माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस एक वाक्य का अर्थ समझना हर एक जन-जन को अति नितांत आवश्यक था, केवल सुनना भर मात्र कोई लाभ कारक या कारण बन सका है? इस असंतोषप्रदायकता का उत्तर हर एक जन को मिल चुका था जन-जन इसके परिणाम भुगतने को वि-वश मजबूर हुआ था, जब तक शक्ति थी, क्षमता वि-वश होकर कराहता ही जाता, पर शक्ति का नाम मात्र शेष न बचा था। हर मानव का तन जरजर तो था आत्मा भी रोती थी, परिवार में शांति का नाम निशान तक न बचा था, केवल उस ही दशा द्वारा जीव-जन्तु त्राहिमाम् का रूप धारण कर इधर उधर भाग तो रहे थे पर विवशता का भार इतना भारी तथा असहनीय था जिसके परिणाम स्वरूप सभी; परिवार संताप की ज्वाला भयानक ज्वाला भड़क कर घर-गृहस्थी का विध्वंस कर उस भयानक अग्नि ज्वाला में ही भस्म होकर स्वाहा हो जाते। केवल शक्तिमान ही ऐसा था जो बचन शक्ति रखता था अथवा जिसे पूर्ण रूप से प्रभु-कृपा प्राप्त या सुरक्षा कवच का वरदान था, अन्यथा हर मानव अपनी सुरक्षा का दावा कर इसका पूर्ण दायित्व लेने में असम- र्थता था, हाथ पैर, साधन सब कुछ होते हुए भी यह सब कुछ रहते हुए भी मानव हाथ पर हाथ धरे बैठा असहाय बन रोता, पर उस दशा का कोई अंत न दिखाई देता? इस तरह प्रलयंकारी रूप हर एक को अपना ग्रास बनाता, केवल आश्चर्यचकित दृष्टि, मूक विवशता भरा यह वातावरण सब को सब ओर से घेरे हुए था। उस समय सब के सब जो जो जीवित थे केवल कंकाल, दुर्बलता का स्वरूप विवशता, लाचारी का भयानक स्वरूप हर व्यवस्था तथा शक्ति शून्य होकर भय से कांपते थरथराते दयनीयता के उस चरम शिखर जिसे विनाश कहा जाता है पहुंच चुके थे। केवल मात्र आशा जिसे किरण का नाम दिया जा सके उपलब्ध शक्ति द्वारा शून्य नजर, सब दिशाएं घोर अंधकार का रूप बन चुकी थी चारों ओर से असहायता ही असहायता का नग्न तांडव सब तरफ व्याप्त था, हर आश्चर्यचकित था कि प्रभु कहां हैं! जो सब रक्षक हैं वे कहां हैं? यह पुकार हर एक के अधरों अथवा कंठों द्वारा निकल रही थी, सब तरफ से भयानक चीत्कार, चीख ही चीख, विकट विद्रुप रूप हर ओर से मानव को पल-पल को ग्रसता हुआ, दिखाई देता, मानव केवल यह ही कह सकने योग्य था कि, हे प्रभु इन सब का अंत कब होगा, या इस स्वरूप का भयानक परिणाम ही सब कुछ नाश करके स्वतः-समाप्ति की ओर होगा। पश्चात्ताप की ज्वालाएं प्रज्वलित हो हृदय-अन्तःकरण को जलाकर भस्म कर दिया करती थी उस समय केवल रुदन था जो सब ओर सब को घेर रहा था तथा, हर एक पश्चात्ताप या पश्चात्ताप ही करता था, वास्तविकता से सब मुंह तो मोड़ते थे, परंतु उस मुंह मोड़ने का परिणाम भयानक था, सब ने, सबने मिलकर पश्चात्ताप का पथ चुना था, पर बिना दिशा के केवल रोने का मार्ग सब तरफ व्याप्त था। केवल आंसू थे जो बहते जाते थे तथा उनका बहाव सब कुछ बहा कर ले जाने समर्थ हो चला था, केवल रो रोकर जीवन व्यतीत हो रहा था पर उस बहाव अथवा रुदन का कोई केवल यह विचार ही सब हृदय में बार बार उठता था कि हम सब जीवित क्यों हैं? या, जीवित रहने का क्या फल मिल रहा है? केवल यही विचार सब को मथ रहा था, पर कोई उपाय उस भयानक अंधकार में से निकलने का नहीं सूझ रहा था। केवल मृत्यु, जो केवल एकमात्र मुक्ति का ही पथ या द्वार, सब को ही नजर, सब को ही अंतिम परिणाम दिखाई पड़ता नजर आता दिखाई पड़ता नजर आता! सब केवल यही सोचने लगे, हर एक केवल मृत्यु द्वारा अपने जीवन की समाप्ति को ही, केवल मुक्ति को, ही इस महान संताप स्वरूप भयानक कष्टों मुक्ति नजर आती! केवल विचार सब को ऐसा ही नजर आता! केवल इस तरह सब सोचते हुए भयानक परिणाम को हर एक विचार सोचने को बाध्य था, जिसका कोई परिणाम अथवा निराकरण सब के सब जन मिलकर खोजना चाहते थे अथवा यह विचार किया करते? हर एक भयानक परिणाम का अंत कब होगा? इसका क्या रूप होगा? इसका जो स्वरूप बन चुका था उससे हर एक अत्यंत ही भयभीत था। भयानक संशय तथा भयानक ही सब ओर का रूप जो सामने था, हर एक मानव को यह सोचने तथा जीने योग्य नहीं छोड़ता नजर! सब तरफ ही अंधकार नजर! हर दिशा शून्य का ही स्वरूप दिखाई देती थी हर वातावरण में केवल अंधकार तथा अंधकार भरा स्वरूप? हर ओर संशय ही तो व्याप्त देखकर था, केवल यह सब भयानक स्वरूप का रूप हर तरफ तथा इस भयानक का स्वरूप बढ़ रहा था। सब इस तरफ व्याकुल होकर एक दूसरे को केवल भय से देखते भर ही पाते थे, पर हर एक सब कुछ खोकर केवल असहायता का स्वरूप धारण किए-हुए आश्चर्यचकित ही बैठा विवशता लाचारी का रूप सब ओर भरा नजर आता? सब आश्चर्य ही भरा न था! 49