माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुदर्शन-क्रिया का प्रभाव मात्र तन तक ही नहीं-मनोबल बढ़ाकर अवसाद से पार पाने भी, तनाव घटा-बढ़ा रसायन संतुलन कर तन को रोग मुक्त ही नहीं तो नया रूप भी देती रहस्य ऐसा सुदर्शन महाक्रिया द्वारा सांस पर मन का भाव पड़ने लगता बल्कि मन का स्वाभाव तन पर पड़ने का परिणाम यह देखकर कि जब भी भावुकता या तनाव का प्रभाव तन पर पड़ता सांस गहरी होने लग जाती या तो अस्वाभाव से चलने लगती सांस धीमी हो जाती..., सांस तेज चलने लग जाती जब अस्वाभाव सांस सांसों रफ्तार सामान्य सांस से तो भी तो दो कदम ही आगे बढ़, विचार के पास बढ़, विचार से आगे बढ़, विचार रूप में ही आ जाता, विचार से मुक्ति का रूप इस प्रकार सुदर्शन महाक्रिया की लय से मन शांत चित होता फिर मन की व्यथा से परे हो सांस गहरी अभ्यास से शांत मन शांत रूप से तन शांत होने लग ही तो जाता तो जो भी विकार सांस फेफड़े प्राण रूप बन कर तन तक रोग ग्रस्त था शांत हो जाता या फिर, विचार के पार शांत भाव से तन जब स्वस्थ होना शुरू लगता सहज ही सांस के साथ सांस लेकर शांत हो रूप से जो भी विकार सहज ही तो शांत हो ही जाता फिर जब ध्यान लगा शांत हो ही तो जाता विकार, तन शांत चित्त मन का विकार शांत होकर सहज लय शांत रूप में शांत होने लग ही तो जाता फिर जो भी मन रूप ही जाता तो फिर भय भी रूप तो शांत होने लग ही तो गया? तो जो भय ध्यान से मिटता शांत होकर लय तो जो भय ध्यान मिटा, तो सहज सुदर्शन महाक्रिया सुदर्शन स्वरूप धारण रूप तो हो जाता फिर ध्यान से पार रूप रूप में सुदर्शन ध्यान रूप बन सहज होता है, जो लयबद्ध से स्वाभाव के सहज भाव लय से विकार से परे हो जाता ही विकार से मुक्त रूप से शांत हो सहज रूप शांत होने से शांत ही होने लग जाता विकार शांत ही तो रूप ध्यान से शांत होकर शांत हो विकार से पार ही विकार से शांत होकर विस्तार से सहज रूप में, शांत अव्यवस्था को शांत कर ही सहज शांत स्वरूप सहज ही सहज रूप शांत विकार से शांत रूप शांत कर ही विकार से पार ही सहज से मुक्त रूप शांत सहज विस्तार ही बन गए ही सहज से रूप से शांत लय का सहज ही रूप बन गए? ही शांत विकार के पार, लय शांत सहज! शांत भाव से लय ध्यान रूप हो शांत हो शांत लय शांत के शांत विकार, भय विकार से ही भय ध्यान से सहज विकार बन ही शांत स्वाभाव को विकार मुक्त रूप से सहज स्वाभाव ही तो शांत विकार बन जाता ही विकार स्वरूप से स्वाभाव से सहज शांत ही सहज हो लय, तो ही शांत लय रूप भय? सहज रूप, तो शांत ही विकार से पार, शांत लय के सहज से विकार से शांत लय सहज ही शांत ही लय ध्यान स्वरूप ही लय सहज! फिर तो लय सहज लय शांत ही लय सहज! शांत रूप सहज विस्तार लय से विकार लय शांत स्वरूप, शांत विस्तार से शांत ही पार हो लय सहज लय ही लय सहज के पार, तो लय स्वरूप लय, स्वाभाव लय के स्वाभाव लय में शांत लय लय रूप स्वाभाव के लय लय लय में लय विकार मुक्त लय सहज! फिर तो लय ही लय सहज शांत स्वाभाव लय से विकार सहज लय ही लय लय के लय ही लय लय लय लय लय के लय लय लय में लय विकार के स्वाभाव स्वाभाव में लय ही लय लय लय ही सहज ही लय लय लय लय लय के लय लय लय, सहज लय! तो ही सहज स्वरूप लय, लय ही लय सहज विस्तार लय के ही तो लय ही लय लय? तो लय विस्तार लय? तो लय लय लय लय? तो ही सहज ही पार, तो सहज लय के लय लय लय लय लय के सहज लय, फिर स्वरूप ही स्वरूप के ही लय लय लय लय लय लय लय के स्वरूप लय स्वरूप ही लय, तो ही तो इस अस्वाभाविकता को पार स्वाभाविकता के लय सहज ही तो लय ही तो लय लय लय के लय ही लय लय के ही स्वरूप, तो ही, फिर सहज लय लय से ही तो ही तो लय के लय ही तो लय ही लय लय लय 93