माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार वह सब विचार परस्पर कर ही रहे थे कि इतने में किसी का रोने का भयानक स्वर सुनायी दिया। कौन रो रहा? किसी पर उपद्रव आया क्या? कोई पीड़ा भोगनेवाला प्राणी या विपत्ति का शिकार बना हुआ? सब स्तब्ध होकर उठे, सब साथी उस स्थान पर पहुंचे जहां से वह रोने का स्वर सुनायी दिया, देखकर वे अवाक रह गये कि उनका साथी चन्द्रदेव न वहां था न उस वन में था और न उस वृक्ष पर जिस नीचे सभी साथी एकत्रित हो रहे थे। सब कहने लगे कि यह भयानक चीत्कार हमारे उस देश- दूत साथी का था, उस समय चन्द्रदेव का निवास उस भयानक वन में नहीं था जहां वह विचार कर रहे थे। सभी साथी अब विवश थे। चन्द्रदेव तो जब वन में गिरा था तो उस समय वह कुछ समय ले--टा रहा। होश में आते ही वह उठने लगा, देखा कि भयानक अन्धेरी निशा थी, विशाल वृक्ष आकाश चुम्बी खड़े थे, जिनमें घने पत्ते तथा फूल लदकर सघनता फैला रहे थे। इसके अतिरिक्त वनस्पति का विस्तार इस प्रकार फैला हुआ था कि पग धरने का मार्ग नहीं था, पर जाना तो उस दिशा में था जहां से प्रकाश की किरणें आ रही थीं। उसने देखा कि कोई-सा दीपक दूर चमक रहा था। उसने मार्ग न पाकर, या मार्ग खोज-खोजकर आगे कदम बढ़ाना आरम्भ कर दिया। वह जहां-जहां मार्ग खोज रहा था वहां-वहां कांटे तथा हिंसक पशु विचरते दिखाई दिये। कांटों ने उसके तन को बींधना आरम्भ कर दिया था? पग-पग आगे बढ़ने लगा। पग-पग पर उस भयानक झाड़ी में, जहां-जहां भी पांव पड़ता था वहां-वहां कांटे ही कांटे पग में चुभते थे। अपने पगों में से कांटों को निकालने लगा। जहां-तहां से रक्त बहने लगा था। इन कांटों से व्यथा बढ़ गयी, शरीर का रोम-रोम, केश-केश पर भी पीड़ा व्याप्त होकर टीस उठने लगी, तभी, उसने उस कांतारमय वन में कह दिया! कोई दया करो मुझ पर। इस वन में सब प्रकार संकट झेलता हुआ मैं निराधार होकर पड़ा हुआ हूं। कोई तो आ कर मुझको इस वन से निकाल कर मेरा उद्धार कर दो, हे दयावान्! कृपा करो मेरे ऊपर। इस संकट से मुझे बचाओ! उस का यह रोना-चीत्कार, इस वन में सब ओर गूंज उठा। सब ही विह्वल हुए, कांप-कांप उठे, पर आ न सके। क्योंकि वे सब अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। पर चन्द्रदेव विवशता से रो रहा था। सुनो! कोई दया का भण्डार दयालु बन कर आ जाओ! इस भयानक कांतार वन से मुझे निकालो। मुझ पर दया कर इस संकट से मुझे बचा लो। चन्द्रदेव कहता था? मुझ पर कृपा करो, मुझे इस भयानक कांतार से बचाओ! सब कह रहे थे, तू अपना धीरज न छोड़ना! कोई न कोई शक्ति इस ओर आ ही रही होगी! वह सब ही चन्द्रदेव का सहारा बनने का यत्न कर रहे थे! वे सब ही चन्द्रदेव को दिलासा दे रहे थे। चन्द्रदेव की पुकार तो किसी पर प्रभाव नहीं डाल सकी, वह तो कांतार वन के संकट को और भी बढ़ा रही थी। चन्द्रदेव को तो कोई शक्ति उस वन से पार नहीं कर सकी! सुनो! सुनो! उस चन्द्रदेव का यह सब कुछ तो व्यर्थ प्रतीत हुआ, वह तो मृत्यु के मुख में था। "ओम्" का नाम सब कुछ-कुछ तो कह रहे थे, चन्द्रदेव के मुख से... न निकला था! चन्द्रदेव पुकार किसे रहा था? जिसने उस वाणी को जन्म दिया था, उस प्रभु को? अथवा अन्य जीवों को? उस अज्ञान को? उस अविद्या की शरण को? उस भयानक अन्धकारमय वन में जब वह, उसी समय भयंकर अन्धड़ का एक तेज झोंका आया उस भयानक वेग से वन कांपने लगा था कि भय से चन्द्रदेव कांप उठा। साथ ही तेज वर्षा होने लगी। ओलावृष्टि से वह पीड़ित होने लगा। वर्षा की मोटी-मोटी बूंदें उस पर पड़ कर पीड़ा बढ़ा रही थीं, बिजली की कड़क अलग थी, अन्धेरी निशा तो थी ही। उस पर भयानक वज्रपात भी होने लगा था, जिससे उसका हृदय कांप उठा। ऐसा लग रहा था कि अब मृत्यु आ ही गयी, वह अपने को असहाय पा रहा था। वर्षा, अन्धड़, बिजली-कड़क तथा ओलों ने उस पर भयानक मार की। उसने उस संकट में एक वृक्ष का सहारा लेना चाहा, तो वह वृक्ष भी वर्षा से भीग चुका था, उससे जल की धाराएं उस पर गिरकर उसकी व्यथा को और भी बढ़ा रही थीं। उसने उस अन्धकार में चारों ओर दृष्टि डाली, पर कोई भी ऐसा न था, जो उस का सहारा बने। वह रोता-चिल्लाता हुआ अपने प्राणों की रक्षा के लिये पुकारने लगा। तभी उसका ध्यान उस दीपक की ओर गया, जो बहुत दूर चमक रहा था। वह उस ओर देखने लगा, पर जब वह देखता, तभी घोर अन्धकार छा जाता और वह घबरा उठता था, क्योंकि वह 143