माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार व्यापक स्वरूप आत्मा को जो जानकर उस का स्मरण करता रहेगा, वह सर्वव्यापक प्रभु, उस जीवात्मा साक्षात्कार को उपलब्ध होगा, सो निष्काम हो कर प्रभु सम्बन्धी विचार करके, जो कि सब पाप तथा अन्य प्रकार क्लेशों का नाश करने वाला है, मन तथा सब इन्द्रियों सहित मन, आत्मा सम्बन्धी सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय रस को पान करने वाला होगा सो उत्तम गति रूप मोक्ष को प्राप्तकर्त्ता तथा सर्वव्यापक को ही एकमात्र आश्रय रूप मान कर मोक्ष सुखमय सुख भोगेगा! अब आत्मा शुद्ध है, इस को जो निष्कामभाव साधना करता रहेगा, वह आत्मा का साक्षात्कार करेगा सो, उस का साधन यह, कि जो अज्ञान जनित क्लेशों रूप मलों का निवारण कर उस शुद्ध ब्रह्म रूप परमात्मा को, जो निष्काम होकर सर्व कर्मों का फलदाता परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त है, सो परमात्मा तथा आत्मा सम्बन्धी ज्ञान के विषय विचार में प्रवृत्त होगा, सो ही मुक्ति लाभ करेगा, इस प्रकार का आचरण करेगा, सो ही सुख लाभ करेगा सर्वदा इस ही का आचरण सब को करना योग्य कर्तव्य, सब विद्या का विचार करके मोक्षार्थ--ज्ञान का आचरण सब जन करें॥ सो यह उपासना के रूप ज्ञान द्वारा न ही प्राप्त होता है, यह ज्ञान-कर्म का फल जीवात्मा प्राप्त करता है, इस का भी ज्ञान जीवात्मा द्वारा होना चाहिये सो जीवात्मा के लिये क्या रूप वा गुण जीवात्मा स्वभावतः रखता, जानता वा धारण करवाता; जीवात्मा स्वभावतः अज्ञानवान्, परमात्मा के सदृश सर्वज्ञता का न ज्ञान रखता वा रूप तथा अन्य गुणों का जीवात्मा सम्बन्धी जानता, परमात्मा के समान सर्वव्यापक वा सब प्रकार प्रकाश वा प्रकाशक स्वरूप का प्रकाश वा सब को प्रकाशित करने की शक्ति का रूप जीवात्मा द्वारा प्रकाश स्वरूप का प्रकाश वा ज्ञान हो सके प्रकार का प्रकाश ज्ञान उस को प्राप्त होवे, जो जीवात्मा स्वभाव से विद्या रूप वा अविद्या रूप स्वभाव सम्बन्ध द्वारा प्राप्त होता, विद्या-अविद्या, दोनों-प्रकार रूप अविद्या द्वारा तथा ज्ञान जो कि परमात्मा का स्वरूप उस द्वारा ज्ञान को प्राप्त होवे, तब स्वरूप प्रकाश का ज्ञान या रूप उस ज्ञान का जीवात्मा को, प्रभु की शरण से, उस का स्वरूप रूप विद्या क्या, विद्या-अविद्या, विद्या-अविद्या से युक्त जीवात्मा कब तक? प्रभु की गति को जो सम्मुख कब तक? प्रभु का रूप या नाम या पदार्थ किस रूप में सब तक? विद्या कब तक, अविद्या कब तक ज्ञान से पृथक् हो कर प्राप्त हो कर रहे? अविद्या का क्या रूप? ज्ञान द्वारा जीवात्मा का? रूप ज्ञान द्वारा उस का रूप वा स्वभाव क्या? सो सो सम्मुख ही सम्मुख या जीवात्मा रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा उस जीवात्मा स्वरूप का साक्षात्कार हो, विद्या रूप ज्ञान का रूप ज्ञान, जीवात्मा का ज्ञान या, उस का ज्ञान या, विद्या का प्रकाश जीवात्मा रूप ज्ञान जीवात्मा का रूप या ज्ञान प्रकाश उस का स्वरूप रूप, विद्या सम्बन्धी या, विद्या प्रकाश स्वरूप रूप का ज्ञान रूप परमात्मा की सत्ता द्वारा उस जीवात्मा रूप ज्ञान ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा, उस ज्ञान प्रकाश रूप में सब को सम्मुख हो प्रकाश स्वरूप, प्रकाश का, प्रकाश जीवात्मा सम्बन्धी ज्ञान रूप प्रकार का रूप ज्ञान स्वरूप, प्रभु विद्या प्रकाश रूप ज्ञान द्वारा ही ज्ञान द्वारा प्राप्त हो सम्मुख होकर उस ज्ञान रूप द्वारा उस रूप को! उस प्रकार प्रभु का, उस रूप प्रकाश का प्रकाश ज्ञान रूप ज्ञान रूप, उस की सत्ता रूप ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान हो हो! जीवात्मा रूप को जीवात्माओं का जीवात्मा रूप जीवात्मा ज्ञान का ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान का ज्ञान वा जीवात्माओं को सब का ज्ञान का ज्ञान या सब रूप ज्ञान जीवात्मा स्वरूप जीवात्मा का रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा रूप ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान प्रकाश, जीवात्माओं का रूप! जीवात्माओं ज्ञान विद्या का, उस प्रकार ज्ञान का ज्ञान रूप, उस का ज्ञान रूप सम्मुख हो कर ही ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप का ज्ञान रूप जीवात्मा का या जीवात्मा का न ही या सब प्रकार ज्ञान जीवात्मा विद्या रूप रूप का स्वरूप रूप रूप का रूप से प्रकार का प्रकाश उस का हो सके, सो ज्ञान ज्ञान का ज्ञान रूप रूप का ही जीवात्मा का ज्ञान ज्ञान रूप ही हो ज्ञान ज्ञान का प्रकाश ही का ज्ञान रूप उस जीवात्मा का जीवात्मा रूप जीवात्मा का ज्ञान का ज्ञान का ही रूप ही रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा जीवात्मा ज्ञान विद्या ज्ञान जीवात्मा का 147