भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 154 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

गया अथवा नहीं, यह जानकर समाधान कर सके ऐसा कोई भी तो उपाय उनके पास नहीं था। इसके सिवा उनकी धारणाएं विकृत थीं, जो इसके पर सत्य स्वरूप को जान सके ऐसा उपाय, जो केवल उनके पास ही था पर वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। वे केवल एक ईश्वर की पूजा के स्थान पर अनेक अन्य कल्पित देवी-देवताओं की भी पूजा करने लगे थे। उन्होंने यह नहीं समझा कि ईश्वर तो एक है, परब्रह्म के रूप में। फिर भी उसे कई नामों से पुकारा, जैसे कि अग्नि के रूप में, जल के रूप में। इस प्रकार कुछ कल्पित देवी-देवता बन गये, जिनके पास शक्तियां थीं; जैसे कि, इन्द्र देव, जल के देव, वायु के देव, सूर्य देव, चन्द्रमा के देव। इस पर उस समय भी एक मत के लोग एकत्र नहीं थे। कुछ लोग तो, जो ईश्वर के सच्चे उपासक थे, वे इस प्रकार की धारणाओं से विमुख रहते थे, वे तो केवल ईश्वर की, जो सर्व शक्तिमान था और सब का रचियता था और सब को देखता था, उस की पूजा में लगे थे, पर उनकी संख्या कम थी, वे संख्या में कम थे। अतः वे इन बातों को रोक न सके जो केवल अन्धविश्वास थी, जिसे वे धर्म समझ रहे, न वे धर्म सुधार सके। इसके अतिरिक्त धर्म का पतन हो रहा था... इस कारण से कि इस काल में कुछ ऐसे भी, जो स्वयं को ज्ञानी मानते, ऋषि और सन्यासी मानते, पर थे वास्तव में अज्ञानी थी, वे इस बात पर बल देने लगे कि ईश्वर केवल यज्ञ के रूप में मिल सकता, और यह धार्मिक कृत्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं। इस प्रकार एक तो पाखण्ड और बढ़ गया जिसके कारण उस काल में, जब कि यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी, एक विशेष वर्ग, जिसे पुरोहित वर्ग कहते, ने अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर को, यज्ञों द्वारा प्रसन्न करने का, मार्ग बना कर लोगों को, यज्ञों द्वारा ठगना शुरू कर दिया। ईश्वर के नाम पर इस प्रकार के अनाचार का फल यह हुआ कि वेद काल समाप्त, जिसे सत्य युग, या सतयुग कहते हैं, वह समाप्त हो गया, क्योंकि इस प्रकार अनाचार उस समय का रूप बन चुका था। इस काल में जहाँ कर्म का महत्व समाप्त हो चुका था और भाग्य का ही बोलबाला था। उस समय का मानव यज्ञ, बलि पर सब कुछ निर्भर समझता हुआ कर्म से ही विमुख होकर, केवल इन साधनों पर ही अपने उद्धार का साधन समझने लगा था। हाँ, जब ऐसा समय आ गया, धर्म के नाम पर ऐसा अधर्म होने लगा जिससे मनुष्य का भाग्य केवल भाग्य पर ही छोड़ कर भगवान और ईश्वर को भूलने लगा तो मनुष्य का उद्धार करने हेतु इस धरा पर अनेक अवतारी पुरुषों और महात्माओं का आगमन हुआ। ईश्वर ने जब देखा कि उसके द्वारा बनाये गये संसार में मनुष्य भ्रम में फंसा हुआ है और सत्य मार्ग छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल रहा है तथा उसके कर्म समाप्त हो रहे हैं तथा केवल कर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा है। महात्मा बुद्ध के पूर्व काल की जो यह दशा थी, उस समय एक ऐसा महा- मानव का इस धरा पर जन्म हुआ जो इन सब कुरीतियों को दूर करने में सहायक हुआ, जिसे भगवान बुद्ध कहते हैं। वे इस धरा पर धर्म को सच्चा स्वरूप प्रदान करने में सहायक हुए तथा उनके द्वारा चलाये गये बौद्ध धर्म से इस धरा पर एक नई चेतना का उदय हुआ तथा वह धर्म भारत की सीमाओं से बाहर जाकर भी, विश्व का सबसे बड़ा धर्म बन गया! हाँ, जब यह अनाचार, यह अन्धविश्वास और यह दुराचार इस संसार में व्याप्त था, तब इस समय के काल के अनुसार इस धरा पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। यह समय ईसा मसीह के जन्म से पूर्व की लगभग छठी शती का था। इस समय मगध साम्राज्य, जो उस समय अपने में महान था, उत्तर भारत में बहुत शक्तिशाली माना जाता था। इस काल के इतिहास के अनुसार मगध के साथ तीन अन्य बड़े राज्य भी भारत में थे, जो अपने प्रभाव तथा प्रभुत्व के कारण विख्यात थे। वे थे, कोशल राज्य, वत्स राज्य तथा अवन्ति राज्य। इन चार शक्तिशाली राज्यों में मगध का साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था, जिसे इस काल में सब से श्रेष्ठ माना गया था; शेष अन्य तीन राज्य भी कुछ कम नहीं थे। इन चार बड़े साम्राज्यों के अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे राज्य भी उस समय भारत के पूर्व में थे। इनमें से कुछ गणतन्त्र राज्यों में शाक्य राज्य भी एक था। शाक्य वंश का राज्य हिमालय की तराई में स्थित था। इस राज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह राज्य आधुनिक नेपाल की सीमा पर स्थित था। इस शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन थे, जिनकी पत्नी का नाम माया देवी था। राजा शुद्धोदन बड़े-बड़े प्रतापी राजा थे तथा उनकी ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी। 59

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · पृष्ठ 59, कुल 154 में से · BharatKosha