भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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जीवन का सबसे पहला लक्षण या विशेषता स्वयं रक्षा और अपना विकास ही माना गया जिस रूप उसने चाहा, या वह अपने माता-पिता के रूप समझाता, उस रूप उसने उस विकास अथवा जीवन को भय अथवा संकट देखा तो, वह चिल्ला उठा, प्रतिवाद करता रहा, अपने जीवन की, अपनी ही रक्षा उसने की तथा अपने माता-पिता का ध्यान अपनी कठिनाई की ओर खींच दिया यह उसका पर विचार यदि ध्यान दिया जाए तो ज्ञात, मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्रता प्रिय या प्रेमी रहा किस प्रकार की मुक्ति वह चाहता? किस वह मुक्ति या स्वतंत्रता अपने जीवन विकास के लिए ही केवल वह चाहता था? जिस वह मुक्ति अथवा विकास चाहता था वह कहाँ तक सही थी? अनेक प्रकारों से, परिस्थितियों के दो रूपों द्वारा उसे सिद्ध किया जा सकता जा रहा था, और वह यह भी अनुभव करने लगा था कि आगे, वह किस दिशा प्रवृत्त हो? इसी प्रकार से वह इस और अपने विकास को नए सिरे देकर मानव स्वरूप में प्रवेश कर रहा था, या यह कहिए कि वह अपने नए रूप अथवा दिशा को जान ही गया, या फिर उसने यह जान ही लिया अपनी ओर उसने अब जो स्वरूप या रूप देखा था क्या वैसा पहले कभी देखा था? या केवल उसने अपनी रक्षा और अपने शरीर रक्षा तक अपने आप को रखा, या स्वावलम्बन तक ही था, जिसे स्वावलम्बन कहा जा सके, जिसे केवल मनुष्य अपनी रक्षा, या फिर केवल अपनी सन्तान रक्षा तक सीमित समझे अब उसके कदम और विस्तृत होकर पड़े, उसकी दृष्टि कुछ और, उसकी समझ कुछ और, उस दिशा स्वरूप दिशा बनकर उस ओर उसने पहला कदम उठाया तो वह क्या स्वरूप था? जिसने यह पहला कदम देखा, उसने देखा केवल, स्वावलम्बन स्वरूप जिसे उसने सही जाना था, और जिसे उसने अपना लक्ष्य या दिशा स्वरूप भी स्वीकार कर लिया था? स्वरूप तो वह केवल स्वरूप ही देखा जा रहा था और मनुष्य के मन में उसका जो रूप निर्मित हो रहा देखा जा रहा था वह तो एक ऐसा रूप लेकर सामने आया, जो केवल उस रूप तक सीमित रहकर रह गया इस ओर उसने जब नया कदम रखा, उसने पहला स्वरूप किस प्रकार का लिया था जिसमें केवल दूसरों पर प्रभाव था? जिसने उस पर प्रभाव था, उस दिशा द्वारा उसका रूप जो बना, उसने उस रूप को अपने प्रभाव का साधन ही तो माना था, वह प्रभाव किस पर था और क्यों! जो अपने स्वरूप में तो स्वयं को उस रूप में प्रस्तुत कर रहा अथवा जिस स्वरूप में वह अपने आप को देख रहा था, प्रभाव केवल उसका ही, सीमित रूप ही स्वावलम्बन रूप कहा गया जब तक वह रूप इस स्वरूप तक ही एक सीमा तक, जिसे यह कह कर नया रूप दिया गया, जिसे यह भी कहा गया, रूप जो उसने अन्य को प्रभावित करके उस पर केवल अपना ही शासन या प्रभाव तो न देखा हो, उस रूप को तो स्वा- मी कहा जा रहा था अथवा वह यह स्वरूप इस प्रकार से था जिसने प्रभाव तो कर दिखाया रूप को नया ही, पर वह प्रभाव उस सीमा तक ही रहा, जो था अपने घर तक, या उस सीमा तक कहा, जो घर या परिवार अथवा समाज तक ही सीमित रह सका, या यह कहा गया हो, जिसको हम समाज कहा जाए या केवल परिवार स्वरूप समझा जाए, अथवा यह, कि वह रूप जो केवल अपने तक सीमित रहा उसे तो केवल समाज की सीमा के बाहर माना गया केवल समाज का रूप तो तब तक ही एक रूप में तब तक रहा जब तक केवल अपना ही रूप था! केवल उस समय स्वरूप केवल सीमित था समाज की उस व्यवस्था तक सीमित या सीमा थी, जब तक समाज केवल व्यक्तिगत परिवारों तक ही रूप बनाकर खड़ा रहा था या व्यक्तिगत स्वरूप समाज के व्यक्तियों द्वारा अपना व्यक्तिगत या स्वरूप ही बन सका जिसे समाज का नाम भी दिया गया और इस नाम स्वरूप से ही उस समाज स्वरूप को देखा जा सका था या समझा गया अथवा माना जा सका था, व्यक्तिगत रूप समाज! समाज-का तो वह रूप उस समय तक सही रूप कहा गया समाज कहाँ तक समाज! जब व्यवस्था एक परिवार से हो ही नहीं सकती थी, समाज का रूप बन ही नहीं रहा था जब तक समाज का रूप नहीं था केवल स्वयं तक ही! समाज अथवा जो दिशा दी जा रही थी वह केवल परिवार से प्रारम्भ, या दो पारिवारिक लोग मिलकर या उस से अधिक उस स्वरूप--के आधार पर था, समाज बन सके, ऐसा होना ही था, जिस समाज का रूप

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