माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार महाराज पृथुकी यह बात सुनकर सब सभा विस्मित होकर श्री राजा पृथुकी-बड़ाई बड़े प्रेम करके बारम्बार कहने लगी, कि जिसने अपनी प्रजाको सब सुखीकिया सो तो सब जगत् जानता हैपर यह बात, सब प्रजा जिसपर प्रसन्न रहे यह गुण इस महाराजहीके विषे पाया जाता, इससेअधिकक्याकहें जिस बातपर प्रजा प्रसन्न हो सो बात महाराज प्रजाको सुख देनेवाली विचारके करें इस प्रकार सब राजाके गुण गातेथेकि इतनेमें चारों सनकादिक मुनि आये सो ऐसे प्रकाशित मानों चार सूर्य्यही उदय हुएहों अथवा ब्रह्माजी के चार वेदही मूर्त्तमान हों, उनको इस प्रकारसे आये देख राजा पृथु-सहित जितनी सभाथी, जितने लोग वहांपरथे वे सब उठकरके खड़े हुए और हाथ जोड़ करके जो वस्तु भेंट धरने की योग्यथी सो हाथमें धरके चरणोंपर दण्डवतकी और कहा, हेप्रभो ! कहो कैसे? हम पर कृपा करके आयेहो सो कहो, महाराज कहिये, कुशल तो आपकी? मुनिबोले कि कुशल तो सर्व, प्रजा अपनीपर जो तू दयाल रहताहै! कुशल हमारी, जहां तुम्हारी कुशल? सो कहो सब प्रकार कुशलहै? राजा पृथुबोले सब प्रकार आपकी कृपासे कुशल? सो कहिये महाराज! सन मुनिका रूप जब यह सुना, राजा तो सब बातन योग्य, सो महाराज को! राजा पृथुकी प्रसन्नता देखके; राजा पृथुके आसन बैठके सनकादिक चार भाइयों को बिठाये; फिर राजा जो पृथुके संग आये राजा मुनियोंके चरनामृत को अपने सिर पर डारके फिर हाथ जोड़के सन मुनियों के आगे खड़े! हाथ जोड़, राजा यह बोले? प्रसन्न हो गयेहो? यह कहके दोनों कर जोड़े खड़ारहे! तब सनक जी बोले, हेराजा बहुत प्रसन्न होकर हम आयेहैं सो महाराज तुम्हारी भक्ति से प्रसन्नहैं सो तूने जो, ऐसा राजा हो कर मुनि जनन का मान किया सो सब बातन योग्य यह महाराजा का धर्म सो सब पूर्ण, पर हम यह जाने हैंकि जो ज्ञानी होय और सब जीवों पर दयालहो सोई राजा सब को सुख दाता होय, सोई राजा तू, पर हमपर कृपा जो करी सो बातन योग्य हैपर, तू ऐसा राजा दयाल सब प्रजापर; जो अपने सेवक जनपर दया राखै, अपने-आपपर भी दया राखै कृपाका पात्र होताहै सो तू, और सब प्रकार सो समर्थ होकर धर्मके कार्यमें लीनहै! राजा पृथु, राजा सगर. राजा हरिश्चन्द्र, पृथु-महाराज भये सोई, और जो जो बड़े बड़े महाराजा भये सो राजाओं का जो मान करे सो पुण्यात्मा राजा पृथुकी यह सबबातें सन मुनिकी सुनके मुनिको आसनपर बैठायके सब चरण धो, उनके चरनामृत को अपने सिर ऊपर डारके, सब सभा पर छिड़क छिड़काया पृथुकी यह विनम्रता देखकर मुनि बोले, सुनो राजा पृथु, तुम बड़े भाग्यवान् हो, सो भगवान् प्रसन्न भये हैं? सो राजा यह बोले, हे मुनि कृपासे सब बात समर्थ हो सो बातन सामर्थ्य होय, हमारे भाग्य बड़े दया जो आपकी सन मुनि बोले हम सब तो नारायणके भक्त होकर सब जगमें भ्रमण करते हैंपर जो पर दयाल हो सो जन बड़ा सो जगमें सब साधु-संतन को मान देय सोई ज्ञानी भक्त दयाल कहलाय नारायण का सो भक्तकहलाय, सो तू ऐसा दयाल सर्वपर दया, सब पर कृपा करके नारायण चरण को चित्तमें आराधनकिये दयाल भये सोई ज्ञानी सो राजा पृथुके ऐसे वचन सुन, राजा पृथु-सनकादिक मुनि जन सब मुनि को प्रणाम करि हाथ जोड़के अपने हृदय पर हाथ राखके बोला हेप्रभो, जो महाराज आयेहो सो जग तारन... को आयेहो महाराज बात हमारी ऐसी नारायण कृपासे सबबात समर्थ ज्ञानी वैकुण्ठ पधारे मुनि, एक बातन का संशय मोको निवारिये सब बातन को जानिये सब बात को जानने समर्थ हम सब संशयको निवार करके सब संशयको दूरकरो, हमारा संश मिटाइये? जो ऐसा जो सब को जानत सब, सब जानन हार, हमारा यह संशय है? इसका निवारण कीजिये मुने! सनक जी बोले, हेराजा तू, अपना सब संशय कहिये? राजा पृथुने हाथ जोड़ हाथ जोड़के कहा, हेप्रभो संसार की सब माया जगत विषे व्याप रही सोई सब जनन को मोह से बांधे अपने स्वरूपको भूल माया द्वारा भ्रमाये जीवों को संसारमें बांधे, पर, इसका कारण क्याहै? माया तो सब जगमें, माया को कौन जानै सो यह बात सुनो, मुनिराज! ऐसी मायाकी संशय दूरकरो जी, जो-जीव माया को जानै सो कैसे जानै माया व्यापत सब जीव पर यह राजा पृथुकी सुनके सन बोले, जब तू सब जान गया सो सब बातन योग्य जगत का मोह सब संतोंको सो सब मोह को त्याग करके भजे, तब मुक्ति पावैगा सो तू ऐसा ज्ञान रखके माया रूपको भी नारायणकी ही माया जानकरके भजो अब तू मायारहित होकर नारायणको ही भजकरकेसदा सुखी रहै और 145