माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविचार यह करना चाहिए कि हम इस भारत भूमि अथवा अपने समाज अथवा अपनी संस्था का सुधार किस प्रकार कर सकते हैं। सुधार का अर्थ क्या है। सुधार का अर्थ केवल कपड़े बदलना ही सुधार नहीं। यह तो केवल मन बहलाने वाली बातें हैं।कदाचित् वस्त्रांतर से रूप में कुछ हेर--फेर आये, परिवर्तन आये, सौंदर्य आये, नवीनता आये, स्वास्थ्य का सुधार नहीं, शक्ति का सुधार नहीं, वाणी का सुधार नहीं--तो क्या यह भी कोई सुधार की बात है, अथवा रूप बदलना ही कोई सुधार माना जाता है? जिस प्रकार कम्बख्तों ने या किसी ने हम सब लोगों का यह नक्शा बना दिया, क्या वैसा नक्शा बना रहना चाहिए? जरा सोचो... यह बात ठीक नहीं, संसार में जो सब लोग जीवित या मरे हुए कहलाते हैं। उनमें जीवन शक्ति का यदि कोई अंश विद्यमान था तो वह उनके विचारों का ही फल था। विचार ही मनुष्य को मनुष्य व पशु बना सकते हैं।जब कोई मनुष्य यह विचार करता कि मैं--दुःखी, पीड़ित वा अनाथ होकर संसार में एक दीन की भांति पड़ा रहूं अथवा जब वह, विचार करता हैकि संसार में जितने बड़े कहलाने वाले हुए हैं उन सब का सहारा परमेश्वर था,जब वह भी मनुष्य थे और ईश्वर ने उनको बनाया था तो ईश्वर मेरा भी पिता है।वह मुझको भी सुख दे सकता है और मुझ पर भी कृपा कर सकता है।जब इस प्रकार विचार मनुष्य के हृदय पटल पर आते हैं तो उसका रूप ही बदल जाता है। बाह्यवस्त्रों से वह रूप नहीं बदल सकता।इसलिये यदि आप समाज का सुधार चाहें-- समाज का, व्यक्ति का, कुटुम्ब का, देश का, सब का, जहां भी--तो उस का बाह्य सुधार मत करो। सुधार से मेरा यह तात्पर्य नहीं कि मैले-कुचैले वस्त्र पहनो या अन्य रूप से रहो अथवा समाज बिगड़ा हुआ नजर आवे! वरन् विचार ऐसा होना चाहिए जिससे भीतर का वह विकार निकल कर बाहर आ जाय! बाहर स्वच्छता नजर आवे, मन में, विचार में, भाव में सब प्रकार की पवित्रता दृष्टिगोचर हो। यह केवल उपदेश देने से ही नहीं होगा। इसके लिये स्वयं काम करना होगा। विचार तो प्रत्येक करता होगा, पर ऐसा विचार जो केवल अपने स्वरूप पर्यन्त ही सीमित रहे उससे समाज अथवा देश का भला होने वाला नहीं।यह तो नहीं होगा कि? देश में विचार न हों? यदि विचार न होते तो हम सब मनुष्य न होकर क्या पशु स्वरूप न होते? जब यह बात है तो विचारिये, क्या हमारे देश में कभी इस बात की ओर ध्यान दिलाया गया अथवा नहीं? यह विचार किसका? क्या मनुष्य का? हां! पहले विचार तो मनुष्य का, उसके बाद समाज का।सबका उद्धार कोई करे, यह किस प्रकार हो सकता? जब तक व्यक्ति का सुधार न होगा तब तक देश-सुधार नहीं हो सकता, प्रत्येक व्यक्ति को जब तक ज्ञान, प्रत्येक बात का बोध नहीं, तब तक विचार का रूप क्या हो सकता! जब तक यह न होगा, तब पारस्परिक प्रेम नहीं पैदा हो सकता। जब तक विचार एक नहीं हो जाते तब तक परस्पर में भेद रहेगा ही, यह नहीं कि इस बात को केवल सभा मंचों पर कह दिया जाय।कहने से काम नहीं चलेगा। इस बात को हृदय में स्थान देना होगा। विचार सब में एक से नहीं हो सकते, यह तो ठीक है।परन्तु? जो बात सबको सुख देने वाली हो क्या उस पर भी मतभेद हो सकता है? कोई कहता है ईश्वर को मानो कोई कहता हैकि ईश्वर को मत मानो।कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा करो, कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा मत करो।परन्तु विचारिये तो, इस बात पर सब एक हैं कि चोरी न करो।चोरी को सब बुरा कहते हैं।यदि आप किसी को कहें कि सत्य बोलो तो कोई यह नहीं कहेगा कि असत्य बोलना चाहिए।माता-पिता की सेवा सब अच्छी बतलाते हैं।इन बातों में मतभेद नहीं।जब इन सब बातों में एक मत हो सकते हैं तो फिर पारस्परिक फूट का कारण क्या होना चाहिए? कोई कहता हैकि संध्या करो।कोई कहता हैकि मत करो, पर जो मनुष्य भी इस बात को कहता हैकि ईश्वर को स्मरण करो, वह यह तो नहीं कहेगा कि ईश्वर का स्मरण मत करो। इसी प्रकार से सब बातें हैं।सत्य, सदाचार के नियमों का जो जो भी पालन करता जाता हैउसका मनुष्य जीवन सुधरता जाता है। इसलिये पहला नियम यह है, सब का सार यह हैकि प्रत्येक मनुष्य अपने विचार बदले, अपने जीवन को पवित्र करे।विचार बदलने का यह अर्थ नहीं, जैसा कि आजकल लोग समझा करते हैं, कि भाषा बदल लो अथवा वेश बदल लो।भाषा, वेशभूषा का तो विचार से कोई गहरा सम्बन्ध नहीं।विचार बदलने का अर्थ क्या है? विचार का अर्थ हैकि अपने
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