माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथवा जीव जानता हुआ सब कुछ कर सके अर्थात् जो जो पदार्थ जाने वह सब, उन सब पदार्थों का कर्त्ता इत्यादि इस बात पाठक समझ गये होंगे कि, ज्ञानियों का मत यह अवश्य होता कि जो सर्व-ज्ञानी होता सो सब कुछ कर सकता और जो अल्प ज्ञानी होता वह सब कुछ वा अनेक कामों को सब प्रकारके कामों को वा जिन कामोंको वह जानता उनसब पदार्थोंके वा कामों का कर्त्ता कहलाता वा होता वा उसका कर्त्ता वा अधिष्ठाता वा धारक वा रक्षक ज्ञानियों-मुनियों का ऐसा मत है, किन्तु इस समय, ना जान किस प्रकार लोगों का मत, बिना ज्ञानके ही सर्वज्ञ वा सब कुछ वा बहुत कुछ जानने वा करने वाले को सर्वज्ञ मान लेते, समझ लेते अथवा कहा करते हैं और, सब कुछ बिना ज्ञानके किस प्रकार होसके? क्या मूर्खता किसी कामके करने योग्य है? क्या कभी मूर्खता किसी काम को कर सकती वा कर सको वा कर सकेगी कभी भी? सो कहो, जब मूर्खतासे परमात्मा पृथक् अथवा अन्य है तब वह मूर्खता युक्त ज्ञानसे शून्य पदार्थों का कर्त्ता क्यों हो वा होगा ऐसा, सब कामके वा सृष्टि के पदार्थों को देखने और करने वाले जीव का ही काम होना सिद्धान्त होना योग्य होगा? सब जग कोई यह उपदेश करो? सब काम को वा पदार्थों को अथवा ज्ञान को जान कर जीव ही करता, वा होता वा कर्त्ता वा ज्ञाता वा उस पदार्थ को जानता वा उसपर ज्ञान करके उसपर अधिकार रखता हुआ सब कुछ पदार्थों अथवा जगत् पदार्थ को विलोचन वा देखते ही रहा, ज्ञान सर्वव्यापकतासे युक्त जो है, ज्ञान सर्वज्ञता से युक्त, ज्ञान सर्वके ज्ञाता रूप धर्म वा गुणों से युक्त हुआ रहता हुआ सब ज्ञान युक्त इस जगत् में व्याप्त वा ज्ञान वा जानके सब कामको वा पदार्थों व्यापार को यथा रूप जान ही रहाहै। जब ऐसा प्रमाण हुआ तब तो यह मत वा फैसला हो गया सिद्ध कि सब जगत् वा सर्व-ज्ञता सब जगत् की रचनेके वा उत्पन्न होनेके काम सब, सो सब काम वा उत्पन्न वा कर्त्ता रूप सब काम, परमात्मा को कर्त्ता मान कर्त्ताके साथ ही ज्ञान रूप को भी वा ज्ञानको ही सब काम करते पदार्थों का कर्त्ता-रूप माना गया, यह ज्ञान जिससे भिन्न, पृथक् अथवा शून्य अथवा रहित कोई काम वा पदार्थ परमात्मा का भी वा परमात्मा रूप भी वा परमात्मा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान रूप वा ज्ञान-स्वरूप माना गया उस ही स्वरूप का रूप सब जगत् वा जगत् रूप को वा सब को-वा सब प्रकृति को सञ्चालन कर सब को-वा जगत् अथवा प्रकृति सञ्चालक रूप वा परमात्मा रूप कहा गया, ज्ञान-स्वरूप परमात्मा कैसा वा किस-रूप का अथवा कैसा वा किसका, जब ज्ञान रूप, ज्ञान रूपी परमात्मा, सबमें ज्ञान रूप में सब का ज्ञान रूपी वा ज्ञान ही सब रूप सब जगत् रूप सब ही रहा, ज्ञान रूप सर्वज्ञ ज्ञान रूप सर्वव्यापक ज्ञान जगत्पति, ज्ञान कर्त्ता ज्ञान कर्त्ता वा परमात्मा कर्त्ता सर्वव्यापिरूप से ही काम सब काम सब, जग ज्ञान, जग ज्ञान का कर्त्ता वा सब, सब काम हुआ? सो विचार कर लो, परमात्मा को, ज्ञान रूप जगत्पति रूप मानोगे, ज्ञान रूप जगत् पति मानोगे, ज्ञान रूप सब रूप का, जगत्पति, जगत् रूप वा परमात्मा का रूप सब जग को परमात्मा ज्ञान रूप वा सब जग को परमात्मा मानोगे तब तो, यह न्याय रहेगा? वा यह इंसाफ वा न्याय होगा? वा यह जगत् का न्याय होगा? वा यह परमात्मा का न्याय होगा? संसार को वा जगत्को ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान स्वरूपतासे भिन्न कोई जीव पृथक ही सब हुआ, जग सब काम जीव कर्त्ता हुआ पृथक ही सर्व-ज्ञ ज्ञान रूप जग सब जीव ही सब काम करता हुआ सब का रूप सब काम का न्याय सब जगत्पति का जग को न्याय सो हो, सब ज्ञान रूपी जग जीव का विचार जीव किया अथवा ऐसा विचार हुआ, ज्ञान रूप जगत् जग ज्ञान जगत् प्रकाश सो जग में ज्ञान रूप सब जगत् अथवा जगत् का कर्त्ता सब जगत् वा जीव सब का परमात्मा वा परमात्मा का रूप सब को जग कर्त्ता रूप में मिला, जिस से सब जीव वा जीव ज्ञान रूप, सो सब जग को वा जग-व्यापक रूप, सो सब काम को वा जग-रूप काम को, ज्ञान रूप जगत् व्यापकता से वा ज्ञान-प्रकाश रूप, स्वरूप प्रकाश रूप, ज्ञान-रूप ज्ञान रूप, सो सब ज्ञान को वा ज्ञान रूप सब जगत् ज्ञान सब जगत् को जगत् व्यापक वा सब सब--जगत् को ज्ञान रूप सब, जगत् के सब रूप को ज्ञान सब, जगत् के सब सब स्वरूप 115