय का, खान-पान का ज्ञान न रखके जब इच्छित हो किंवा आहार-विहारादिक के समय काम और कामके समय आहार वा आहारा- दिक नित्य करें, जिससे न तो स्वास्थ्य वा आत्माका निर्वाह हो, न ही विचार शक्ति वा काम ठीक बने और न ही सब ओर आनन्द प्राप्त होता॥ आहार-विहारादिक के वा कामके वा सब व्यवहार के सब काम ठीक और नियम से हो तो सुख सदा रहे॥ 080/ नित्य योगाभ्यास वा जो कि मनुष्य वा जीव है सब मन तथा आत्मा से युक्त है सो जीवात्मा परमात्मा कृत सब जगत् की सब वस्तु और सब कर्मों से उत्तम कर्मों को ग्रहण करके आत्मा शुद्ध तथा मनको निर्मल बना कर वा ज्ञान स्वरूप ईश्वर से सब उत्तम सुखोंको प्राप्त करे। जब मनको वा आत्माको इन दोनों को शुद्ध पदार्थ नित्य प्राप्त होवें अर्थात् वेदादि, उत्तम उपदेश, उत्तम कर्मों का नित्य ही सब उत्तम सुखों द्वारा लाभ होता रहे, सब मनका ही काम है सब जैसा जैसा मन में भाव रक्खेगा वैसा ही फल वा गुण आत्माको परमात्मा सुखों से वा सब सुखों से प्राप्त वा संस्कार युक्त होता जावेगा अर्थात् सो सो वा सब उत्तम उत्तम विचार युक्त! सो सब सुखों का, आत्माको ज्ञान का लाभ परमात्मा सम्बन्धी नित्य ही वा विचार मनमें सदा ही सब को नित्य ही करना योग्य वा ज्ञान वा उत्तम कर्म सदा सब ओर मनको वा आत्माको दो- प्रकार से सुख प्राप्त हो तथा सब सम्बन्धियों को आत्मा द्वारा सब प्रकार सम्बन्धी सब ओर का सुख वा सदा ही आनन्द प्राप्त होता रहे सब ओर वा आत्माको दो दो प्रकार का ज्ञान प्राप्त होवे जिस से आत्मा सदा उत्तम नित्य सब सुखों युक्त, आत्माको ही सब रस रस, ज्ञान प्राप्त होता रहे॥ सब सुख नित्य रहे? चित्त सब ओर शुद्ध रहे, सब को नित्य सुखों युक्त वा आत्मा को नित्य निर्मल प्रकार का सब व्यवहार सिद्ध सब ओर का नित्य सुखों का अभ्यास वा स्वाध्याय द्वारा ही प्राप्त हो॥ एक प्रकार तो संसार सम्बन्धी- ज्ञान का, दूसरा प्रकार उत्तम ज्ञान- का, नित्य लाभ हो तो आनन्द रहे॥ सत्य पुरुषार्थ का॥ वा योगाभ्यास सदा हो॥ 081/ योग-साधन वा आत्मा को॥ वा जीवात्मा नित्य ही उत्तम परमात्मा के सब ज्ञान द्वारा आनन्द युक्त सब सुख प्राप्त करने का सदा यत्न वा सब ओर से करे। सो इस प्रकार सब ओर सब काल वा नित्य सब मन तथा मन द्वारा परमात्मा सच्चिदानन्द का नित्य ही सदा काल आठों-पहर ध्यान वा स्मरण मन से किया जा सकता है वा करे, ‘सब से परे?’ सब से परे परमात्मा का स्मरण सब से परे नहीं हो सकता क्योंकि मन सब ओर सदा सब ओर ही रहता है सदा ही आत्माको सब ही काल स्मरण मन ही द्वारा सदा ज्ञान द्वारा किया जाता है सो सदा नित्य ही ध्यान हो सके; फिर तो सदा नित्य ही आत्मा से सब कर्म सदा ही वा सब ओर सत्य स्वरूप के सब कर्म यथा योग्य परमात्मा सम्बन्धी सदा मनके द्वारा नित्य ही उत्तम सब कर्मों का लाभ हो सके, ‘सब से परे?’ 51