पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
जो दूसरोंके लिये मनसे भी अगम्य हैं, महर्षि भृगुने हिमालय पर्वतके निकुञ्जमें होमका धुआँ पीकर कठोर तपस्याके द्वारा जिनकी आराधना की थी तथा जिन महात्माने भृगुको [उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर] सञ्जीवनी विद्या प्रदान की, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
नानाविधैर्गजबिडालसमानवक्त्रै- दक्षाध्वरप्रमथनैर्बलिभिर्गणौघैः । योऽभ्यर्च्यतेऽमरगणैश्च सलोकपालै- स्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
हाथी और बिल्ली आदिकी-सी मुखाकृतिवाले तथा दक्ष-यज्ञका विनाश करनेवाले नाना प्रकारके महाबली गणोंद्वारा जिनकी निरन्तर पूजा होती रहती है तथा लोकपालोंसहित देवगण भी जिनकी आराधना किया करते हैं, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
क्रीडार्थमेव भगवान् भुवनानि सप्त नानानदीविहगपादपमण्डितानि । सब्रह्मकानि व्यसृजत् सुकृताहितानि तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
जिन भगवान्ने अपनी क्रीडाके लिये ही अनेकों नदियों, पक्षियों और वृक्षोंसे सुशोभित एवं ब्रह्माजीसे अधिष्ठित सातों भुवनोंकी रचना की है तथा जिन्होंने सम्पूर्ण लोकोंको अपने पुण्यपर ही प्रतिष्ठित किया है, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
यस्याखिलं जगदिदं वशवर्ति नित्यं योऽष्टाभिरेव तनुभिर्भुवनानि भुङ्क्ते । यः कारणं सुमहतामपि कारणानां तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
यह सम्पूर्ण विश्व सदा ही जिनकी आज्ञाके अधीन है, जो [जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, वायु और प्रकृति—इन] आठ विग्रहोंसे समस्त लोकोंका उपभोग करते हैं तथा जो बड़े-से-बड़े कारण-तत्त्वोंके भी महाकारण हैं, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
शङ्खेन्दुकुन्दधवलं वृषभप्रवीर- मारुह्य यः क्षितिधरेन्द्रसुतानुयातः । यात्यम्बरे हिमविभूतिविभूषिताङ्ग- स्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
जो अपने श्रीविग्रहको हिम और भस्मसे विभूषित करके शङ्ख, चन्द्रमा और कुन्दके समान श्वेत वर्णवाले वृषभ-श्रेष्ठ नन्दीपर सवार होकर गिरिराजकिशोरी उमाके साथ आकाशमें विचरते हैं, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
शान्तं मुनिं यमनियोगपरायणं तै- र्भीमैर्यमस्य पुरुषैः प्रतिनीयमानम् । भक्त्या नतं स्तुतिपरं प्रसभं ररक्ष तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
यमराजकी आज्ञाके पालनमें लगे रहनेपर भी जिन्हें वे भयङ्कर यमदूत पकड़कर लिये जा रहे थे तथा जो भक्तिसे नम्र होकर स्तुति कर रहे थे, उन शान्त मुनिकी जिन्होंने बलपूर्वक यमदूतोंसे रक्षा की, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
यः सव्यपाणिकमलाग्रनखेन देव- स्तत् पञ्चमं प्रसभमेव पुरः सुराणाम् । ब्राह्मं शिरस्तरुपद्मनिभं चकर्त तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
जिन्होंने समस्त देवताओंके सामने ही ब्रह्माजीके उस पाँचवें मस्तकको, जो नवीन कमलके समान शोभा पा रहा था, अपने बायें हाथके नखसे बलपूर्वक काट डाला था, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।
यस्य प्रणम्य चरणौ वरदस्य भक्त्या स्तुत्वा च वाग्भिरमलाभिरतन्द्रिताभिः । दीप्तैस्तमांसि नुदते स्वकरैर्विश्वस्वां- स्तं शङ्करं शरणदं शरणं व्रजामि ॥
जिन वरदायक भगवान्के चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके तथा आलस्यरहित निर्मल वाणीके द्वारा जिनकी स्तुति करके सूर्यदेव अपनी उद्दीप्त किरणोंसे जगत्का अन्धकार दूर करते हैं, उन शरणदाता भगवान् श्रीशङ्करकी मैं शरण लेता हूँ।