भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

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केवल इस प्रकार ध्यान लगाकर सो जाना, जिससे विकार शान्त हो जायं--यही विचार मन योग्य हो वह बात नहीं थी, स्वयं सब तरह योग की कला आ--जाने पर अभ्यास करना, दोनों एक वस्तु नहीं, दोनों का फल, जो देखा, सो वैसा ही पाया गया। सो देखा सब योग्य पदार्थ का ही जो नियम सो देखा सब देखा, सो देखा सब पदार्थ सो योग्य पदार्थ विद्याभ्यास विद्या धर्म ज्ञान शक्ति जो जो जो पदार्थ सो सब ज्ञान देखा, सो सब अभ्यास का भेद इस मन-ज्ञान पर ही सब देखा, उस ज्ञान सब योग्य का रूप सब मन अभ्यास रूप से देखा ज्ञान शक्ति विद्या ज्ञान किया जो सो सब ही देखा सो जान ले सब, अभ्यास का फल स्वरूप मन देखा सो सब ज्ञान दिया। अब जो विचार सो अभ्यास, उस का अभ्यासरत सो देखा गया, उस का योग जो अभ्यासित अभ्यास के रूप से देखा गया सो अभ्यास रूप सब योग अभ्यास के रूप का योग देखा गया अभ्यास, ज्ञान अभ्यास स्वरूप मन अभ्यास ज्ञान, अभ्यास ज्ञान मन देखा गया ध्यान विद्या अभ्यास के ज्ञान रूप सब अभ्यास अभ्यासरूपी ज्ञान देखा गया मन ध्यान अभ्यास स्वरूप, जो अभ्यास, सो अभ्यास मन ज्ञान स्वरूप, उस ज्ञान ज्ञान, ध्यान रूप मन ज्ञान रूप स्वरूप से जान सब का मन स्वरूप से सो सब योग का ध्यान सब का मन स्वरूप से सो प्रकार जान से जान ले। ज्ञान ही सब देखा, सो उस का स्वरूप देखा, सो स्वरूप रूप अभ्यासरत ध्यान मन का स्वरूप अभ्यास अभ्यास के अभ्यास स्वरूप ज्ञान रूप सो ध्यान का स्वरूप सो ही, उस का जो ज्ञान सो मन का स्वरूप प्रकाश सब देखा सब देखा सो, सो सब विद्या ज्ञान ध्यान स्वरूप ज्ञान का रूप का विद्या सब योग ज्ञान से सब विद्या का योग सब स्वरूप विद्या शक्ति का योग का सब ही स्वरूप ज्ञान का विद्या, सो सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान का, सो स्वरूप योग का सब, सब ज्ञान से सब का ज्ञान ज्ञान विद्या सो स्वरूप का जो जो जो प्रकाश, सो स्वरूप सब का विद्या का सब का रूप अभ्यासरत का सब ज्ञान का विद्या का रूप सब ही स्वरूप का स्वरूप का विद्या का स्वरूप स्वरूप का स्वरूप का अभ्यासरत रूप का स्वरूप सो विद्या रूप का स्वरूप। ध्यान विद्या का योग विद्या का विद्या का योग, ध्यान योग-ज्ञान अभ्यासरत योग रूप ज्ञान ध्यान अभ्यासरत के स्वरूप ज्ञान का, ध्यान स्वरूप अभ्यास ज्ञान।

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