पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिखण्ड ] * वसिष्ठजीके द्वारा सोमशर्माके पूर्वजन्मका वर्णन तथा उन्हें भगवद्भजनका उपदेश * २३१
वसिष्ठजीके द्वारा सोमशर्माके पूर्वजन्म-सम्बन्धी शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तथा उन्हें भगवान्के भजनका उपदेश
सोमशर्माने पूछा— कल्याणी ! मैं किस प्रकार सर्वज्ञ और गुणवान् पुत्र प्राप्त कर सकूँगा ?
सुमना बोली— स्वामिन् ! आप महामुनि वसिष्ठजीके पास जाइये; वे धर्मके ज्ञाता हैं, उन्हींसे प्रार्थना कीजिये। उनसे आपको धर्मज्ञ एवं धर्मवत्सल पुत्रकी प्राप्ति होगी।
सूतजी कहते हैं— पत्नीके यों कहनेपर द्विजश्रेष्ठ सोमशर्मा सब बातोंके जाननेवाले, तेजस्वी और तपस्वी महात्मा वसिष्ठजीके पास गये। वे गङ्गाजीके तटपर स्थित अपने पवित्र आश्रममें विराजमान थे। सोमशर्माने बड़ी भक्तिके साथ बारंबार उन्हें दण्डवत्-प्रणाम किया। तब पापरहित महातेजस्वी ब्रह्मपुत्र वसिष्ठजी उनसे बोले—'महामते ! इस पवित्र आसनपर सुखसे बैठो।' यह कहकर उन योगीश्वरने पूछा—'महाभाग ! तुम्हारे पुण्यकर्म और अग्निहोत्र आदि कार्य कुशलसे हो रहे हैं न ? शरीरसे तो नीरोग रहते हो न ? धर्मका पालन तो सदा करते ही होगे। द्विजश्रेष्ठ ! बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी प्रिय कामना पूर्ण करूँ ?' इस प्रकार संभाषण करके वसिष्ठजी चुप हो गये। तब सोमशर्माने कहा—'तात ! किस पापके कारण मुझे दरिद्रताका कष्ट भोगना पड़ता है ? मुझे पुत्रका सुख क्यों नहीं मिलता, इस बातका मेरे मनमें बड़ा सन्देह है। किस पापसे ऐसा हो रहा है, यह बताइये। महामते ! मैं महान् पापसे मोहित एवं विवेकशून्य हो गया था, अपनी प्यारी पत्नीके समझाने और भेजनेसे आज आपके पास आया हूँ।
वसिष्ठजीने कहा— द्विजश्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे सामने पुत्रके पवित्र लक्षणका वर्णन करता हूँ। जिसका मन पुण्यमें आसक्त हो, जो सदा सत्यधर्मके पालनमें तत्पर रहता हो और जो बुद्धिमान्, ज्ञानसम्पन्न, तपस्वी, वक्ताओंमें श्रेष्ठ, सब कर्मोंमें कुशल, धीर, वेदाध्ययन-परायण, सम्पूर्ण शास्त्रोंका वक्ता, देवता और ब्राह्मणोंका पुजारी, समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला, ध्यानी, त्यागी, प्रिय वचन बोलनेवाला, भगवान् श्रीविष्णुके ध्यानमें तत्पर, नित्य शान्त, जितेन्द्रिय, सदा जप करनेवाला, पितृभक्तिपरायण, सदा समस्त स्वजनोंपर स्नेह रखनेवाला, कुलका उद्धारक, विद्वान् तथा कुलको सन्तुष्ट करनेवाला हो—ऐसे गुणोंसे युक्त उत्तम पुरुष ही सुख देनेवाला होता है। इसके सिवा दूसरे तरहके पुत्र सम्बन्ध जोड़कर केवल शोक और सन्ताप देते हैं। ऐसा पुत्र किस कामका। उसके होनेसे कोई लाभ नहीं है। महाप्राज्ञ ! तुम पूर्वजन्ममें शूद्र थे। तुम्हें धर्माधर्मका ज्ञान नहीं था, तुम बड़े लोभी थे। तुम्हारे एक स्त्री और बहुत-से पुत्र थे। तुम दूसरोंके साथ सदा द्वेष रखते थे। तुमने सत्यका कभी श्रवण नहीं किया था। तीर्थोंकी यात्रा नहीं की थी। महामते ! तुमने एक ही काम किया था—खेती करना। बार-बार तुम उसीमें लगे रहते थे। द्विजश्रेष्ठ ! तुम पशुओंका पालन भी करते थे। पहले गाय पालते थे, फिर भैंस और घोड़ोंको भी पालने लगे। तुमने अन्नको बहुत महँगा कर रखा था। तुम इतने निर्दयी थे कि कभी किसीको किञ्चित् भी दान नहीं किया। देवताओंकी पूजा नहीं की। पर्व आनेपर ब्राह्मणोंको धन नहीं दिया तथा श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर भी तुमने श्रद्धापूर्वक कुछ नहीं किया। तुम्हारी साध्वी स्त्री कहती थी—'आज श्राद्धका दिन है। यह श्वशुरके श्राद्धका समय है और यह सासके।' महामते ! उसकी ये बातें सुनकर तुम घर छोड़ कहीं अन्यत्र भाग जाते थे। तुमने धर्मका मार्ग न कभी देखा था, न सुना ही था। लोभ ही तुम्हारी माता, लोभ ही पिता, लोभ ही भ्राता और लोभ ही स्वजन एवं बन्धु था। तुमने सदाके लिये धर्मको तिलाञ्जलि देकर एकमात्र लोभका ही आश्रय लिया था; इसीलिये तुम दुःखी और गरीबीसे पीड़ित हुए हो।
तुम्हारे हृदयमें प्रतिदिन महातृष्णा बढ़ती जाती थी। रातमें सो जानेपर भी तुम सदा धनकी ही चिन्तामें लगे