पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् *
[ संक्षिप्त पद्मपुराण
उससे तुलना कैसे हो सकती है? विधाता ! इस
विषयको लेकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है।
ब्रह्माजीने कहा- बेटा ! पहले भगवान्के
मुखसे महान् तेजोमय पुञ्ज प्रकट हुआ। उस तेजसे
सर्वप्रथम वेदकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् क्रमशः अग्नि, गौ
और ब्राह्मण - ये पृथक् पृथक् उत्पन्न हुए। मैंने सम्पूर्ण
लोकों और भुवनोंकी रक्षाके लिये पूर्वकालमें एक वेदसे
चारों वेदोंका विस्तार किया। अग्नि और ब्राह्मण
देवताओंके लिये हविष्य ग्रहण करते हैं और हविष्य
(घी) गौओंसे उत्पन्न होता है; इसलिये ये चारों ही इस
जगत्के जन्मदाता हैं। यदि ये चारों महत्तर पदार्थ विश्वमें
नहीं होते तो यह सारा चराचर जगत् नष्ट हो जाता। ये
ही सदा जगत्को धारण किये रहते हैं; जिससे स्वभावतः
इसकी स्थिति बनी रहती है। ब्राह्मण, देवता तथा
असुरोंको भी गौकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि गौ सब
कार्योंमें उदार तथा वास्तवमें समस्त गुणोंकी खान है।
वह साक्षात् सम्पूर्ण देवताओंका स्वरूप है। सब
प्राणियोंपर उसकी दया बनी रहती है। प्राचीन कालमें
सबके पोषणके लिये मैंने गौकी सृष्टि की थी। गौओंकी
प्रत्येक वस्तु पावन है और समस्त संसारको पवित्र कर
देती है। गौका मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी-इन
पञ्चगव्योंका पान कर लेनेपर शरीरके भीतर पाप नहीं
ठहरता। इसलिये धार्मिक पुरुष प्रतिदिन गौके दूध, दही
और घी खाया करते हैं। गव्य पदार्थ सम्पूर्ण द्रव्योंमें
श्रेष्ठ, शुभ और प्रिय हैं। जिसको गायका दूध, दही और
घी खानेका सौभाग्य नहीं प्राप्त होता, उसका शरीर मलके
समान है। अन्न आदि पाँच रात्रितक, दूध सात रात्रितक,
दही बीस रात्रितक और घी एक मासतक शरीरमें अपना
प्रभाव रखता है। जो लगातार एक मासतक बिना
गव्यका भोजन करता है, उस मनुष्यके भोजनमें प्रेतोंको
भाग मिलता है; इसलिये प्रत्येक युगमें सब कार्योंकें
लिये एकमात्र गौ ही प्रशस्त मानी गयी है। गौ सदा और
सब समय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - ये चारों
पुरुषार्थ प्रदान करनेवाली है।
जो गौकी एक बार प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर अक्षय स्वर्गका
सुख भोगता है। जैसे देवताओंके आचार्य बृहस्पतिजी
वन्दनीय हैं, जिस प्रकार भगवान् लक्ष्मीपति सबके पूज्य
हैं, उसी प्रकार गौ भी वन्दनीय और पूजनीय है। जो
मनुष्य प्रातःकाल उठकर गौ और उसके घीका स्पर्श
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गौएँ दूध
और घी प्रदान करनेवाली हैं। वे घृतकी उत्पत्ति-स्थान
और घीकी उत्पत्तिमें कारण हैं। वे घीकी नदियाँ हैं, उनमें
घीकी भँवरें उठती हैं। ऐसी गौएँ सदा मेरे घरपर मौजूद
रहें। * घी मेरे सम्पूर्ण शरीर और मनमें स्थित हो। 'गौएँ
सदा मेरे आगे रहें। वे ही मेरे पीछे रहें। मेरे सब अङ्गोंको
गौओंका स्पर्श प्राप्त हो। मैं गौओंके बीचमें निवास
करूँ।'† इस मन्त्रको प्रतिदिन सन्ध्या और सबेरेके
समय शुद्ध भावसे आचमन करके जपना चाहिये। ऐसा
करनेसे उसके सब पापोंका क्षय हो जाता है तथा वह
स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जैसे गौ आदरणीय है वैसे
ब्राह्मण; जैसे ब्राह्मण हैं वैसे भगवान् श्रीविष्णु। जैसे
भगवान् श्रीविष्णु हैं वैसी ही श्रीगङ्गाजी भी हैं। ये सभी
धर्मके साक्षात् स्वरूप माने गये हैं। गौएँ मनुष्योंकी बन्धु
हैं और मनुष्य गौओंके बन्धु हैं। जिस घरमें गौ नहीं है,
वह बन्धुरहित गृह है। छहों अङ्गों, पदों और क्रमोंसहित
सम्पूर्ण वेद गौओंके मुखमें निवास करते हैं। उनके
सींगोंमें भगवान् श्रीशङ्कर और श्रीविष्णु सदा विराजमान
रहते हैं। गौओंके उदरमें कार्तिकेय, मस्तकमें ब्रह्मा,
ललाटमें महादेवजी, सींगोंके अग्रभागमें इन्द्र, दोनों
कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें
गरुड़, जिह्वामें सरस्वती देवी, अपान (गुदा) में
- घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः । घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ॥
(४५। १४९)
‡ गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च। गावश्च सर्वगात्रेषु गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥