पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंसृष्टिखण्ड ] *** अधम ब्राह्मणोंका वर्णन, पतित विप्रकी कथा और गरुड़जीका चरित्र *** १५७
वृक्षकी बहुत बड़ी शाखापर बैठे। उनके पंजा रखते ही वह शाखा सहसा टूट पड़ी। उसे गिरते देख महाबली पक्षिराज गरुड़ने गौ और ब्राह्मणोंके वधके भयसे तुरंत पकड़ लिया और फिर बड़े वेगसे आकाशमें उड़ने लगे। उन्हें बहुत देरसे आकाशमें मँडराते देख भगवान् श्रीविष्णु मनुष्यका रूप धारण कर उनके पास जा इस प्रकार बोले—'पक्षिराज ! तुम कौन हो और किसलिये यह विशाल शाखा तथा ये महान् हाथी एवं कछुआ लिये आकाशमें घूम रहे हो?' उनके इस प्रकार पूछनेपर पक्षिराजने नररूपधारी श्रीनारायणसे कहा—'महाबाहो ! मैं गरुड़ हूँ। अपने कर्मके अनुसार मुझे पक्षी होना पड़ा है। मैं कश्यप मुनिका पुत्र हूँ और माता विनताके गर्भसे मेरा जन्म हुआ है। देखिये, इन बड़े-बड़े जीवोंको मैंने खानेके लिये पकड़ रखा है। वृक्ष और पर्वत—कोई भी मुझे धारण नहीं कर पाते। अनेकों योजन उड़नेके बाद मैं एक विशाल जामुनका वृक्ष देखकर इन दोनोंको खानेके लिये उसकी शाखापर बैठा था; किन्तु मेरे बैठते ही वह भी सहसा टूट गयी, अतः सहस्रों ब्राह्मणों और गौओंके वधके डरसे इसे भी लिये डोलता हूँ। अब मेरे मनमें बड़ा विषाद हो रहा है कि क्या करूँ, कहाँ जाऊँ और कौन मेरा वेग सहन करेगा।'
**श्रीविष्णु बोले—**अच्छा, मेरी बाँहपर बैठकर तुम इन दोनों—हाथी और कछुएको खाओ।
**गरुड़ने कहा—**बड़े-बड़े पर्वत भी मुझे धारण करनेमें असमर्थ हो रहे हैं; फिर तुम मुझ-जैसे महाबली पक्षीको कैसे धारण कर सकोगे ? भगवान् श्रीनारायणके सिवा दूसरा कौन है, जो मुझे धारण कर सके। तीनों लोकोंमें कौन ऐसा पुरुष है, जो मेरा भार सह लेगा।
**श्रीविष्णु बोले—**पक्षिश्रेष्ठ ! बुद्धिमान् पुरुषको अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये, अतः इस समय तुम अपना काम करो। कार्य हो जानेपर निश्चय ही मुझे जान लोगे।
गरुड़ने उन्हें महान् शक्तिसम्पन्न देख मन-ही-मन कुछ विचार किया, फिर 'एवमस्तु' कहकर वे उनकी विशाल भुजापर बैठे। गरुड़के वेगपूर्वक बैठनेपर भी उनकी भुजा काँपी नहीं। वहाँ बैठकर गरुड़ने उस शाखाको तो पर्वतके शिखरपर डाल दिया और हाथी तथा कछुएको भक्षण किया। तत्पश्चात् वे श्रीविष्णुसे बोले—'तुम कौन हो ? इस समय तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?'
**भगवान् श्रीविष्णुने कहा—**मुझे नारायण समझो, मैं तुम्हारा प्रिय करनेके लिये यहाँ आया हूँ।
यह कहकर भगवान्ने उन्हें विश्वास दिलानेके लिये अपना रूप दिखाया। मेघके समान श्याम विग्रहपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। चार भुजाओंके कारण उनकी झाँकी बड़ी मनोरम जान पड़ती थी। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये सर्वदेवेश्वर श्रीहरिका दर्शन करके गरुड़ने उन्हें प्रणाम किया और कहा—'पुरुषोत्तम ! बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?'
**श्रीविष्णु बोले—**सखे ! तुम बड़े शूरवीर हो, अतः हर समय मेरा वाहन बने रहो।
यह सुनकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ने भगवान्से कहा—'देवेश्वर ! आपका दर्शन करके मैं धन्य हुआ,