भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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इस प्रकार यह विषय स्पष्ट स्वाभाविक स्वच्छता और विरोधरहितता से भरा, पद पदार्थोंके ज्ञान देने में या अर्थ ज्ञान करानेमें, दोनों बात उपयोगी और मुख्य हैं यह विचारशीलवर्ग को, या यथार्थता को प्राप्त हुए पुरुष समझ कर अपने अभिप्राय को भी इस मत रूपी सांचे में ढालेंगे ही, ऐसा ही हम को भरोसा है। ओ३म् शान्तिः २॥ सुनो! भाइयो, यह तो ईश्वरीयरूप है, यह सुनो! सुनो, यह तो सर्वेश्वर महाराज का, आज्ञा रूपी वचन सुनो! कि जिस का कभी लोप होना योग्य ही नहीं इसलिये तुम को चाहिये ईश्वर सत्य ही का प्रकाशक, सो यथार्थता से युक्त है, सो ईश्वर के उपदेश रूप ऋग्वेदादि चार, सत्य स्वरूप वेद, जिन में सब सत्य विद्यायें हैं, जिन के यथार्थता से जानने वाला विद्वान् हो कर जो सत्य अर्थ का बोध करे तिस सत्य का निश्चय सब को ग्रहण कर के चलना योग्य कि जिस से धर्म, वा न्याय रूप सब उत्तम कार्य्य सिद्धहों॥ यद्यपि यह जो मन्त्रोंका अर्थ लिखाहै सो ठीक, प्राचीन सम्प्रदाय के मत, वा युक्ति प्रमाण सिद्ध सर्वसम्मत, अर्थात्, पूर्वापर सन्दर्भ ज्ञान सब ग्रन्थ में हो जाना है, तथा यथार्थ विद्या रूप सर्वेश्वर के अर्थों का सब मत रूपी सब अविद्यारूप अन्धकारयुक्त मतों के ग्रन्थ रूपी तम का तो प्रकाशक सूर्य के सदृशहै, सो विद्वान् जन तो इसको पाकर आनन्दितही हो सकते हैं। परन्तु यह विषय जो सब विद्या रूपी समुद्र है, तथा नवीन ही! नवीन सम्प्रदायानुसारों को, वा जो वेद विद्या से विमुख हैं, यथार्थता विद्या से हीन, केवल ही भ्रम में पड़े हुए लोग बहुत हठेंगे हठकठिनाई से हटेंगे वा भ्रम निवारणार्थ जो मत उन सब लोगों का भ्रम से बन गयाहै उस को सत्य ही मान कर न तो विचार करेंगे न ही समझ सकेंगे किन्तु विरोध ही करेंगे। इस वास्ते उन के सन्तोष निमित्त दूसरा उपाय यहहै, जिसको देखने से यथार्थ समझ जायँ, इस लिये यह विचार किया जाताहै कि जो पक्षपाती लोग हैं उन का भ्रम निवारण भी इस प्रकार से होना योग्यहै॥ सो विचारणीय यह विषय है कि नवीन मतों की दृष्टि सब प्रकार से सत्य वेदार्थ में प्रवृत्त नहीं, सो केवल भ्रम मूलक ज्ञानहै॥ यद्यपि सब लोग ऐसा कहते हैं, कि दो-दो प्रकार का अर्थ सब का सम्भव है, किन्तु यह विचारवान् पुरुष का मत नहीं क्योंकि दो-दो अर्थ... होना केवल भ्रम मूलकहै॥ विचारणीय यह बात है कि ईश्वर का वचन सर्वथा भ्रमरहित होना चाहिये यह, दो-दो अर्थ सब प्रकार संशय युक्त ही सब विद्या में? वा! भ्रम युक्त विद्या को करेंगे॥ ईश्वर सब प्रकार सर्व सत्य विद्या रूप सम्पूर्ण वा अविद्यायुक्त वा भ्रम से रहित होगा किम्वा नहीं? जो तो कहो भ्रम युक्त है, तो ईश्वर ही नहीं सिद्ध होगा! किन्तु ईश्वर का लक्षण ही यह है, सम्पूर्ण विद्या का प्रकाशक जो सत्य ही स्वरूप, सर्वज्ञत्त्व से युक्त हो जिस के ज्ञान में वा वचन में किञ्चिन्मात्रभी भ्रम नहो, उस को ईश्वर जान कर उस का प्रकाश किया हुआ वेद सब को सत्य मानना योग्य, जिससे कि कभी भ्रम नहो॥ सो वेद कैसा होगा? सर्वसत्यविद्या का स्वरूप॥ विचारणीय यह बात, सो ईश्वर के वचन सब को यथार्थ ज्ञान देने वाले सत्य सम्पूर्ण प्रमाण युक्त सब विद्याओं का मूल, सत्य अर्थ का, जिस प्रकार ज्ञान है वैसा ही कथन वेद में विचार कर सर्वथा निःशङ्क, जिससे कि यथार्थ सत्य विद्या सब मनुष्य प्राप्त हो सकें? वा जिस का अर्थ सब का सब भ्रष्ट होके सब प्रकार अविद्या ज्ञान का प्रकाशक हो जाय? ऐसा कभी हो ही नहीं सकता इसलिये ईश्वर, सत्य विद्या रूप ही सब जगत् को प्रकाश कर रहाहै॥ सो ईश्वर वेद विद्या के अर्थ ज्ञान के द्वारा सब जगत् को, जो पक्षपाती हो कर भ्रम जाल फैलाने वाले नवीन मतवाले हैं उन को इस सत्य विद्या रूपी प्रकाश को दिखाकर उन भ्रम-रूपी तम, अविद्या को दूर करके, सत्य ही विद्या प्रकाश सब सब विद्या रूपी सत्य विद्या सब को प्राप्त कराके उस सब का यत्न सफल हो जाय सो, यथा, ईश्वर सब का सब को सब विद्याओं का दाता है उस सब को भी, तथा वेद रूप को, सब सत्य का दाता जानो! जिस प्रकार सब को, तथा सम्पूर्ण विद्याओं को, सब विद्या रूप सब को जान के, नित्य प्रकाश जो ईश्वर सब का सत्य दाता 78

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