भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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इस तरह विचार कर उसने मन-मन में निश्चय किया, आजन्म मरूँ तो, पर दूसरा विवाह कभी नहीं करूँगा। जब वह मरा, तब उसने देखा, कि स्वर्ग में कोई दो-तीन स्त्रियाँ हैं। जो केवल दो पत्नियों का स्वामी बनकर रहा उसको दोनो ओरसे हाथ पकड़कर ले जाने वाले यमदूत ऐसे खींचते हैं कि वह सोच नहीं सकता कि किस ओर जाऊँ। जो तीन पत्नियाँ रखते हैं उनको तीन ओर तीन यमदूत खींच कर त्रिशंकुकेसमान कर, असमंजसमें डाल, कष्टप्रद बनाते हैं, बहुविवाहवालों की गति तो और भी विचित्र ही होती है। कोई तो कह रहा, अरे मूर्खो! एक स्त्री से ही तुम्हारा निर्वाह नहीं हो सका तो फिर विवाह ही क्यों न छोड़ दिया? जब विवाह करना पड़ा तो केवल एक ही पत्नी क्यों न रखी? दूसरों का विवाह क्यों कराया? स्वयं कई स्त्रियों से विवाह क्यों किया? यदि कई एक से विवाह किया था? फिर दूसरी के आधीन क्यों हुआ? अपनी इच्छा से कई स्त्रियों पर रीझ कर विवाह कर उनके जाल में फँसने वाले तो अवश्य नरकमें गिरेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं! जिन्होंने केवल पुत्रोत्पत्ति तथा गृहस्थ धर्म पालनार्थ एक ही से रूप-रंग वा धन-दौलत को न देख कर केवल कुल को उत्तम समझ कर विवाह किया, केवल धर्मार्थ ही पत्नी का उपयोग किया वा केवल सन्तान के निमित्त ही पत्नी का सङ्ग किया वा जिसने मन से भी पर-नारी चिन्तन न किया। गृहस्थ में रहकर भी, ब्रह्मचारीवत् रहा। जो किसी दूसरे पर या तो परावलम्बी बन कर नहीं रहा अथवा स्वयं, दीन- हीन, दुर्बल होने पर, गृहस्थ धर्मका पालन करने लगा। उसने पत्नी के साथ धर्म-साधन में सहयोग दिया, पत्नी ने भी हर तरह पति का साथ निभाया। दोनों में परस्पर कभी कपट, द्वेष, विरोध नहीं रहा, वरन् दोनों परस्पर एक दूसरे का सदैव ध्यान रखते रहे। सदा धर्म, सत्य, नियम का पालन करते रहे, किसी को अपने से कष्ट न पहुँचे इस बात का पूरा ध्यान रक्खा गया, परोपकार में लगे रहे। किसी को सताया नहीं और न ही किसी को परपीड़क बनने दिया, ऐसे लोगों का जीवन धन्य है। वे तो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। यही नहीं, उस लोक में जाकर, इन बातों का भी ज्ञान कराया गया कि, जो मनुष्य केवल अपने उदर-पोषण में लगे रहते हैं। सदा यही सोचा, स्वयं खाऊँ पर कभी किसीको दिया नहीं। दान-धर्म से सदा जी चुराते रहे। दूसरों को जब-जब आवश्यकता पड़ी उस समय कोई सहायता न दी, जो माता-पिता की सेवा नहीं करते वरन् उनका तिरस्कार करते हैं। जो भाई-भाई में कलह कराते हैं। जो सन्तों का मान-भङ्ग करते हैं। वे नरक गामी होते हैं। जो पर-नारी गमन, पर-धन का हरण करने में लगे, मदिरा-पान में ही मस्त रहे, अपने को ही सब कुछ समझते, दूसरों को तुच्छ व हेय, दूसरों के दुःख को न देखकर, केवल अपने सुख में ही लगे रहे। वे नरक गामी होते हैं। जो विद्या दान नहीं देते वरन् धन कमाने की दृष्टि से ही विद्या देते, वे नरक में घोर यातना पाते हैं। जो अपनी सन्तान को सुमार्ग नहीं दिखाते, वरन् उन्हें कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं। जो अपने स्वामी का अहित करते हैं, जो माता-पिता को घर से निकाल बाहर करते हैं। इस प्रकार यमदूत उस जीव को, सब प्रकार समझा कर, कहते हैं, धर्मराज के दो रूप हैं। एक तो सौम्य रूप है, जिसमें वे धर्मराज कहलाते हैं और दूसरा रूप अति भयंकर, विकराल है जिसमें वे यमराज कहलाते हैं। जो, पापी होता उसके सम्मुख वे भयानक रूप दिखाकर दण्ड की व्यवस्था देते हैं और, धर्मशील के आगे वे सौम्य। जो पराई स्त्री को देख कर, अपनी दृष्टि को नीचा कर लेता है। जो पराई स्त्री को अपनी माता अथवा बहन के समान समझता, वह धर्मराज का दर्शन पाता है? जो दूसरे के धन को मिट्टी-पत्थर समझता है। जो अपने सुख की तरह दूसरों को भी सुखी देखना चाहता है? जो किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देता, वही पाता है, जिसने पराए दुःख को दूर करने का प्रयत्न किया है। जो तो उस व्यक्ति को कभी भी नरक नहीं भोगना पड़ता, जिसने पराया अहित कभी नहीं सोचा, वरन् सदा ही सबका भला ही सोचा है। जो दूसरों की निन्दा नहीं करता, जो किसी भी प्राणी को धोखा नहीं देता। जो सन्तों का आदर करता है। जो दीन-दुखियों की हर सम्भव सहायता करता है। जो सदा प्रभु स्मरण करता है। जो अपने गुरुजनों का आदर करता है। जो अपने माता- पिता को ईश्वर मानता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं सोचता। 131

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