भारतकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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जब वह दरवाजा खोल कर घर लौटने लगा तो यह देखकर दंग, रह गया दरवाजे का तालासाबुत था दरवाजा अन्दर भीतर बन्द थाचौकीदार पहरा देसक रहे थे। सब, रुपये का था केवल काम रुपये सिवाय संसारमें कुछ नथ बाकी सब कुछ झूठा था, सब धोखा धोखा विश्वास घात था यह तो था केवल रुपयों का ही फल थाकि उस समय किसी नौकर ने कहा कि, बाबू सम्पति कौशल्याका काम हो गया काम होने का अभिप्राय था कि वह मर चुकी थी जो रोनेका शब्द आया था उसी से, यह बात समझ लीगई थी तब सेठ जी सोचने लगे कि पैसा गया, प्राण गये तो जीवन किस काम का सेठ जी सिर पर हाथ देकर बैठ गये। इधर भगवान् श्रीकृष्ण जी को भी चिन्ता हो गई। देखा कि सेठ जी तो बैठे हैं कौशल्या मर गई है इस तरह से काम न हो सका सो, जा कर कौशल्याको प्राण दान दिया, सो जीती उठी तो जान में जान आ गई सब लोग दंग रह गये। सब कुछ फिर वैसा, ही केवल सेठ जी सिर पकड़े बैठे रहे। बोले कि सब कुछ वापस मिल सकता था! पर पैसा कभी नहीं आ सकता गया, गया फिर केवल पछतावा मात्र, रहगया इस वास्ते केवल एक पैसा ही! केवल धन ही सब कुछ नहीं, ना केवल ही त्याग सब, दोनों का समन्वय सब, केवल एक वस्तु सारा काम नहीं कर सकती ना ही एक-दूसरे बिना काम चल सकता या शोभा पावे गा, जब सब ही बराबर काम में आ जावे तभी उस की उपयोगिता सिद्ध हो सके राजा भर्तृहरि कहते हैं, स्वावलम्बी बनो दूसरों का आसरा नतकें केवल अपने बाहुबल पर निर्भर रहो, परमात्मा सबका ध्यान रखता है। सब का पेट भरता भी है! यदि वह केवल राजा ही होता, तो केवल राजा का ही पेट भरता पर भगवान् तो सब का बाप है। सब का रक्षक है। हाथी जैसे विशाल प्राणी को मन भर दाना खाने को रोज देता है, जब कि चींटी जैसे नन्हे प्राणी को कण भर दाना रोज देकर उस कौशल्या के सम्बन्ध में सेठजी को यह चिन्ता सताने लगी कि अब तो यह ठीक होकर बैठ गई तो कहीं न कहीं विवाह भी करना ही पड़ेगा पर यह सब तो धन के ही द्वारा ही होगा सो इस चिन्ता में वह लगा रहा। उसने अपने पुत्र को कहा कि तूंने क्यों प्राण दान दिया अब उस कौशल्या विवाह के सम्बध में सोचेगा? क्या तू रुपया देगा? क्या उसको जो चाहिए वह मिलेगा या विवाह ही नहो गा? जो कुछ कौशल्या के तो जब तक वह जिन्दा है तब तक उस की देख-रेख हो, सो सब कुछ ठीक से चलता रहे, ना कि उस का विवाह ही कराया जाय, सो सब कुछ उसी पर निर्भर होगा, सो वह सब कुछ जान कर सब कुछ समझ कर सेठजी से कहने लगे कि इस का ब्याह भी हो जायगा चिन्ता मत करो। यह तो भगवान् का विधान है जो सब कुछ अपने आप करेगा या उस समय में हो कर ही रहेगा, जो भी होगा देखा जायगा, ना घबराने से कुछ बन सकता ना कोई हल निकल सकता? क्या किसी चिन्ता से काम बन सकताया काम पूरा हो सकता? सो तो जो होना है होकर रहेगा, सो कौशल्या के विवाह के लिये चिन्ता मतकरो, सब भगवान् पर ही छोड़ दिया जाय। सेठजी तो केवल धन के बारे में सोचते रहे कि विवाह का खर्च सब अपने पास सेकरना पड़ेगा, ना कौशल्या के पास धन, ना भगवान् रूप ब्राह्मण के पास ऐसा कुछ साधन होगा सो खर्च तो सेठ को ही, केवल अपने पास से करना होगा सो चिन्तातुर हो, कौशल्या को सब कुछ कह दिया बेटी, विवाह कौशल्या का होना है, कौशल्या के लिये सब कुछ सामान तो कर दिया गया ही है बाकी जो कुछ भी हो सो देखा जायगा। पर इस सब का धन तो खर्च हुआ ही भगवान् के हाथ से, खर्च भी हुआ, कौशल्या केवल ही खुश थी, ना अपने-आप में, कुछ कर सकती, सब तो सेठ केवल ही चिन्ता में था, कि सारा धन ही लग गया, तो क्या होगा, प्राण भी तो खतरे में पड़ गये इस तरह से सोचा, जब तक ठीक ना होवे सो ठीक ही रहेगा। विचार तो सब हो गया मगर क्या फल होगा सो? केवल चिन्ता ही बढ़ती जाय सो चिन्ता से क्या लाभ हो सकता सो सोचना था, पर सेठ का तो काम ही न चलता था जब तक चिन्ता न करता सो वह भी हुआ, सेठ के घर से न केवल कौशल्या का ही काम पूरा हुआ पर सब चिन्ता से मुक्ति मिली 95