भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

९० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


पुलस्त्यजी कहते हैं— राजन् ! इसी प्रकार एक दूसरा व्रत बतलाता हूँ, जो समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। उसका नाम है—सौभाग्यशयन। इसे पुराणोंके विद्वान् ही जानते हैं। पूर्वकालमें जब भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक तथा महर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक दग्ध हो गये, तब समस्त प्राणियोंका सौभाग्य एकत्रित होकर वैकुण्ठमें जा भगवान् श्रीविष्णुके वक्षःस्थलमें स्थित हो गया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब पुनः सृष्टि-रचनाका समय आया, तब प्रकृति और पुरुषसे युक्त सम्पूर्ण लोकोंके अहङ्कारसे आवृत्त हो जानेपर श्रीब्रह्माजी तथा भगवान् श्रीविष्णुमें स्पर्धा जाग्रत् हुई। उस समय एक पीले रंगकी भयङ्कर अग्निज्वाला प्रकट हुई। उससे भगवान्‌का वक्षःस्थल तप उठा, जिससे वह सौभाग्यपुञ्ज वहाँसे गलित हो गया। श्रीविष्णुके वक्षःस्थलका वह सौभाग्य अभी रसरूप होकर धरतीपर गिरने नहीं पाया था कि ब्रह्माजीके बुद्धिमान् पुत्र दक्षने उसे आकाशमें ही रोककर पी लिया। दक्षके पीते ही वह अद्भुत रूप और लावण्य प्रदान करनेवाला सिद्ध हुआ। प्रजापति दक्षका बल और तेज बहुत बढ़ गया। उनके पीनेसे बचा हुआ जो अंश पृथ्वीपर गिर पड़ा, वह आठ भागोंमें बँट गया। उनमेंसे सात भागोंसे सात सौभाग्यदायिनी ओषधियाँ उत्पन्न हुईं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—ईख, तरुराज, निष्पाव, राजधान्य (शालि या अगहनी), गोक्षीर (क्षीरजीरक), कुसुम्भ और कुसुम। आठवाँ नमक है। इन आठोंकी सौभाग्याष्टक संज्ञा कहते हैं।

योग और ज्ञानके तत्त्वको जाननेवाले ब्रह्मपुत्र दक्षने पूर्वकालमें जिस सौभाग्य-रसका पान किया था, उसके अंशसे उन्हें सती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई। नील कमलके समान मनोहर शरीरवाली वह कन्या लोकमें ललिताके नामसे भी प्रसिद्ध है। पिनाकधारी भगवान् शङ्करने उस त्रिभुवनसुन्दरी देवीके साथ विवाह किया। सती तीनों लोकोंकी सौभाग्यरूपा हैं। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। उनकी आराधना करके नर या नारी क्या नहीं प्राप्त कर सकती।

भीष्मजीने पूछा— मुने! जगद्धात्री सतीकी आराधना कैसे की जाती है? जगत्‌की शान्तिके लिये जो विधान हो, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

पुलस्त्यजी बोले— चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको दिनके पूर्व भागमें मनुष्य तिलमिश्रित जलसे स्नान करे। उस दिन परम सुन्दरी भगवती सतीका विश्वात्मा भगवान् शङ्करके साथ वैवाहिक मन्त्रोंद्वारा विवाह हुआ था; अतः तृतीयाको सती देवीके साथ ही भगवान् शङ्करका भी पूजन करे। पञ्चगव्य तथा चन्दन-मिश्रित जलके द्वारा गौरी और भगवान् चन्द्रशेखरकी प्रतिमाको स्नान कराकर धूप, दीप, नैवेद्य तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा उन दोनोंकी पूजा करनी चाहिये। 'पार्वतीदेव्यै नमः,' 'शिवाय नमः' इन मन्त्रोंसे क्रमशः पार्वती और शिवके चरणोंका; 'जयायै नमः', 'शिवाय नमः' से दोनोंकी घुट्टियोंका; 'त्र्यम्बकाय नमः', 'भवान्यै नमः' से पिंडलियोंका; 'भद्रेश्वराय नमः', 'विजयायै नमः' से घुटनोंका; 'हरिकेशाय नमः', 'वरदायै नमः' से जाँघोंका; 'ईशाय शङ्कराय नमः', 'रत्न्यै नमः' से दोनोंके कटिभागका; 'कोटिन्यै नमः', 'शूलिने नमः' से कुक्षिभागका; 'शूलपाणये नमः', 'मङ्गलायै नमः' से उदरका; 'सर्वात्मने नमः', 'ईशान्यै नमः' से दोनों स्तनोंका; 'चिदात्मने नमः', 'रुद्राण्यै नमः' से कण्ठका; 'त्रिपुरघ्नाय नमः', 'अनन्तायै नमः' से दोनों हाथोंका; 'त्रिलोचनाय नमः', 'कालानलप्रियायै नमः' से बाँहोंका; 'सौभाग्यभवनाय नमः' से आभूषणोंका; 'स्वधायै नमः', 'ईश्वराय नमः' से दोनोंके मुखमण्डलका; 'अशोकवनवासिन्यै नमः'—इस मन्त्रसे ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ओठोंका; 'स्थाणवे नमः', 'चन्द्रमुखप्रियायै नमः' से मुँहका; 'अर्द्धनारीश्वराय नमः', 'असिताङ्गयै नमः' से नासिकाका; 'उग्राय नमः', 'ललितायै नमः' से दोनों भौंहोंका; 'शर्वाय नमः', 'वासुदेव्यै नमः' से केशोंका; 'श्रीकण्ठनाथाय नमः' से केवल शिवके बालोंका तथा 'भीमोग्ररूपिण्यै नमः', 'सर्वात्मने नमः' से दोनोंके मस्तकोंका पूजन करे। इस प्रकार शिव और पार्वतीकी

पद्म पुराण · पृष्ठ 107, कुल 1018 में से · BharatKosha