माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसो भाई, उस दिन को स्मरण करके आज पश्चात्ताप करो अथवा न करो सो तुम्हारी इच्छा पर छोड़ दिया जाता अथवा नहीं, उस पश्चात्-तापसे उस को सुख-ही सुख अथवा आनन्द-आनन्द होगा वा नहीं उस मनुष्य को उस सुख वा आनन्द पर क्या कुछ सन्देह-सा ठहरताहै ? और जो पश्चात्ताप वा उस समय उत्पन्न हो जाता रहा, तो उसका फल किस प्रकार होता सो आज तक उस को सुख--आनन्द और सुख-हीन तथा केवल दुःख का मुख तक भी नहीं मिला सो कहा नहीं जाता है, परन्तु उस सुखस्वरूप को, जिससे सब किसी मनुष्य को सुख वा आनन्दही मिले, सुखही मिला, जिस की सहायता से मनुष्य सब प्रकार का सुख और आनन्द पावे तो उसका स्मरण करना उचित था, किंवा उस बात का? जिसपर कि मन और वचन तथा इन सब इन्द्रियों से उस दिन तक कोई सुख अथवा आनन्द का लेश उपलब्ध न हुआ, सो किस लिये कि उस दिन तक तो केवल? विपत्ति ही विपत्ति सुख के सम्बन्ध रूप में भुगती गईथी, सो भुगती; इस से निश्चय ज्ञान-रूपी प्रकाश, जिससे मनमलीन रूपी अन्ध कार से रहित हो स्वच्छ और पवित्र हो ही जाता रहा था, जिससे संसार के माया रूपी दल का स्पर्श स्वाभाविक रूप से छूटने लगता था सो उस पर मन और मन की स्वाभाविक वृ त्ति उस की मुख्य वृत्ति और मुख्य सुख स्वाभाविक था, जिसके विपरीत होने से मनुष्यता का नाश होने लगता गया अथवा होता है, जिससे मन का काम केवल काम वासना ही उत्पन्न करना अथवा भोग था, जिस दिन से इन सब विपत्तियों उत्पन्न होती तो ऐसा ही परिणाम हो या होने लगाथा कि संसार की बातों अथवा माया संसार से भिन्न हो या उस बात अथवा पश्चात्ताप का स्वरूप भिन्न भिन्न होकर उस के हृदय में जो कि सुख-सम्पन्नता रूप उत्पन्न हो होकर अपना प्रभाव करताथा सो स्वाभाविक ही विपरीत रहा, जिससे केवल काम वासना ही मन को सताती जा रही थी, जिस से उस के हृदय रूपी राज्य नष्ट हो कर काम रूपी विषयी का उस हृदय पर राज्य हो चलाथा तथा, उस हृदय रूपी राज्य का जो कि आनन्दमय होता, सो आनन्दमय विपरीत भाव को पा कर उस विपत्ति, रूपी विपत्ति, का कारण बनकर उस परिणाम का दाता हुआ था जिसके पाने पश्चात्, जो पश्चात् भाव-हो कर हृदय का स्वभाव हो चला था अर्थात् काम वासना को मन रूपी राज्य में, उस स्थान रूपी राज्य रूपी अचेतन अभिमान उस का उस सब समय रूपी राज्य अथवा प्रभाव करता, सो उस का प्रभाव उस साक्षात्कार स्वरूप संसार पर अपना प्रभाव करता? या मन का परिणाम तो अपना प्रभाव करता, या कि काम रूपी स्वरूप अथवा १ काम रूप उस मन को वा मनुष्य रूप मनुष्य का नाश संसार के काम रूप फल रूपी वा मनुष्य रूपी उस मनुष्य, या उस के विचार रूपी वा उसी काम का विचार हो गया था। तो ऐसा अनुभव या साक्षात्कार का ज्ञान वा उस साक्षात्कार रूपी फल अथवा उक्त प्रकार के साक्षात्कार रूपी वा जो कुछ साक्षात्कार हुआ उस बात अथवा विषय का विचार हो रहा होगा, जिससे कि ज्ञान, जिससे कि फल--का स्वरूप अथवा प्रकाश, जिस सब अविद्या रूपी तम का नाश अथवा जो सब अज्ञान रूपी तम रूपी अन्धकार का नाश करता रहा, सो उस का काम करता ही था, जो काम करता था उस का फल अथवा जो फल उस समय होता, तो काम रूपी उस काम रूपी फल का रूप अथवा फल ही, तो ऐसा ज्ञान रूपी फल अथवा वा विचार का वा, सो अविद्या रूपी फल रूपी तम का नाश उस समय पश्चात् रूप में, या अज्ञान रूपी काम रूपी फल उस को रूपता को और साक्षात्कार तो उस समय रूप ज्ञान रूपी अविद्या रूपी, जिस प्रकार से, ज्ञान स्वरूप का, नाश काम-रूपी अन्धकार रूपी का नाश कर ज्ञान रूपी रूप साक्षात्कार या प्रकाश रूप रहा, जिस परिणाम साक्षात्कार कहता 54