पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदिच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
**अरजा बोली—**राजेन्द्र ! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं भार्गव-वंशकी कन्या हूँ। पुण्यात्मा शुक्राचार्यकी मैं ज्येष्ठ पुत्री हूँ, मेरा नाम अरजा है। पिताजी इस आश्रमपर ही निवास करते हैं। महाराज ! शुक्राचार्य मेरे पिता हैं और आप उनके शिष्य हैं। अतः धर्मके नाते मैं आपकी बहिन हूँ। इसलिये आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। यदि दूसरे कोई दुष्ट पुरुष भी मुझपर कुदृष्टि करें तो आपको सदा उनके हाथसे मेरी रक्षा करनी चाहिये। मेरे पिता बड़े क्रोधी और भयङ्कर हैं। वे [अपने शापसे] आपको भस्म कर सकते हैं। अतः नृपश्रेष्ठ ! आप मेरे महातेजस्वी पिताके पास जाइये और धर्मानुकूल बर्तावके द्वारा उनसे मेरे लिये याचना कीजिये। अन्यथा [इसके विपरीत आचरण करनेपर] आपपर महान् एवं घोर दुःख आ पड़ेगा। मेरे पिताका क्रोध उमड़ जानेपर वे समूची त्रिलोकीको भी जलाकर खाक कर सकते हैं।
**दण्ड बोला—**सुन्दरी ! तुम्हें पा लेनेपर चाहे मेरा वध हो जाय अथवा वधसे भी महान् कष्ट भोगना पड़े [मुझे स्वीकार है]। भीरु ! मैं तुम्हारा भक्त हूँ, मुझे स्वीकार करो।
ऐसा कहकर राजाने उस कन्याको बलपूर्वक बाहुपाशमें कस लिया और उस एकान्त वनमें, जहाँसे कहीं आवाज भी नहीं पहुँच सकती थी, उसे नंगा कर दिया। बेचारी अबला उसकी भुजाओंसे छूटनेके लिये बहुत छटपटायी, परन्तु फिर भी उसने स्वेच्छानुसार उसके साथ भोग किया। राजा दण्ड वह अत्यन्त कठोरतापूर्ण और महाभयानक अपराध करके तुरंत अपने नगरको चल दिया तथा भार्गव-कन्या अरजा दीनभावसे रोती हुई अत्यन्त उद्विग्न हो आश्रमके समीप अपने देव-तुल्य पिताके पास आयी। उसके पिता अमित तेजस्वी देवर्षि शुक्राचार्य सरोवरपर स्नान करने गये थे। स्नान करके वे दो ही घड़ीमें शिष्योंसहित आश्रमपर लौट आये। [आश्रमपर आकर] उन्होंने देखा—अरजाकी दशा बड़ी दयनीय है, वह धूलमें सनी हुई है। [ तुरंत ही सारा रहस्य उनके ध्यानमें आ गया।] फिर तो शुक्रको बड़ा रोष हुआ, वे तीनों लोकोंको दग्ध-सा करते हुए अपने शिष्योंको सुनाकर बोले—'धर्मके विपरीत आचरण करनेवाले अदूरदर्शी दण्डके ऊपर प्रज्वलित अग्निशिखाके समान भयङ्कर विपत्ति आ रही है; तुम सब लोग देखना—वह खोटी बुद्धिवाला पापी राजा अपने देश, भृत्य, सेना और वाहनसहित नष्ट हो जायगा। उसका राज्य सौ योजन लम्बा-चौड़ा है, उस समूचे राज्यमें इन्द्र धूलकी बड़ी भारी वर्षा करेंगे। उस राज्यमें रहनेवाले स्थावर-जङ्गम जितने भी प्राणी हैं, उन सबका उस धूलकी वर्षासे शीघ्र ही नाश हो जायगा। जहाँतक दण्डका राज्य है, वहाँतकके उपवनों और आश्रमोंमें अकस्मात् सात राततक धूलकी वर्षा होती रहेगी।'
क्रोधसे संतप्त होनेके कारण इस प्रकार शाप दे महर्षि शुक्रने आश्रमवासी शिष्योंसे कहा—'तुमलोग यहाँ रहनेवाले सब लोंगोंको इस राज्यकी सीमासे बाहर ले जाओ।' उनकी आज्ञा पाते ही आश्रमवासी मनुष्य शीघ्रतापूर्वक उस राज्यसे हट गये और सीमासे बाहर जाकर उन्होंने अपने डेरे डाल दिये। तदनन्तर शुक्राचार्य अरजासे बोले—'ओ नीच बुद्धिवाली कन्या ! तू अपने चित्तको एकाग्र करके सदा इस आश्रमपर ही निवास कर। यह चार कोसके विस्तारका सुन्दर शोभासम्पन्न सरोवर है। अरजे ! तू रजोगुणसे रहित सात्त्विक जीवन व्यतीत करती हुई सौ वर्षोंतक यहीं रह।' महर्षिका यह आदेश सुन अरजाने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की। उस समय वह बहुत ही दुःखी हो रही थी। शुक्राचार्यने कन्यासे उपर्युक्त बात कहकर वहाँसे दूसरे आश्रमके लिये प्रस्थान किया। ब्रह्मवादी महर्षिके कथनानुसार विन्ध्यगिरिके शिखरोंपर फैला हुआ राजा दण्डका समूचा राज्य एक सप्ताहके भीतर ही जलकर खाक हो गया। तबसे वह विशाल वन 'दण्डकारण्य' कहलाता है। रघुनन्दन ! आपने जो मुझसे पूछा था, वह सारा प्रसङ्ग मैंने कह सुनाया, अब सन्ध्योपासनका समय बीता जा रहा है। ये महर्षिगण सब ओर जलसे भरे घड़े लेकर अर्घ्य दे भगवान् सूर्यकी पूजा कर रहे हैं। आप