क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार श्रीगुरु जीव-सत्त्वको अपने रूप तथा नाम 'जीव' प्रदान करते, उनको अपने परम धाम रूपी निज अङ्गसङ्ग 'जीव' प्रदान करते, तब जीव कृतार्थ होता। 097/ गुरुदेव शिष्यका कल्याण क्यों गुरुदेव का शिष्यका यह कल्याण रूप स्वरूप कृपा केवल जीवकी आत्मिक कल्याण दिशा तक ही सीमित नह रहकर यह सर्व दिशा प्रसारित भी होत रहता है। इस हेतु श्रीगुरु शिष्यके व्यावहारिक जीवनका भी ध्यान रखते। ऐसा नहीं होता कि शिष्यके सम्पूर्ण रूप शरण गत न होने, अथवा पूर्णरूपेण वह आज्ञा वहन नहीं कर रहा, अथवा मनमुखता आचरण करता भी हो सकता हो लेकिन, वह शिष्य रूपी जल जीव स्वरूप बनकर, गुरुके तट शरण आया होकर उसकी जीवन प्यास को गुरुदेव तृप्त तो करते ही रहते हैं। उसका व्यावहारिक जीवन सुखी रहे। इसीलिए वह 'गुरुदेव' रूप धारण करके जीव अज्ञानी अवस्था दौरान सांसारिक जीवन तक भी 'उपकार' की सीमा विस्तारक कर शिष्यका भला ही सोचते रहते। इस दृष्टिसे विचारने पर यह प्रत्यक्ष प्रतीत होता अवश्य होगा कि यह 'भू-लोक' केवल एक पाठशाला स्वरूप ही, इस हेतु शिष्यको 'भू-लोक' रूप ज्ञान शाला रूप संसारकी सर्व समस्या हल करने का अवसर प्रदान करते, जो कि सांसारिक कल्याण रूप दिखाई देकर जीव के इस व्यावहारिक जीवन को सार्थक तो बनाता ही रहता, पर उसके मन को सम्पूर्ण रूप यह नहीं समझाता कि यह शारीरिक रूप अवसर ही अन्तिम है, पर उसके मन को जीवकी पूर्ण रूप से उस अद्वैत रूप जीवन धारण तक इस प्रकार का साधन, उसका मन स्थिर रूप से केवल गुरु चरणामृत पान तक ही नहीं पर उस अमृत स्वरूप जीवन धारण की दिशा विचारने हेतु भी अवसर प्रदान करने का निमित्त न केवल इस सांसारिक सुख साधन उपलब्ध कर करने का कारण रूपसे शिष्यको यह अवसर प्रदान करते हुए कि सांसारिक सुख, इस हेतु शिष्यको यह अवसर प्रदान, शिष्यको यह ज्ञान देते। 098/ आत्म-कल्याण प्राथमिकता है यह विचारणीय भी गुरुदेव शिष्यके सम्बन्ध में इस बात रूपी सत्य-तथ्य को ज्ञान-गोचरता से जान लेना व्यावहारिक भी ध्यान का विषय, आत्म-कल्याण की प्राथमिकता को पर रख गुरुदेव शिष्यके इस सूक्ष्म जीवन रहस्य विषय, उसके व्यावहारिक जीवन की चिन्ता आत्म-कल्याणकी चिन्ता उपरान्त प्राथमिक विचार मानते। शिष्यकी आत्मिक दुर्बलता गुरु रूपी चरणो की शरण रूप जल प्राप्ति का कारण बन सके, इस हेतुसे शिष्य का मन जब सांसारिक सुख की इच्छा से प्रेरित होकर गुरु शरण में आया, सांसारिक इच्छाओंकी तृष्णा का शमन केवल इसलिए नहीं, ताकि शिष्यको सांसारिक सुख मिले! इसलिए कि जीव का मन तृप्त हो कर केवल शान्त हो सांसारिक विषय से; उसके मन की यह तृष्णा ही आत्म ज्ञान की पिपासा का कारण बन सके। इस हेतुसे जहां सांसारिक सुख रूप जल का पान, उस शिष्य को गुरु द्वारा मिले, उसके मन हेतु जल रूपी अमृत का तो काम सांसारिक तृष्णा शमन करने का ही स्वरूप बन सके तथा गुरुदेव सांसारिक सुखोंद्वारा उस आत्म-कल्याण रूपी पिपासाको पूर्ण कर सांसारिक सुख केवल निमित्त स्वरूप सांसारिक सुख को साधन-स्वरूप बनायें यह भाव निहित था, नकि इस प्रकार सांसारिक सुख केवल ही, जो केवल सांसारिक दृष्टि द्वारा जीव रूप को सीमित करता था उस दिशा को बदल कर, उस रूप को गुरुदेव जीव रूप को दिशा प्रदान कर सकने तक। इस कारण जहां यह स्वरूप इस बात विचारने को ध्यान दिलाता, शिष्य की अन्य कल्याण की दिशा पर उस अन्य दिशा को केवल उस इस बात-विचारकी प्राथमिक दिशा रूप ही समझ कर चलना चाहिए, ताकि इस सांसारिक सुख के रूप को निमित्त ही जान जीव का उस दिशा का विचार ही प्रमुख न बन सके। उस अवस्था सांसारिक सुखोंको पूर्ण समझ जीव सांसारिक सुख-दुख रूपी सांसारिक बन्धन सांसारिक जीवन का लक्ष्य न, वह उस आत्मिक कल्याण साधन दिशा का मार्ग ही, सांसारिक सुख भोगने का ही लक्ष्य मान कर न उस सुख को भोग कर सके। 60