माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 154 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस रीति पर विचार करने पर यह सिद्ध हो रहा होगा, कारण संसार का भोग्य पद ही ऐसा कि जिसे भोग कर या देखकर जीव का मन कभी तृप्त या शान्त हो सकता ही नहीं, कदापि भी नहीं कभी भी नहीं! पर जो परमात्मा का रस जिसे प्राप्त हो जाता होगा वह तो ऐसा तृप्त होगा कि फिर कभी भी उस जीव विशेष को तृष्णा उत्पन्न ही नहीं हो सकती जो किसी भी विषय की हो या इस लोक सम्बन्धी किसी भी भोग्य पदार्थ की, जिसके कारण किसी जीव को अपने से पृथक या फिर और किसी अन्य भोग्य पदार्थ की आवश्यकता का लेश मात्र भी अपने लिए शेष प्रतीत न होकर ऐसा ही अनुभव हो सकता है कि जिसके पश्चात् या जिसके कारण जीव को, या जीवात्मा को सर्वदा उस सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा ज्ञान, शान्ति या आनन्द का रस ही निरन्तर प्राप्त होता ही रहता है॥ इसमें कोई सन्देह, या संशय किसी प्रकार का, अथवा किसी विचार मन में, किसी जीवात्मा को, तब हो सकता है, जबकि वह जीव अपने लिए संसार से तो सुख चाहने का यत्न, यत्नपूर्वक प्रत्येक दशा व रूप में कर रहा हो परन्तु ज्ञान होने पर भी ज्ञान रूपी उस परम पिता परमात्मा का ध्यान विचार निष्पक्षता से न तो कर रहा होगा और न ही कभी केवल मात्र उस परम पिता परमात्मा को पाने का यत्न कर रहा होगा, तो ऐसे जीव को यह ज्ञान भी प्राप्त न हो, फिर चाहे न भी वह उस परम पिता परमात्मा को प्राप्त करे? पर जो मन द्वारा या वाणी से सब का सब कुछ त्याग कर उस परम पिता परम पिता के लिए यत्न कर ही रहा होगा वह क्यों नहीं? तो इस प्रकार मनन व विचार करने पर, सब प्रकार केवल परमात्मा को ही सब कुछ जान लेने पर विशेष रूप से यह भी, प्रत्येक स्थिति में उस नित्य आनन्द स्वरूप को परमात्मा स्वरूप ही जान कर, जिसे सब प्रकार का विचार या ध्यान परमात्मा का कहना स्वाभाविकता है, स्वाभाविकता ही जिसका धर्म, कर्म या स्वरूप होगा, जिस पर यह स्पष्ट है, जिसे विचार से सब कुछ स्पष्ट हुआ करता है जिसे सब ही स्वाभाविकता कहा गया॥ पर इसके पश्चात् भी तो विचार यह देखना होगा व देखना पड़ा उस अवस्था विशेष व दशा रूप योग-की प्राप्ति अवस्था तक--जिस अवस्था तक सब कुछ त्याग हो तो गया पर मन का न त्याग हो, न ही आत्मा, का त्याग होना सम्भव हुआ या हो सकता व किसी प्रकार भी सम्भव नहीं, व इस प्रकार दोनों का ही या तो त्याग हुआ नहीं, या ही दोनों जीवात्मा के परमात्मा के आधीन होने व परमात्मा के बस होने से ही, उस स्थिति व उस दशा विशेष का लाभ हो सकेगा॥ स्वाभाविकता, स्वाभाविक का यह अर्थ हुआ, जिस स्वाभाविकता का, प्रत्येक को धारण या ग्रहण करने का यत्न प्रत्येक दशा विशेष रूप में तथा स्वयं परमात्मा द्वारा भी सब प्रकार सब का स्वरूप बनाया गया होगा, जिसे सब प्रकार से ऐसा ही सब को स्वीकारना ही परमात्मा का स्वरूप; प्रत्येक जीवात्मा द्वारा, जिसे परमात्मा की परमात्मा के स्वरूप द्वारा ज्ञान रूपी दिया, तो वह तो सबको प्राप्त हो ही सकेगा॥ स्वाभाविकता का अर्थ सब का परमात्मा का स्वरूप बना देना नहीं हो सकता या आत्मा जिस दशा को त्याग पश्चात् परमात्मा स्वरूप ही देखना चाहे किसी जीव को, तो वह, ऐसा ही हो सकेगा, जब जीव परमात्मा ज्ञान को अपने आत्मा स्वरूप जीवात्मा रूप का सदा ज्ञान रखे॥ पर ऐसा ज्ञान केवल ज्ञान तक सब प्रकार परमात्मा का ही सदा स्वाभाविकता रूप मन सब प्रकार स्वाभाविकता को स्वीकारे, स्वाभाविकता का त्याग न कर सके॥ स्वाभाविकता का त्यागना ही तो सब पाप, व स्वाभाविकता का त्याग ही सब दुःख का कारण, जिस से परमात्मा को सब का सब सुख या फल भोग क्यों न हो? जो जीवात्मा ऐसा न करे, तो ही स्वाभाविकता का परमात्मा द्वारा लाभ, जिसे प्रत्येक स्थिति में सब सब कुछ को स्वाभाविकता का रूप ज्ञान विचार ज्ञान दिया गया, जिस स्वाभाविकता का लेश मात्र भी तो उल्लंघन या उस रस का लेश मात्र विचार स्वाभाविकता के विपरीत न हो, पर जो ऐसा हो, स्वरूप या परमात्मा का, स्वरूप व रूप हो॥ सब कुछ तो यथार्थ-ज्ञान या स्वाभाविकता स्वरूप से ही सब कुछ ज्ञान प्राप्त हो सकता है यह सब कुछ जो कुछ कहा जा रहा है? जिस पर, परमात्मा के सब ज्ञान स्वरूप पर! जिस ज्ञान रूप से सदा स्वाभाविकता का लेश मात्र ज्ञान सब स्वाभाविकता के त्याग से प्राप्त हो ही नहीं सकता या त्याग रूप से ही सब कुछ का ज्ञान प्राप्त हो रहा रहा है? तो समझना होगा कि यह, ज्ञान सदा स्वाभाविकता 85