माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचार यह करना पड़ता होगा तथा अन्य जितने धर्मावलम्बी हैं, उन सब ग्रन्थकारों का विचार देखना ही नहीं पड़ा होगा कि सर्वज्ञता किसके द्वारा कब प्राप्त हुई, किस प्रकार मिली वा क्यों मिली सो तो सर्वज्ञता उनकी बनाई हुई नहीं, केवल अपने मन कल्पित ईश्वर की आज्ञा--मात्र समझ रक्खी कि ईश्वर की यह आज्ञा सर्वशास्त्रों से परे है, न्यायशास्त्र से, विचार से परे है, विचार का तो काम, जो आज्ञा ईश्वर शास्त्र कह देवे उसी पर दृढ--रह विश्वास रखना चाहिए विचार को आज्ञा मानना, शास्त्रार्थ का ध्यान रखना, विचार, न्याय इनको तो वे कुछ नहीं समझते, केवल हठ और जिद को ही अपना धर्म व मुक्ति का मुख्य कारण जानते हैं। महाशय जी कुछ सोच समझ कर न्याय को हाथ में रख कर न्याय विचार से ही निर्णय करें कि न्याय क्या वस्तु? जो सर्वज्ञता को माने, बिना प्रमाण के ईश्वर को सर्वज्ञ कह देवै सो न्याय कैसे कहा जाय, वा जो मनुष्य अपने आत्मा को सर्वज्ञता सिद्ध कर सकता है, सो न्याय हुआ, यह विचारिये! न्याय क्या हठ, जिद्द रूप होता है! जो मनुष्य सत्य को ग्रहण कर न्याय को, न्यायपूर्वक ग्रहण करता है सो सत्य को प्राप्त हो जाता है, जब सत्य मिल जाता है तब न्याय के कारण से उस सत्य की सब ओर प्रभावना हो गई, जब प्रभावना हो गई तब न्यायपूर्वक अपने को सर्वज्ञ भी कह सकता है क्योंकि उस समय, सर्वज्ञता प्राप्त करने का समय, वा काम ही ऐसा किया जब सत्य काम किया तब प्रभावना सत्य ही होगी और सत्य प्रभावना द्वारा सर्वज्ञ प्रभावना रूप फल सत्य प्राप्त हुआ तो क्या इस न्याय को कोई हटा सकता है वा इस न्याय का खण्डन कोई कर सकता है? नहीं, कदापि नहीं। इस प्रकार के न्याय द्वारा विचार करने में ही सत्य लाभ हो सकता है, नहीं तो कभी भी सत्य का लाभ महाशय जी जब इस प्रकार सत्य, न्याय से सर्वज्ञता का काम सिद्ध होता आया तो मानना ही पड़ा, जब सर्वज्ञता के इस सत्य काम को सत्य माना गया तो सर्वज्ञ भी रहा, सर्वज्ञ प्रभावना भी रही और सर्वज्ञ परोपकार काम भी सिद्ध हुआ। जब केवल सर्वज्ञता ही न, सर्वज्ञता के कर्तव्य भी सिद्ध हैं, सर्वज्ञता के काम जो जगत हित वास्ते प्रभावना रूप में जो जगत कल्याण प्रभावना रूप काम सर्वज्ञ द्वारा न्यायपूर्वक किए गए उनका फल आज तक जगत पा रहा है क्या ईश्वर के काम द्वारा उस प्रकार फल जगत को प्राप्त हुआ, वा ईश्वर कृत वेद--विद्या से? कभी नहीं? जो न्यायपूर्वक काम सर्वज्ञ द्वारा किया गया सो सब ही सत्य काम आज तक चला आ रहा है और आगे भी सत्य रहेगा, जिस फल द्वारा वा प्रभाव द्वारा आज भी कल्याण हो, वा लाभ प्राप्त सर्वज्ञता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है वा सब प्रमाणों से बढ़ कर प्रत्यक्ष प्रमाण ही माना जा सकता है। जिस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण दृष्टिगोचर हो रहा उसके विरुद्ध जो कुछ कहा जावे वा माना जाय सो प्रत्यक्ष के विरुद्ध होने प्रमाण को गिरा सर्वथा असत्य ही होता है; सत्य को तो प्रत्यक्ष ही सिद्ध करता है; जब प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध हो चुका कि सर्वज्ञ सर्वव्यापक का काम कभी नहीं सिद्ध हुआ, केवल मन का ही कल्पित विचार मिथ्या सिद्ध है; सत्य प्रत्यक्ष से यह सिद्ध हुआ, फिर तो कोई भी बाधा इसमें बाकी नहीं रही। सर्वज्ञ काम के न्यायपूर्वक पद को समझना महाशय जी को कठिन नहीं था, जिस समय कि न्याय का सहारा ले सत्य काम को सच समझा जा सकता था। केवल उस स्वभाव रूप काम में, जो सब स्वभाव रूप काम है, उस ही बात द्वारा सब ही महाशयों द्वारा अपने सिद्धान्त की बात सर्वज्ञ द्वारा सत्य--प्रमाण सिद्ध होती रही? तब फिर इसमें क्यों? संशय रूपी विचार किया गया? जो मनुष्य सब प्रकार से न्याय को ही अपना आधार बनाता है वह सर्वथा सत्य फल पाता है। महाशय जी को सत्य न्याय का ही आधार लेना उचित था। सत्य न्याय का काम न करके जो बात मन कल्पित ईश्वर के नाम पर कही गई सो अयोग्य, वा झूठ बात, जो सब शास्त्रों व सब विचार न्यायपूर्वक रूप सब ग्रन्थों से बाहर निकली, वा उस ग्रन्थ द्वारा भी सब बात सच सिद्ध नहीं हो सकी, उस कल्पना, उस अज्ञानता द्वारा ही कही। संसार में प्रत्यक्ष देखा गया, देखा जा रहा, देखा जा रहा, परोपकार का काम जितना भी हुआ सर्वज्ञ द्वारा हुआ ईश्वर द्वारा तो कुछ भी सिद्ध नहीं होता हुआ देखा न मन कल्पित शास्त्र सम्मत द्वारा ही परोपकार का कोई काम हो ही सकता जिससे जगत का भला हो सके या ईश्वर के कर्तव्य का ऐसा लाभ-नुकसान का कुछ फल जगत को सर्वथा प्राप्त हो सकता जिस द्वारा जगत का उद्धार व कल्याण 69