भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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इस प्रकार सब तरफ अन्धेर देखकर, चिन्ता निमग्न होकर, वह दीन बालक रोता हुआ अपनी माताके सम्मुख जाकर हाथ जोड बोला... ! माताजी तुम इस संसारके सब काम को जानती हुई यह नहीं जानती हो! मेरी माता, यह चिन्ता का विषय सब बातों का है। संसार मुझे उपनयन योग्य विद्याध्ययन योग्य सब तरह योग्य समझ कर पिता का गोत्र पूछ रहा है। यह बात सच है, यह सब विद्याध्ययन को रोकके हैं, संस्कार को रोकके हैं॥ आप यह विचार कभी मन में मत करो, कि विद्या का पढना केवल आजीविका का साधन है। यह केवल विद्या, यह केवल सत्य बात नहीं कही गई! इस बात को जानने का यही यत्न हो रहा रहता है। यह सत्य विचार बहुत बडा! सत्य विद्या संसार का परम आधार माना॥ सत्यके प्रकाश का आधार तो इस बात का विचार करना मनुष्य जीवनके सब ओर से हो रहा है। सत्य को धारण कर चलने का नाम जीवन धर्मयुक्त बतलाया गया, इसमें तनिक सन्देहभीनहीं, सत्य विचारधारामें विचर कर हम इस जीवन संग्राम को पारकरके ही रहेंगे। हे माता, हम सत्य विचार सम्बन्धी अपने धर्म से कभी विचलित होकर न रहेंगे! विद्याका अभ्यास करना ही तो परम धर्म है, जो सत्यका उपदेशक बनकर सब का उद्धार करेगा? विद्या ही जीवनका आधार? विद्या ही सत्य विचार सिखाकर, यह भव-पार करानेका साधन कराके सत्य विचार देती। संसार में जो सत्य धर्म को नहीं जान सके रहे, वे सत्य विचार का नाम कभी न लेंगे, न सत्य की शरण जाना चाहेंगे! विद्या का प्रकाश? विद्या का विचार सब, जो सत्य का सिखाता? सत्यविचारको सब ही प्रकाश करना चाहते हैं। जहां विचारका प्रकाश आ जाता है। वहां तम, अन्धकारका नाश निश्चित हो ही जाता है। इसी से तो सत्य विचार द्वारा ही सब संसार को पार कर लें! इस प्रकार सत्य ही तो सत्य विद्या का आधारभूत माना गया है। यह विचार तो माता सत्यविचार द्वारा ही हो सकता रहता है। संसार को सब तरह का सत्य विचार प्रकाश मिलना योग्य॥ विद्याध्ययन ही तो केवल सब तरह सत्य द्वारा इस संसार को, समाज को, राष्ट्रको सब तरह उद्धार का यत्न करा सक्ता, यह सत्यका विचार रहा॥ सत्यका विचार ही तो, विद्या द्वारा ही हो सकता रहता है। इस प्रकार, यह विचार सत्य ही सत्य को चमकावे॥ अब इस सत्यका क्या रूप हो सकता? सत्य प्रकाशक सन्तों की शरणमें ही सब होवे! यह सुनकर ही वह, सत्यकामकी माता इस यत्न को कराने को उद्यत होकर सब तरफ ध्यान कर के विचारने लगी। इस प्रकार, सत्यकामके विचारों द्वारा ही सब सत्य का ही प्रकाश, न असत्य आधार, न सन्देहका ही नाम प्रकाश हो कर सब प्रकार सत्यकामके मन को सत्यकी ओर ही प्रेरित किया॥ सब भाव-रूप से यह विचार माताके मन विचार कर सब तरह सत्य द्वारा तय हुआ गया कि, जो सत्य हो, वह सत्य ही सत्यका अवलम्बन ले। सब तरह सत्य की शरण ही सबसे उत्तम उपाय माता द्वारा भाव-रूप से तय करके निर्णय किया गया विचार हुआ । अतः, सब को सत्य द्वारा सम्बोधन कर सत्यता की ओर ही झुकाव हो ही जाता है। सत्यके न भय होवे! सत्यका ही तो बल है, विद्याध्ययन द्वारा सत्य विद्या का विचार ही तो सब तरह, सत्य ही सब कुछ, उस सत्य द्वारा सब तरह विचार होता रहे, सब प्रकार सत्य विद्या का विचार सब प्रकार सत्य द्वारा सब तरह सम्भव होकर अपने सत्य विचार द्वारा सब आधार सत्य प्रकार सत्य बना कर रहे, सत्य मार्ग, ही सब तरह हो? इस प्रकार सब, सब तरह सत्यके द्वारा ही तो सत्य द्वारा सत्यज्ञान प्रकार हो सकता रहा है। सत्यका विचार द्वारा, यह सत्यता द्वारा ही सम्भव हुआ॥ अब तो निश्चय हो गया, कि सत्यता ही है, सो ही सत्य द्वारा सत्य का सब ही प्रकाश हो! यह सुनकर ही वह, जो सत्यता द्वारा ही सब था, वह सत्यता द्वारा सब कुछ सत्य ही सब तरफ फैला॥ सत्यके प्रभाव द्वारा सब प्रकार सत्य का ही प्रभाव हो न सके? सब तरह, सत्य ही सब को विद्याध्ययन द्वारा भाव--विचार से ही सत्यता द्वारा प्रकाशित हो सकेगा॥ सो यह सत्यता द्वारा सब, सत्यता के आधारको ही ही सत्यद्वारा सत्य विचार प्रकाश का रूप सत्य को धारण करके सत्य ही सब तरह प्रकाशित रहा, सत्यता का सब तरह प्रकाश ही सब तरफ सब प्रकार का सत्य ही प्रकाश फैला॥ 63

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