माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकहना उचित होगा कि यह सब कुछ एक ही स्थान पर आवश्यकता से कम समय व्यतीत करके किया जा सकता है? नहीं, ऐसा कभी संभव नहीं । जब तक मन और इन्द्रियों तथा इन दोनोंके मूल को शांत न, कर मन तथा इन्द्रियों द्वारा होनेवाले व्यवहार को समाप्त करके मूल का ही लय नहीं कर दिया जाता तथा जब तक उस शांत पदमें विश्राम नहीं मिल जाता! या जैसा उपनिषद् में कहा गया कि शांत आत्मा में पहले वाणी को शांत करो या वाणी तथा मन को शांत कर विज्ञानमें, लय करो या मिलाओ! तब कहीं यह सब या ऐसा कार्य समाप्त-समाधान को प्राप्त हो सके गा, तब कहीं सच्चा सुख या आनन्द प्राप्त होगा, तो क्या ऐसा संभव हो सके? यह अभ्यासप्रयास सब कुछ तो अभ्यास की सहायता से धीरे धीरे ही हो सके गा और उचित काल में ही संभव होगा और होगा, ही होगा, पर ऐसा विचार करके मन को शिथिल न होना है? आत्मसाक्षात्कार या आत्मज्ञान को प्राप्त हो जाना कोईसाधारण बात नहीं है बल्कि अत्यंत कठिन कार्यहैतथाअत्यंतसाधनाके बलपरहीहोसकता बात यह सब, अभ्यास या विचार द्वारा धीरे ही धीरे सिद्ध हो तो उचित ही कहलायेगा, यह उचित कहलायेगा, तो फिर साधनकीआवश्यकता क्यों सारा संसार अभ्यासकी ही साधना में लगा हुआ दिखाई देता है। चाहे वह ज्ञान विषयक हो चाहे वह कर्म या कर्म फल फल भोग रूप विषयक साधन क्यों न हो। प्रत्येक नर या नारीको हर समय यही चाहना बनी रहती हैकि जो कार्य वह कररहा है या करेगा वह सुख- कारक अवश्यही बन जावे या वह ऐसा कार्य करेजिससे अधिक सेअधिक लाभहो ताकि वह अधिक से अधिक सुखीहो सके। क्या कभी कोई ऐसा उपाय दिखाई दे रहा है? कभी ऐसा हो भी रहा है। कभी नहीं और न ही कभी संभव दिखाई देता है। केवल अभ्यासमात्रसे ही सब काम चल नहीं सकता या अभ्यासके ही भरोसे सब कुछ नहीं हो सकता सब कुछ-तो सब कुछ सब कुछ नहीं रहता तथा सब कुछ नहीं किया जा सकता कि हर कोई अपनी ही इच्छानुसार सब कुछ-तो क्या कुछ भी कर सके गा, यह बात नहीं, पर जो कुछ होगा या सब कुछ होगा, इसके लिए, उचित काल विचार की तथा सब कुछ-तो सब कुछ काल तथा काल द्वारा ही सब कुछ तो क्या सब कुछ बन जाने पर अभ्यास या अभ्यास का बल काम करेगा या दे सकेगा! सो अभ्यासकीआवश्यकता तो हर ही काल में बनी रहनेवाली बात तो सदा बनी हीरहेगी फिर भी विचार किया जाता हैकि जो कुछ, हो रहा है या होवेगा उसके हो जानेपर ही अभ्यास होगा, ऐसा सोचना या मानना भी उचित तो नहीं होगा कि जब सब कुछ हो जावेगा तब सब कुछ, हम करेंगे तथा साधन करेंगे या यह सोचना कि काल आने पर होगा, सोभी विचार कालके भरोसे ही छोड़ देना है। सो अभ्यास को भी तो साथ ही साथ में रखना होगा ही या अभ्यास केवल साधन ही बनकर रहेगा तब ही तो कार्य या अभ्यास फल दे सकेगा तथा काल ही काल सब कुछ अपने आप करता है या करेगा, यह भी नहीं कहा, जावेगा या कहा जावेगा? सो दोनों का ही साथ साथ में ही योग, बन रहा है या दोनों का ही योग रहेगा सो जो अभ्याससहित अपने स्वरूप विचारमेंलगा हुआहै वह सब कुछ अपने ही हाथ में कर रहा है। सो जो आत्मविचारमेंलगा हुआहै वह सब कुछ अपने वश में ही समझ रहा है या समझ गया है अभ्यास या अभ्यासकी बात स्वयं ही सिद्ध हो या समझमें आ रही है? क्या वह कालके भरोसे बैठा रहेगा अथवा काल अथवा काल काल का नाम ही लेता रहेगा अथवा काल के भरोसे ही सब छोड़ कर वह बैठ जावेगा या बैठ गया है? नहीं वह तो अभ्यासद्वारा सब कुछ करता हुआ ही बैठ सकता हैतथा काल को भी वश करसकताहै अभ्यास के बलपरहीसबकुछ संभव किया जा सक ताहै? और जो ऐसा करता रहेगा वही कालके प्रभावसे बच सकताहै तथा वह ही काल, काल बन कर काम कर सकता तथा काल को वश में रखकर अभ्यासके बलपर ही सब कुछ कर रहा है। अभ्यास कालकी चाल चाल चलता है। अभ्यास सब को दबा कर रखता है। अभ्यास ही काल को वश में कर सकता है। अभ्यास के बलपर ही काल को दबाया जा सकता है। अभ्यास सब, का ही काम कर सकता! काल सब कुछ नाश करने वालाहोने पर भीअभ्यास के बल के आगे नतमस्तक हो, काल ही काल को वश कर के सब कुछ नाश कर रहा 4