भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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इस प्रकार जीव का यह सब भ्रम मिटने, पर ही जीव अपने शुद्ध रूप को पा कर मोक्ष सुख प्राप्त कर सकता। इसके उत्तर दाता का यह काम था, जिसने उत्तर दिया कि ब्रह्म--विद्या केवल गुरु से? अर्थात जिस विद्या द्वारा ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया जाता हो उस विद्या को केवल एक गुरु, अर्थात् केवल १ ईश्वर, केवल १ ही गुरु, जिस का नाम शिव प्रसिद्ध हो सब संशय और सब भ्रमों को दूर करने वाली यथार्थ उपदेश करने वाला गुरु कहा गया हो उसी द्वारा ही जाने? तात्पर्य यह कि विद्या चाहे संसार की कोई भी क्यों न हो सब पहले ईश्वर द्वारा संसार को प्राप्त हुई, जिसको उस समय चार वेद कहा गया था। इसलिये ज्ञान, जोकि यथार्थ वस्तु का सही बोध कराता है उसका आरम्भ वेद द्वारा सर्व प्रथम संसार को प्राप्त हुआ था ऐसा सब को मानना ही, होगा और सब धर्म वाले यही कहते और मानते हैं। यद्यपि, कालान्तर में यह ज्ञान गुरु, शिष्य परंपरा द्वारा चलता रहा, इसलिए गुरु की महिमा सबने बड़े आदर से मानी ही, परन्तु जो सच्चा गुरु, शिष्य होगा वह ज्ञान की महिमा मानेगा, शिष्य को यह समझना चाहिये, सच्चा ज्ञान संसार में जहां कहीं से भी मिले ग्रहण करे, और जिस से ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस को अपना गुरु माने, चाहे वह पुस्तक, या संसार की अन्य कोई वस्तु हो। उस का ज्ञान ही मुख्य है, जिसको प्राप्त कर के जीव का भला हो सकता, पर जो यह कहता, कि बस १ ही गुरु पर ही सब निर्भर करता ऐसा विचार रखने वाले पर संसार का कोई गुरु भी कल्याणकारी नहीं हो सकता, और उसका सारा किया कराया सब व्यर्थ चला जाता है, जो व्यक्ति यह समझे, कि उस कल्याणकारी ज्ञान को सब संसार को देना--है सो वह, सब जगह सब को बांट देगा जिसके पास विद्या रूपी धन है, जिस से संसार का भला हो, उसको यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि जब तक कोई शिष्य बन कर न आयेगा, विद्या प्रदान नहीं की जा सकती, विद्या का दान सब से बड़ा है--जो सब के लिये है, जिसको सब को सब समय दिया जा सकता है। इसमें यह सब भेद कैसा क्यों? उस ज्ञान दाता का नाम ही ईश्वर अथवा यथार्थ गुरु का स्वरूप कहा जा सकता है। जो विद्या का प्रसार करे, उस विद्या के बदले संसार से कुछ न चाहे। न धन चाहे न प्रतिष्ठा ही चाहे, केवल यह भाव ही मन में हो, कि सब का सब प्रकार से भला हो, ऐसा ही उपदेश १ गुरु शिव द्वारा मिलता, जिन्होंने स्वयं, संसार को सब कुछ दिया पर कुछ न मांगा। ऐसे पुरुष ही संसार में यथार्थ, गुरु कहे जा सकते! केवल पेट पालने को नहीं! ऐसा समझ कर, ज्ञान का उपदेश सब को करना चाहिये? इसका उत्तर केवल यह है, यदि ऐसा विचार संसार में पहले रहता सब जगह विद्या फैलती ही, पर जो कुछ नहीं फैला, उसका कारण केवल यह बना कि जिसको जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसने उस पर अपना कब्जा करने का प्रयत्न किया, जो कि सब का सब सर्वथा अनुचित था, जो विद्या केवल संसार के, कल्याण के लिए थी उस पर अपना दावा सिद्ध करने का व्यर्थ यत्न किया गया और सब कुछ छिन गया जो विचार आज भारत वर्ष में सब को प्राप्त हैं उन का नाम केवल हिन्दू ही नहीं कह सके। क्योंकि ज्ञान किसी के घर में बन्द नहीं किया जा सकता, यह ज्ञान तो संसार के सब मनुष्यों के लिये ईश्वर ने प्रदान किया था, पर जब तक यह ज्ञान १ घर में बन्द रहा तब तक उस का फल भी वैसा ही ही मिला कि जिस घर में बन्द किया गया वह नष्ट हो गया, जिस प्रकार से बन्द जल सड़ कर जाता है, इस लिये वेद के ज्ञान को, फैलाना चाहिये ताकि सारे संसार को लाभ हो सके। ज्ञान की वृद्धि, तब होती है जब उस को सब के लिए फैलाया जाये। फिर यह कहना, कि गुरु ही जाने, सो गुरु का अर्थ क्या सब लोग समझ गये? फिर उसका भी हल, उस कल्याणकारी शिव, ने दिया जिसका वह ज्ञान था। जिसका वह ज्ञान था सो स्वयं १ गुरु बन कर इस ज्ञान रूपी अमृत को सब को दे रहा है, पर उसका लाभ सब को तभी पहुंच सकता है, जब निष्काम हो, निष्काम ही उपदेश संसार को दिया जाये। यजुर्वेद का १९.१२ मन्त्र इस प्रकार के उपदेश को ही सब प्रकार के कल्याण का आधार मानता है।

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