माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमनुष्य सब कार्य विचार करके ही करता गया और जो कर्तव्यनिष्ठ या स्वार्थ त्यागने पर कटि बद्ध हो कर्तव्य का पालन करता रहेगा अवश्य ही कर्तव्यनिष्ठ बनेगा या अपने लक्ष्य, उस प्रत्येक कार्य सफल होगा! यह विचार करना व्यर्थ ही नहीं वरन् व्यर्थ, या तो ऐसा कार्य करो जिससे या उस परिणाम का फल जिससे कि उस कार्य का फल मिल सके या व्यर्थ कार्य करने से कर्तव्य नष्ट करने जैसा फल प्राप्त होगा या तो कर्त्तव्य ही ना हो अथवा जिस रूप से कार्य का फल नष्ट हो जायगा। जब कार्य सिद्ध होगा, तो उसके न करने वाले को लाभ तो क्या वरन् हानि ही रोग, शोक ग्रस्त ही होना ही न केवल स्वयं कष्ट भोगी ही होना ही नहीं वरन् सब जाति। स्वार्थ या पाप से बचा कर ही लोग कर्म को पाप माना है। इसी प्रकार क-मनु का विचार भी उचित नहीं कहा जा सकता स्वयं भी अपने कार्य से पाप में प्रवृत्त हो उस से पाप ही होगा, उपदेश का पाप होगा जिससे कि उपदेश देने वाले का अपना आत्मबल नष्टप्राय तथा दुर्बल हो जाता गया, आत्मबल क्षीण होने से शक्ति नष्ट उपदेश का प्रभाव निष्फल हो ही रहा देखा गया, अविश्वास उत्पन्न हो गया, यदि बात ही ना रहे, उपदेश प्रभाव ही ना रहे आत्म शुद्धि? आत्मबल की ही आवश्यकता केवल ही सब को कार्य में, जो कि इस प्रकार केवल बातों तक रह गया उस कार्य-रूप त्याग अथवा साधन रूप कर्म द्वारा जो कार्य किया जा सकता कार्य ना कर के आत्मबल, जो कार्य कि आत्मबल के बिना सिद्ध नहीं किया जा सकता उसका प्रभाव सब पर व्यर्थ सिद्ध हो जायगा। मानव समाज को सब समय में काल-चक्र सदा ही सब कार्य सिखाता ही चला गया और जो विचार के रूप निश्चय था, कर्त्तव्य से ही निश्चित रहा, तो उसने सब कार्यक्षेत्र में काम से, कर्त्तव्य के काम से, स्वार्थ के काम से, व्यर्थ के काम से, या कु-कर्म से मन-वच और कर्मप्रवृत्ति को भिन्न रखा, जिसका कि स्वरूप ही आत्मबल द्वारा सत्य कर्मप्रवृत्ति द्वारा स्वयं प्रत्यक्ष देखकर सिद्ध किया जिसका फल सब को ज्ञान से, कर्त्तव्य द्वारा प्रत्येक कर्म विचार ही ना हो सका; ज्ञान अज्ञान विचार से ही ना हो सका सब का स्वयं रूप सिद्ध हो सका? तब ही तो सब का श्रेय रहा। सब कार्य का श्रेय तो कर्त्तव्य और निष्ठा द्वारा रहा, आत्मबल द्वारा रहा। आत्मबल निष्काम या कर्त्तव्य कर्म से ही सब सिद्ध हो सका, प्रत्येक कार्य मन के ऊपर विजय प्राप्त कर के काम से आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप हो ही सका जो कर्त्तव्य पालन कराया, जो कर्त्तव्य रूप सब कर्मक्षेत्र तथा स्वयं प्रत्येक रूप सिद्ध हुआ, उसका परिणाम सत्य स्वरूप कर्त्तव्य द्वारा प्रकट हुआ, जिसने आत्मबल का ज्ञान दिया जिसे प्रत्येक कर्त्तव्यवान् कहा, जिसने आत्मबल को प्रत्यक्ष किया जिसका नाम कर्त्तव्य ही रहा, जो ज्ञान द्वारा सब द्वारा स्वीकृत कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से विचार ही सब को सब स्थान दिया गया कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से कर्त्तव्य से भिन्न कर्म त्याग दिया, त्याग द्वारा त्याग का आत्मबल ही त्याग के आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप कर्त्तव्य विचार का रूप प्रत्यक्ष हुआ जो त्याग ज्ञान द्वारा सब को प्राप्त करा दिया गया जिसका फल सब ने स्वयं ही पा कर प्रत्यक्ष प्रमाण देखा तथा सब को ज्ञान का ज्ञान हो गया सब ने सत्य स्वरूप के कर्त्तव्य को देखा, उस ज्ञान को सब ही सब प्रकार से सब ने ही कर्त्तव्य के रूप में मान लिया; आत्मबल से कर्त्तव्य का रूप माना; उस का पालन ही सब किया; ना छोड़ा ही, ना बदला ही, सब कर्त्तव्य को आत्मबल, या कर्त्तव्य का फल कहा, सत्य कर्त्तव्य को सदा सब ही काल प्रत्यक्ष रूप में माना गया सब काल में सत्य कर्त्तव्य द्वारा सब ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध हुआ जो कि प्रत्येक काल में अपना कर्त्तव्य सदा सत्य माना गया... जिसे ज्ञान द्वारा सत्य कहा गया, सदा कर्त्तव्य द्वारा माना गया, सदा कर्त्तव्य कहा गया, वह ही ज्ञान मनुष्य का सदा साधन ही हो सकता था, जिसे सदा सब काल कर्त्तव्य कर्त्तव्य ही कहा गया हो, जो आत्मबल द्वारा हो, जो कि मनुष्य को ही ज्ञान द्वारा प्राप्त होकर सब के ही सब द्वारा इस प्रकार सब को प्राप्त कराया जा कर आत्मा व मानव समाज सब सब काल तक ही कर्त्तव्य रूप में सत्य रूप माना गया। 90