पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसृष्टिखण्ड ] * आदित्य-शयन आदि व्रत, तडागकी प्रतिष्ठा और वृक्षारोपणकी विधि * ८५
कदापि नहीं करना चाहिये। शय्यादानके पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—'सूर्यदेव ! जिस प्रकार आपकी शय्या कान्ति, धृति, श्री और पुष्टिसे कभी सूनी नहीं होती, वैसे ही मेरी भी वृद्धि हो। वेदोंके विद्वान् आपके सिवा और किसीको निष्पाप नहीं जानते, इसलिये आप सम्पूर्ण दुःखोंसे भरे हुए इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।' इसके पश्चात् भगवान्की प्रदक्षिणा करके उन्हें प्रणाम करनेके अनन्तर विसर्जन करे। शय्या और गौ आदिको ब्राह्मणके घर पहुँचा दे।
भगवान् शङ्करके इस व्रतकी चर्चा दुराचारी और दम्भी पुरुषके सामने नहीं करनी चाहिये। जो गौ, ब्राह्मण, देवता, अतिथि और धार्मिक पुरुषोंकी विशेषरूपसे निन्दा करता है, उसके सामने भी इसको प्रकट न करे। भगवान्के भक्त और जितेन्द्रिय पुरुषके समक्ष ही यह आनन्ददायी एवं कल्याणमय गूढ़ रहस्य प्रकाशित करनेके योग्य है। वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि यह व्रत महापातकी मनुष्योंके भी पापोंका नाश कर देता है। जो पुरुष इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसका बन्धु, पुत्र, धन और स्त्रीसे कभी वियोग नहीं होता तथा वह देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाला माना जाता है। इसी प्रकार जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है, उसे कभी रोग, दुःख और मोहका शिकार नहीं होना पड़ता। प्राचीन कालमें महर्षि वसिष्ठ, अर्जुन, कुबेर तथा इन्द्रने इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके कीर्तनमात्रसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो पुरुष इस आदित्यशयन नामक व्रतके माहात्म्य एवं विधिका पाठ या श्रवण करता है, वह इन्द्रका प्रियतम होता है तथा जो इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह नरकमें भी पड़े हुए समस्त पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है।
**भीष्मजीने कहा—**मुने ! अब आप चन्द्रमाके व्रतका वर्णन कीजिये।
**पुलस्त्यजी बोले—**राजन् ! तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें वह गोपनीय व्रत बतलाता हूँ, जो अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है तथा जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् ही जानते हैं। इस लोकमें 'रोहिणी-चन्द्र-शयन' नामक व्रत बड़ा ही उत्तम है। इसमें चन्द्रमाके नामोंद्वारा भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन मनुष्य सबेरे पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्रको आठ सौ बार जपे। यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियोंसे—विधर्मियोंसे बातचीत न करे। जप करनेके पश्चात् घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। 'सोमाय शान्ताय नमः' कहकर भगवान्के चरणोंका, **'अनन्तधात्रे नमः'**का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियोंका, 'जलोदराय नमः' से दोनों जाँघोंका, **'कामसुखप्रदाय नमः'**से चन्द्रस्वरूप भगवान्के कटिभागका, **'अमृतोदराय नमः'**से उदरका, 'शशाङ्काय नमः' से नाभिका, **'चन्द्राय नमः'**से मुखमण्डलका, 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतोंका, **'चन्द्रमसे नमः'**से मुँहका, **'कौमोदवनप्रियाय नमः'**से ओठोंका, **'वनौषधीनामधिनाथाय नमः'**से नासिकाका, **'आनन्दबीजाय नमः'**से दोनों भौंहोंका, **'इन्दीवरव्यासकराय नमः'**से भगवान् श्रीकृष्णके कमल-सदृश नेत्रोंका, **'समस्तासुरवन्दिताय दैत्यनिषूदनाय नमः'**से दोनों कानोंका, **'उदधिप्रियाय नमः'**से चन्द्रमाके ललाटका, **'सुषुम्नाधिपतये नमः'**से केशोंका, **'शशाङ्काय नमः'**से मस्तकका और **'विश्वेश्वराय नमः'**से भगवान् मुरारिके किरीटका पूजन करे। फिर 'रोहिणीनामधेयलक्ष्मीसौभाग्यसौख्यामृत-सागराय पद्मश्रिये नमः' (रोहिणी नाम धारण करनेवाली लक्ष्मीके सौभाग्य और सुखरूप अमृतके समुद्र तथा कमलकी-सी कान्तिवाले भगवान्को नमस्कार है)—इस मन्त्रका उच्चारण करके भगवान्के सामने