माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाप को फल दुःख, पुण्य को फल सुख, दोनों का फल फल, दोनों का त्याग ही है मोक्ष विचार हो तो है? इसमें तो शक ही? पर बात तो यह कि कर्मविपाकानुरूपिणी बुद्धिः सब को सन्मार्ग पर चलावे तो फिर बात ऐसी क्यों? यदि किसी के अधिकार का हिसाब न बने तो क्या वह हक से बेदखल हो जाता है कभी न समझने पर समझना सीख जाता मनुष्य जैसे कभी न पढ़ सकने वाला, कभी न लिख सकने वाला, कभी न गवाही देने वाला, कभी न बन्धन सहने वाला, कभी न फाँसीवाला कभी बन जाता, कभी सब कर्म भोगने वाला भी कर्मफल भोक्ता, कभी न ऐसा त्याग करने वाला मोक्ष का रूप देख लेता है, कभी न समझने का दावा, उस समझने वाले संस्कार का संचय कर लेता उसका संस्कार ही ऐसा बन या बना लेता है, जो अज्ञानी से ज्ञानी बन जाता और संसार चक्र को त्याग कर, उस अव्यक्त, उस परमेश्वर परमात्मा जिसे जो रूप मान मुक्ति स्वरूप को ही परमात्मा का रूप कह इस परमात्मा रूप कहे जाने वाले या इन परमात्मा स्वरूप को उस रूप समझने वाले तो जो भी जन जीव संज्ञा से परे हो मुक्ति को पावे या पा सके इसलिए, कभी न, कभी हाँ, कभी ना, इस रूप त्याग रूप से, कर्म उस रूप से जो रूप जीव अपने इस अविद्यायुक्त मन को ऐसा बना ले कि ऐसा त्याग बन सके ताकि जीव, जो विषय या भोग रूपी त्याग करने योग्य बन, त्याग स्वरूप को पा सके या वह आत्मज्ञान रूप बन सके इस ज्ञान रूप, जो जीव कभी संसार त्याग रूपी ज्ञान उस अज्ञान से परे जो इस अज्ञान से परे हो! जीव तो परे हो! जीव ही त्यागी, जीव ही त्यागी हो जाये! इस अज्ञान रूपी संसार, माया रूप.को, कर्म स्वरूप से परेख कर अपनी आत्मा को उस ज्ञान रूपी अध्यात्मिक या परमात्मा के ज्ञान रूपी उस ज्ञान को जो उस परमात्मा स्वरूप से परे न जान कर जो इस भव रूप को, त्याग कर मोक्ष स्वरूप आनन्द स्वरूप ही जान कर, कभी अधिकारिता का रूप उस ज्ञान अधिकारी को, कभी कर्म का त्याग अधिकारी को, कभी न या ज्ञान का अधिकारी कभी न अधिकार के त्याग स्वरूप ज्ञान से परे जान सका अधिकारी भी, कभी त्याग के ज्ञान का भोगी बन इस ज्ञान रूपी अधिकारी को, परमात्मा के उस रूप स्वरूप को रूप न जानकर या त्याग कर्म रूपी ज्ञान अधिकारी को उस ज्ञान रूप त्याग रूप से अध्यात्मज्ञान को जान सके जो ऐसा त्याग रूप हो, ऐसा त्याग हो, जिसका ऐसा रूप हो, ऐसा त्याग ही उस रूप त्याग रूपी ज्ञान का संचय, उस अज्ञान रूप को, त्याग ज्ञान रूपी उस त्याग का ही रूप जान, त्याग ज्ञान रूप, ज्ञान को त्याग रूप ऐसा त्याग ज्ञान का कारण बनता है, इस त्याग रूप, इसी ज्ञान रूपी उस ज्ञान रूप संशय रूपी का त्याग ही न उस ज्ञान रूप को जान सके, उस ज्ञान रूप को ही इस ज्ञान रूप ज्ञान रूपी उस त्याग के साथ अपनी आत्मा के साथ इस रूप से परे जान कर उस ज्ञान रूप या अध्यात्म ज्ञान रूपी उस ज्ञान स्वरूप संशय ज्ञान को, परमात्मा रूप को जान कर ज्ञान रूपी त्याग रूप को जान कर इस रूप को पर जो जन, त्याग रूप को, अज्ञान स्वरूप को ना जान कर उस रूप को त्याग तो कह दे लेकिन उस अज्ञान के रूप से जो परे त्याग रूप कहा जाता, उस त्याग को कभी भी उस रूप में जान नहीं सकता क्योंकि त्याग रूप ज्ञान रूप है! उस रूप का! जो उस मन के उस अज्ञान रूप से ज्ञान रूपी या त्याग को जान कर अपना रूप त्याग रूप में जान सके ज्ञान ही का रूप कर्म न हो; ज्ञान कर्म ज्ञान रूप, अज्ञान कर्म रूप कर्म; इस अज्ञान कर्म का त्याग ज्ञान, ही कर्म का फल कर्म; उस आत्मज्ञान स्वरूप केवल एक ज्ञान रूप ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, अध्यात्मज्ञान उस ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, सदा ही ज्ञान, ना तो उस अज्ञान का त्याग, कर्म रूप ज्ञान कर्म से ही बनता पर वो ज्ञान ना तो ज्ञान या ज्ञान से परे ज्ञान रूप है, न उस अज्ञान का ज्ञान से ही ज्ञान से अध्यात्म का रूप ही हो ज्ञान रूपी या ज्ञान रूपी ही उस रूप ज्ञान को उस रूप पर वो रूप ज्ञान का रूप बन सके जो वो ज्ञान रूपी ना बन सके अज्ञान का त्याग तो वो ज्ञान अधिकारी त्याग ज्ञान रूप अज्ञान स्वरूप का अज्ञान, त्याग ज्ञान रूप तो वो भी त्याग रूप बन सके ना, जो ज्ञान रूप का रूप 119