भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१८ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


मुझसे ऐसी बात न कहो। शुभे ! मैं पिताके लिये ही यहाँ आया हूँ और उन्हींके लिये तुमसे प्रार्थना करता हूँ। इसके विपरीत दूसरी कोई बात न कहो। मेरे पिताजीको ही स्वीकार करो। देवि ! इसके लिये तुम चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीकी जो-जो वस्तु चाहोगी, वह सब निस्संदेह तुम्हें अर्पण करूँगा। अधिक क्या कहूँ, देवताओंका राज्य आदि भी यदि चाहो तो तुम्हें दे सकता हूँ।'

स्त्री बोली-यदि तुम अपने पिताके लिये इस प्रकार दान देनेमें समर्थ हो तो मुझे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंका अभी दर्शन कराओ।

वेदशर्मा बोले- देवि ! मेरा बल, मेरी तपस्याका प्रभाव देखो। मेरे आवाहन करनेपर ये इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता यहाँ आ पहुँचे।

देवताओंने वेदशर्मासे कहा- 'द्विजश्रेष्ठ ! हम तुम्हारा कौन-सा कार्य करें ?'

वेदशर्मा बोले- देवगण ! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अपने पिताके चरणोंमें पूर्ण भक्ति प्रदान करें। 'एवमस्तु' कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे, वैसे लौट गये। तब उस स्त्रीने हर्षमें भरकर कहा- 'तुम्हारी तपस्याका बल देख लिया। देवताओंसे मुझे कोई काम नहीं है। यदि तुम मुझे मुँहमाँगी वस्तु देना चाहते हो और अपने पिताके लिये मुझे ले जाना चाहते हो तो अपना सिर अपने ही हाथसे काटकर मुझे अर्पण कर दो।'

वेदशर्माने कहा- देवि ! आज मैं धन्य हो गया। शुभे ! मैं पिताके लिये अपना मस्तक भी दे दूँगा; ले लो, ले लो। यह कहकर द्विजश्रेष्ठ वेदशर्माने तीखी धारवाली तेज तलवार उठायी और हँसते-हँसते अपना मस्तक काटकर उस स्त्रीको दे दिया। खूनमें डूबे हुए उस मस्तकको लेकर वह शिवशर्माके पास गयी।

स्त्रीने कहा- विप्रवर ! तुम्हारे पुत्र वेदशर्माने मुझे तुम्हारी सेवाके लिये यहाँ भेजा है; यह उनका मस्तक है, इसे ग्रहण करो। इसको उन्होंने अपने हाथसे काटकर दिया है।

उस मस्तकको देखकर वेदशर्माके चारों भाई काँप उठे। उन पुण्यात्मा बन्धुओंमें इस प्रकार बात होने लगी- 'अहो ! धर्म ही जिसका सर्वस्व था, वह हमारी माता सत्य समाधिके द्वारा मृत्युको प्राप्त हो गयी। हमलोगोंमें ये वेदशर्मा ही परम सौभाग्यशाली थे, जिन्होंने पिताके लिये प्राण दे दिये। ये धन्य तो थे ही और अधिक धन्य हो गये।' शिवशर्माने उस स्त्रीकी बात सुनकर जान लिया कि वेदशर्मा पूर्ण भक्त था। तत्पश्चात् उन्होंने अपने तृतीय पुत्र धर्मशर्मासे कहा- 'बेटा ! यह अपने भाईका मस्तक लो और जिस प्रकार यह जी सके, वह उपाय करो।'

सूतजी कहते हैं - धर्मशर्मा भाईके मस्तकको लेकर तुरंत ही वहाँसे चल दिये। उन्होंने पिताकी भक्ति, तपस्या, सत्य और सरलताके बलसे धर्मको आकर्षित किया। उनकी तपस्यासे खिंचकर धर्मराज धर्मशर्माके पास आये और इस प्रकार बोले - 'धर्मशर्मन् ! तुम्हारे आवाहन करनेसे मैं यहाँ उपस्थित हुआ हूँ; मुझे अपना कार्य बताओ, मैं उसे निस्सन्देह पूर्ण करूँगा।'

धर्मशर्माने कहा- धर्मराज ! यदि मैंने गुरुकी सेवा की हो, यदि मुझमें पिताके प्रति निष्ठा और अविचल तपस्या हो तो इस सत्यके प्रभावसे मेरे भाई वेदशर्मा जी उठें।

धर्म बोले- महामते ! मैं तुम्हारी तपस्या और पितृभक्तिसे सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे भाई जी जायँगे; तुम्हारा कल्याण हो। धर्मवेत्ताओंके लिये जो दुर्लभ है, ऐसा कोई उत्तम वरदान मुझसे और माँग लो।

धर्मशर्माने जब धर्मका यह उत्तम वचन सुना तो उस महायशस्वीने महात्मा वैवस्वतसे कहा- 'धर्मराज ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो पिताके चरणोंकी पूजामें अविचल भक्ति, धर्ममें अनुराग तथा अन्तमें मोक्षका वरदान मुझे दीजिये।' तब धर्मने कहा- 'मेरी कृपासे यह सब कुछ तुम्हें प्राप्त होगा।' उनके मुखसे यह महावाक्य निकलते ही वेदशर्मा उठकर खड़े हो गये। मानो वे सोतेसे जाग उठे हों। उठते ही महाबुद्धिमान् वेदशर्माने धर्मशर्मासे कहा- 'भाई ! वे देवी कहाँ