भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

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विचारशील मनुष्य सदा सोचा करते, संसार असार तथा नश्वर जानकर इस भवबन्धनसे छूटनेका यत्न करते हैं। हे प्रभो! हमारे सिरपर अनेक प्रकारके क्लेशोंका भार भरा हुआ संसारसागरके! हम बड़े दुर्बल, ज्ञान तथा बलसे हीन, संसारके विषयसुखों पर मोहित हो विषयान्धकारमें पड़े हुए, मोहवश इस नश्वर देहको स्थिर समझकर अनेक तरहके पाप कर रहे हैं। हे दयासिन्धु! कृपानिधान! हमें अपनी शरणमें लो तथा ऐसा ज्ञान प्रदान करो कि जिससे हम समस्त पापोंसे छूटकर इस नश्वर देहके मोहको छोड़ आपके पादारविन्दोंमें मग्न रहें। भगवान्‌की इस प्रकारकी गुणस्तुति--प्रार्थना करके शान्तिस्वरूप परमात्मा चिन्ता दूर करके अपने स्वरूपमें विलीन होजाते। इस उपनिषद्‌का यही रहस्य है, सब प्रकारके सब पदार्थोंका त्यागकर नित्य आनन्दस्वरूपकी ओर अपनी वृत्ति लगानी चाहिये तथा परमात्माके ध्यान तथा ज्ञानको प्राप्त करके सन्तोष, आत्म-लाभ करना, यही परम कर्त्तव्य है। हे सर्व-शक्तिमान् प्रभो, हे अनाथ-शरण दीनबन्धो, हे दयामय अशरण शरण परम दयालो, हे हमारे दुःखोंके दूर करने वाले, हे नित्य आनन्द प्रदान करने वाले हम तेरे अनाथ बालकोंपर दया करो तथा ज्ञान देकर हमें मोह-निद्रासे जगाओ, सदा अपने ज्ञान, बल तथा आनन्दमें लीन रखो जिससे कि हम सब भी सब प्रकारके द्वन्द्वों, मान-अपमानको समान समझकर, सब प्रकारके मोहको छोड़कर, उस परम पदको प्राप्त करनेमें रत रहें। आत्माको सब प्रकारके दोषोंसे रहित मान, सब कुछ त्यागकर, उस परम विभुको सब भूतोंमें सम प्रकाश करनेवाला जान उसका ध्यान करना चाहिये? उसको जानना? उसकी ओर ध्यान देना? उसकी स्तुति-प्रार्थना करना? सर्व-व्यापक विभु सच्चिदानन्दकी शरणमें जाना चाहिये जिससे कि जन्म- मरणका भय, पाप-पुण्यका भय, अज्ञान-अधर्मका भय सर्वथा निवृत्त होजाय, तथा परमात्माके ज्ञान स्वरूप होकर जीवात्माको उस आनन्द रूपका तथा आत्म-तत्त्वका यथार्थ स्वरूप समझमें आ जाता है। तब वह इस नश्वर जगत्‌के विषयोंमें सदा आसक्त न रहकर नित्य अपने स्वरूपका मनन करता हुआ, अपने स्वरूप अर्थात्‌ ईश्वरको ही सबमें ओतप्रोत देखता है। ईश्वरके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान जबतक मनुष्यको प्राप्त नहीं होता, तबतक अज्ञानके कारण नाना प्रकारके क्लेशों तथा दुःखोंका भोग करना पड़ता है। जीवात्मा मोह तथा अज्ञानावस्थाके कारण ईश्वरको अपनेसे पृथक् समझता है। यह नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता हुआ उस जगदीश्वरपर दोष लगाता है, जो कि सर्वथा भ्रम तथा अज्ञानका ही परिणाम है। अतः जगत्-सृष्टिके सब पदार्थोंका यथार्थ रूप जानकर, निर्लेप, निर्विकार, निष्काम, शुद्ध तथा निर्मल आनन्द-स्वरूप परमात्मामें सदा लीन रहना चाहिये। इस प्रकारसे परमात्माके ध्यानके अभ्यासका फल बतलाकर अब उस ध्यान योगके रूपको वर्णन करते हुए उस जगदीश्वरके स्वरूपको सब प्रकारके दोषोंसे रहित तथा सब भूतोंमें उस परमात्माके व्यापक स्वरूपको दिखाते हुए, उस व्यापक नित्यस्वरूप परमात्माके ध्यान तथा मननके द्वारा समस्त प्रकारके क्लेशोंसे छुटकारा पानेका उपदेश इस मन्त्रमें दिया गया है। क्या स्वरूप है? उस सब प्रकारके क्लेशोंसे छुड़ानेवाले, उस परमात्माके स्वरूपका इस मन्त्रमें वर्णन किया गया है। परमात्माका स्वरूप सब प्रकारके अज्ञानसे परे प्रकाश स्वरूप माना गया है। वह सच्चिदानन्द प्रभु है। आत्माको उस परमात्माके उस ज्योतिर्मय रूपका ध्यान करना चाहिये जिससे कि यह अज्ञान, सब प्रकारके अन्धकारसे परे होकर उस सर्वव्यापक परमात्माके शरणको प्राप्त होकर मुक्ति लाभ करके जन्म मरणके चक्रसे छूटजाय। ईश्वर अविद्याके सब प्रकारके अन्धकारसे परे प्रकाश रूप आत्मा, ज्योतिर्मय आनन्द-स्वरूप परमात्मतत्त्वके रूपमें अपने भक्तजनोंके हृदयमें सदा प्रकाशमान है। परमात्माका स्मरण करते हुए, उसकी स्तुतिको बारम्बार पढ़े॥५॥ 154