भारतकोश
क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (उद्गम)

DevanagariHindipublished73 पृष्ठ

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विचारशीलता मात्र का होना जीव मात्रके कल्याण का कारण या कारक बनसकता तो फिर सभी विचारवान् लोग एक ही विषय स्वतः सम्पन्न कर ही लेते।लेकिन जो ऐसा नहीं अनुभव करते, सत्य के साक्षात्कार के कारण ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि एकत्व के प्रभाव मात्र से ही आत्मा सब प्रकार के सन्देह से मुक्त हो जाता तथा एक ही पथगामी बन कर यह समस्त जगत् एक ही मार्ग का अनुगामी बनकर न जाने कब का कृत कृत्य हो चुका होता ।। अतएव, विचार से व्यवहार के स्वरूप को, 'यथा वत्', या वास्तविक रूप नहीं मिलता बल्कि मन में उथल पुथल और बढ़ जाती है, मन अनियन्त्रित होता है, वासनायें सिर उठा कर आगे बढ़ कर मन को विषय से वशीभूत कर सकती हैं। हाँ, विचार के प्राधान्य मात्र, विशेषाधिकार रूप से आगे बढ़कर जब विवेक रूप, अपनी ज्योति बिखेरता है तब मन को शान्ति की प्राप्ति होती, सत्य विचार मात्र का उदय उस स्थिति में जीवात्मा स्वरूप में होता है जो कि, न केवल मन को लय कर देता अपितु वासना रूपी बीज ही को सर्वथा नष्ट कर देता, उसे शान्ति पूर्ण 101/ विवेक से शान्ति लाभ यह सत्य बात सदैव से जन वर्ग के हित कार्य में सदैव ही उपयोगी सिद्ध- तो रही ही है, भले रूप भले विचार मात्र से किसी तरह भिन्न-हो क्यों नपड़े, किन्तु यह तो सत्य ही सिद्ध परिणामकारी रूप सिद्ध होगी ही, विचार में गति कम हो, भले रूप गति प्रत्येक के मन में ही उत्पन्न हो किन्तु विवेक सदा अपनी स्थिति मात्र से प्रत्येक को प्रकाश मय करता है, जिससे कि हर प्रकार के हर प्रकार विश्लेषक के सब सन्देह को, विवेक के उदय रूप मात्र सब ही स्वतः समाप्त होकर लय हो जाते ही देखे हैं, फिर चाहे स्थिति कोई रूप क्यों नहो। संयम, तप, जप, भक्ति- के कारण सब, जो धारण किए गये त्याग पत्र- स्वरूप विवेक के प्रभाव रूप विचार मात्र से ही त्याग रूप न रह कर, या त्याग तो जो कि स्वभाव सिद्ध का रूप स्वतः- ही बन जाता था, या जिसे त्याग भी नकहें बल्कि मात्र यह सम्प्रदाय या सम्प्रदाय रूप, या स्वरूप स्थिति का रूप, स्थिति के नाम से स्वरूप के स्वरूप सम्बन्ध जीवात्मा स्वतः ही पा लेता था। जो केवल ही केवल ही बात ज्ञान सिद्ध रूप विशुद्ध के द्वारा स्वतः ही सम्भव था। अपने अपने स्वरूप के दर्शन मात्र से ही सम्भव है, जो प्रत्येक के अन्तर का प्रकाश सदा से सदा रूप होकर प्रकाश के रूप मात्र जीवात्मा स्वरूप को देता था। विशुद्धता ही केवल सदा सिद्ध रूप में, सब काल सब देश, कार्य, स्थिति मात्र प्रकाश का रूप सदा, केवल ही केवल मात्र रहा है।। विशुद्ध स्वरूप, सत्य, आनन्द, का प्रकाश मात्र ही, जो शुद्ध रूप, स्वरूप रूप सदा ही सर्वत्र सब काल में रहा पाया गया, जो सब ही रूपों का बीज रूप मात्र आत्मा रूप से सदा रहा है, जिस रूप प्रकाश को, हर रूप का बीज कहना था। 102/ वशीकार किसका हो? जब प्राण ही सब कुछ कार्य कारण रूप सब रूप से हो जीव मात्र रूप से हो रूप मात्र स्वरूप से ही सदा सदा से ही रूप मात्र है! तब विचार का स्वरूप सब रूप जीवात्मा सदा रूप से सिद्ध है, तो फिर यह प्रश्न ही नहीं रह या सम्प्रदायों रूप में विचार का प्रभाव रूप या प्रभाव भाव- रूप सदा सदा सदा रहा जीवात्मा स्वरूप मात्र से ही सब कुछ रूप रहा 62