भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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इस तरह विचार कर संसार का भला करने का मन बनाए रखना व उस दिशा विशेष प्रयत्न निरन्तर- प्रयास करते रहने वाले ही न केवल सच्चे परोपकारी कहे जा सकते हैं वरन् वे ही आस्तिक कहलाने अधिकारी भी कहे जायेंगे। आस्तिक, भाव सम्पन्न स्वरूप, भव्य स्वरूप व्यक्तित्व का निर्माण इन प्रयत्नों द्वारा सम्पन्न हो सकता है। संसार सदा ही एक जैसा रहता तो नहीं मनुष्य समाज रूपी इस रथ रूपी संसार को चलाने का प्रयत्न कर रहे, सदा चलते ही दिखलायी या सम्मुख रहते ही नहीं, पर जब तक संसार का स्वरूप या मनुष्य का अन्तर्मन एक सा बना रहता आया या रहता दिखाई देता हो वहाँ तक विचारशील हो, या ज्ञानी पुरुष, संसार को सुखी करने सम्बन्धी परोपकारी प्रयत्न करते रहना सदा ही अपना जीवन उद्देश्य सम्बन्धी कर्त्तव्य मान ही चुके हैं या मान ही सकते हैं यह, सच्चे स्वरूप विषय सम्बन्धी बात विचारणीय है। संसार को संसारी व्यक्ति मात्र, संसार की नश्वर दिशा विषय मात्र सोच या देख ही सकते हैं पर आत्म-ज्ञान सम्पन्नों को इस जग--संसार रूपी व्यवस्था का संचालक तो परमात्मा ही प्रतीत हो, विचार या दृष्टि व नियंता कर्ता-धर्ता सर्वसमर्थ तो वही माना जाता है। विचारशीलता का लक्ष्य तो यही हो कर ही रहा है जिस से संसार की संकीर्णताओं को त्याग, ईश्वरत्व का ध्यान, परब्रह्म का भजन, आत्मज्ञान का सतत चिन्तन आदि करते रहने का नाम ही ज्ञान या परमात्मा की ही भक्ति माना गया हो जो संसार के हर रूप रंग में परमात्मा का स्वरूप या हर प्राणी अथवा वस्तु को, ईश्वर का रूप मान कर संसार की भलाई के विचार करना ही तो इस दिशा विषय मात्र में सच्चा परोपकारी रूप धारण करना अथवा संसार को परमात्मा का ही रूप मान उसी रूप से संसार का उद्धार अथवा कल्याण हो, इस का यत्न करना कहा जा सके तो इस दिशा विचार को ही सच्चा परोपकार कहा जाएगा या इस को ईश्वर रूप मान कर कहा जा सकेगा? यह तो सब जान ही रहे कि जो मनुष्य मात्र का हित सोचता है, संसार का तो नहीं, पर तो मानवतावादी रूप विचार को धारण करता ही है इसलिए, वह तो उन विचारों, जो मात्र या संकीर्णतावादी कहलाएं, उन से तो निश्चित रूप से महान् ही कहा जा सके, इसलिए मनुष्य, जो संसार मात्र हित को ही विचारता या उस दिशा में यत्न कर रहा, सच्चा परोपकारी तो अवश्य कहा जाएगा, सच्चा मानवतावादी ही, सच्चा समदर्शी ही, सच्चा निष्काम-कर्मयोगी ही, संसार का हितैषी ही कहा जा सकता है। भगवान् व मनुष्य के बीच में इस संसार का कोई रूप रहना चाहिए या उस रूप को स्वीकार किया जा सकता है? स्वरूप मात्र का ही सवाल नहीं, मूल सवाल यह, स्वरूप मात्र से ही भगवान् स्वरूप तक पहुँचा जा सके? संसार के या मनुष्य कल्याणकारी रूप स्वरूप को ही ऐसा रूप मान लिया जाएगा? इस बात का जो जो निर्णय होगा वह, उस पर टिका रहेगा निश्चय ही; इस बात सम्बन्ध में तो प्रत्येक मानव भिन्न हो, पर प्रत्येक मानव रूपी अंश को भगवान् रूप अंश का रूप मान चलना होगा और, मानवता विशुद्धता को ही पाना रूप ही स्वीकार कर, संसार को नश्वर जान, उस को त्याग ईश्वर भक्ति सम्बन्धी ज्ञान की ओर, उस ओर ही सारा ध्यान दिया जाना ही तो सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बने, इसलिए सच्चा स्वरूप तो वही, संसारता को ही जो मात्र त्याग का विषय मान ही चला हो। पर जो ऐसा सोचकर ही चलता हो, कि जब तक वह इस संसार में है संसार रूप व्यवस्था मात्र के सम्मुख उस द्वारा किए जाने का अधिकार ही, कर्मों मात्र को ज्ञान विशुद्धता से अलग भी या भिन्न रूप में माना ही जा रहा हो तब भी कर्म तो किए ही जा रहे जिन को कोई दिशा नहीं दी गई हो या जिस दिशा दी जा रही हो भगवान् का मार्ग दिशा मान लिया गया। ऐसी अवस्था में परोपकार रूप व्यवस्था का निर्वाह करना मात्र स्वार्थ कहलाए तो नहीं कहा जा, परोपकार का कोई स्वरूप तो, उसे सम्भव माना ही गया जिस द्वारा जीवित मात्र जीव संसार में कुछ लाभ पाए, तो ऐसा सब होने पर इसे सच्चा परोपकार कहें, वास्तविकता रूप में यह विचारणीय विषय बन ही जाता। जब तक मनुष्य आत्मा को नहीं पहचान पाता, तब तक वह कुछ भी जान सकेगा; यह साधारण सत्य ही हर एक ज्ञान विषय व्यवस्था द्वारा ही सामने आता रहा प्रमाणित रूप बना है, प्रत्येक बात का हल तो इसी रूप में-- स्वरूप, स्थिति से ही खोजा जाना चाहिए अथवा संभव पाया जाता रहा है। जो भी प्रयास किए जा रहे संसार सम्बन्धी ज्ञान के रूप में या दिशा द्वारा लिए जाने वाले कार्यों में, विचार अथवा, परोपकारी कर्म-कलाप द्वारा सब बातों का हल खोजना व्यर्थ 67