माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकथा समाप्त कर जब पंडित सुखदेव अपनी घर की ओर चले तो देखा, कि केवल दो चार जन पीठ पीछे चले आते हैं। वे तो सब इस बात को भली भांति जानते थे। परन्तु इन चार पांचों सज्जनों को ऐसी अमूल्य कथा सुनकर बड़ा विस्मय और आनन्द हुआ था, जिससे सुखदेव जी चले, तो इन चार पांच ने कहा, पंडित जी! कृपा कर यदि आप कुछ दिन इस कथा का विचार हमें भी सुना दें तो बहुत ही हम पर कृपा होवेगी, पंडित जी बोले कि इस बात का अधिकार सब लोगों कोनहीं पर जो जन प्रेम पूर्वक भगवान् की ओर मन फेरें, और शास्त्रोक्त नियमों द्वारा अपने मन को उस ओर लगावें उनको ही, इस विचार शास्त्र का, ज्ञान हो या विचार हो सक्ता है। सो तुम लोग घरबार छोड़कर साधु होने का यत्न करो, जिससे मुक्ति मिले वा इस कथा का लाभ मिले? सो अब तुम इन कथाओं द्वारा कुछ तो भी लाभ हुआ? क्या हुआ, लाभ न हुआ? पंडित जी! ज्ञान लाभ हुआ। परन्तु हम तो गृहस्थी हैं। यदि आप कहें तो हम ज्ञान पावें, जिससे सब काम काज करते हुये मुक्ति पावें। सुखदेव जी बोले केवल ज्ञान शास्त्रोक्त वा बड़े महात्मा पुरुषों शास्त्रार्थों से मुक्ति का अधिकारी हो सकता। सुखदेव बोले ज्ञान? कैसा ज्ञान यह तो केवल कथा को तो सुख पूर्वक कही कि जिससे जो मनुष्य कथा सुने उस को कुछ लाभ होना चाहिये--ज्ञानियों को कथा क्या सुने, जब ज्ञान से मनुष्य पारलौकिक सुख पायेगा, फिर कथा से क्या? सुखदेव जी बोले अच्छा तुम चलो, कल से ही विचार! कल को, चार! सज्जन पंडित जी का उपदेश, जिस से मुक्ति प्राप्त होती सुखदेव उपदेशक, चार-पांच गृहस्थ जन विचार सुनने को आये, जब इन को ज्ञान का उपदेश हो रहा था और वे सब बड़े ध्यान से ज्ञान कथा सुनते ही विचार रहे, सुखदेव बोले यह संसार माया जाल क्या सुख इस संसार का है, सो विचार विचारने से ज्ञान होगा। तब पहला सज्जन बोला, तो महाराज! मुक्ति किस प्रकार हो? क्या कर्म द्वारा मुक्ति होगी? क्या कर्म निष्काम निष्कर्म कर्म से मुक्ति होगी? कर्म सब करते संसार धर्म काम सब ही निष्काम कर्म अपने कर्तव्य कर्म अनुसार भगवान् अर्पण करें? फिर महाराज जी ने कहा--कर्म सब छोड़ देने चाहिये सब ही पापो का रूप हैं, कर्म सब ही बन्धन शास्त्रोक्त कर्म भी पाप रूप ही ज्ञान के बिना सब अविद्या जाल जिस से आवा-गमन बन्धन सब जीवात्मा भोग रहे हैं, सुखदेव बोले केवल संन्यासी होगा? अब दूसरा जन बोले सुखदेव जी यह बात, सब लोग विचारने योग्य समझें, सब लोग अपना कर्म त्याग संन्यासी अथवा संन्यासी ज्ञान को सब त्याग दें, सुखदेव बोले हां, त्याग धर्म सब से श्रेष्ठ है, सब त्याग ही मुक्ति है, केवल संन्यासी ही मुक्ति है, दूसरा विचार सब मिथ्या है। सो चारों सज्जन उस दिन ज्ञान सुखदेव जी द्वारा सुन कर अपने घर गये। दूसरे दिन प्रातः, इन सबने अपने अपने घर में सब प्रकार का भोजन बना कर सुखदेव जी के निवास पर जा कर थाल बड़े प्रकार सजाये भोजन सुखदेव जी के आगे रख सब अपने ही हाथ से खिलाने लगे और सुखदेव जी बड़े प्रेम से खा रहे थे, तब उन चारों में पहले जन ने कहा कि हे महाराज जी, आप ज्ञान द्वारा उस निराकार ज्ञान का विचार कर भोजन जो कर रहे हैं यह सब अविद्या और माया जाल का साधन है, यह ज्ञान-वान् पुरुषों द्वारा निषिद्ध कर्म केवल इस ही बात द्वारा सुख भोगने रूप यह कर्म रूप पाप, ज्ञान का विरोधी है। सो भोजन का त्याग होना चाहिये यह सुन सुखदेव जी बोले, कि भोजन का त्याग केवल प्राण त्याग रूप पाप कर्म का ही कारण बन कर पाप रूप ज्ञान है, ज्ञानवान् तो सब पदार्थों को खा कर केवल उस द्वारा ही ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी बन सकता क्योंकि त्याग तो केवल मन का ही है। उन्होंने फिर कहा महाराज जी भोजन शास्त्रोक्त मर्यादा से यदि त्यागें, तब भगवान् का ही भजन वा ज्ञान रूप मन में ध्यान लग कर मुक्ति होगी? त्याग भी धर्म, वा अधर्म नहीं! संन्यासी केवल ही संन्यास का स्वरूप ही स्वरूप। सो ज्ञान केवल कथन मात्र सब संसार केवल इस संसार ज्ञान विचार मात्र ही का केवल दो स्वरूप हैं, पहला तो ज्ञान! दूसरा शास्त्रोक्त नियमों का, संन्यासी त्याग केवल ही, सब संन्यास मात्र विचार, सब ज्ञान चर्चा, सब संन्यासी विचार
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