पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिखण्ड ] * श्रीभगवान्के वरसे सोमशर्माको सुव्रत नामक पुत्रकी प्राप्ति तथा वैकुण्ठमें जाना * २३९
देखता, तब कहता—'इस अन्नसे भगवान् श्रीविष्णु तृप्त हों।' वह धर्मात्मा बालक जब सोनेके लिये जाता, तब वहाँ भी श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए कहता—'मैं योगनिद्रापरायण भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आया हूँ।' इस प्रकार भोजन करते, वस्त्र पहनते, बैठते और सोते समय भी वह श्रीवासुदेवका चिन्तन करता और उन्हींको सब वस्तुएँ समर्पित कर देता था। धर्मात्मा सुव्रत युवावस्था आनेपर काम-भोगका परित्याग करके वैदूर्य पर्वतपर जा भगवान् श्रीविष्णुके ध्यानमें लग गया। वहीं उस मेधावीने श्रीविष्णुका चिन्तन करते हुए तपस्या आरम्भ कर दी। उस श्रेष्ठ पर्वतपर सिद्धेश्वर नामक स्थानके पास वह निर्जन वनमें रहता और काम-क्रोध आदि सम्पूर्ण दोषोंका परित्याग करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए तपस्या करता था। उसने अपने मनको एकाग्र करके भगवान् श्रीविष्णुके साथ जोड़ दिया। इस प्रकार परमात्माके ध्यानमें सौ वर्षोंतक लगे रहनेपर उसके ऊपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीजगन्नाथ बहुत प्रसन्न हुए तथा लक्ष्मीजीके साथ उसके सामने प्रकट होकर बोले—'धर्मात्मा सुव्रत ! अब ध्यानसे उठो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं विष्णु तुम्हारे पास आया हूँ, मुझसे वर माँगो।' मेधावी सुव्रत भगवान् श्रीविष्णुके ये उत्तम वचन सुनकर अत्यन्त हर्षमें भर गये। उन्होंने आँख खोलकर देखा, जनार्दन सामने खड़े हैं; फिर तो दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने श्रीभगवान्को प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।
सुव्रत बोले— संसारसागरमतीव गभीरपारं दुःखोर्मिभिर्विविधमोहमयैस्तरङ्गैः । सम्पूर्णमस्ति निजदोषगुणैस्तु प्राप्तं तस्मात् समुद्धर जनार्दन मां सुदीनम् ॥
जनार्दन ! यह संसार-समुद्र अत्यन्त गहरा है, इसका पार पाना कठिन है। यह दुःखमयी लहरों और मोहमयी भाँति-भाँतिकी तरङ्गोंसे भरा है। मैं अत्यन्त दीन हूँ और अपने ही दोषों तथा गुणोंसे—पाप-पुण्योंसे प्रेरित होकर इसमें आ फँसा हूँ; अतः आप मेरा इससे उद्धार कीजिये।
कर्माम्बुदे महति गर्जति वर्षतीव विद्युल्लतोल्लसति पातकसञ्चयैर्मे । मोहान्धकारपटलैर्मम नष्टदृष्टे- र्दीनस्य तस्य मधुसूदन देहि हस्तम् ॥
कर्मरूपी बादलोंकी भारी घटा घिरी हुई है, जो गरजती और बरसती भी है। मेरे पातकोंकी राशि विद्युल्लताकी भाँति उसमें थिरक रही है। मोहरूपी अन्धकार-समूहसे मेरी दृष्टि—विवेकशक्ति नष्ट हो गयी है, मैं अत्यन्त दीन हो रहा हूँ; मधुसूदन ! मुझे अपने हाथका सहारा दीजिये।
संसारकाननमवरं बहुदुःखवृक्षैः संसेव्यमानमपि मोहमयैश्च सिंहैः । संदीप्तमस्ति करुणाबहुवह्नितेजः संतप्यमानमनसं परिपाहि कृष्ण ॥
यह संसार एक महान् वन है, इसमें बहुत-से दुःख ही वृक्षरूपमें स्थित हैं। मोहरूपी सिंह इसमें निर्भय होकर निवास करते हैं; इसके भीतर शोकरूपी प्रचण्ड दावानल प्रज्वलित हो रहा है, जिसकी आँचसे मेरा चित्त सन्तप्त हो उठा है। कृष्ण ! इससे मुझे बचाइये।
संसारवृक्षमतिमतीर्णमपीह उघं मायासुकन्दकरुणाबहुदुःखशाखम् । जायादिसद्बछदनं फलितं मुरारे तं चाधिरूढपतितं भगवन् हि रक्ष ॥
संसार एक वृक्षके समान है, यह अत्यन्त पुराना होनेके साथ बहुत ऊँचा भी है; माया इसकी जड़ है, शोक तथा नाना प्रकारके दुःख इसकी शाखाएँ हैं, पत्नी आदि परिवारके लोग पत्ते हैं और इसमें अनेक प्रकारके फल लगे हैं। मुरारे ! मैं इस संसार-वृक्षपर चढ़कर गिर रहा हूँ; भगवन् ! इस समय मेरी रक्षा कीजिये—मुझे बचाइये।
दुःखानलैर्विविधमोहगयैः सुधूमैः शोकैर्वियोगमरणान्तकसंनिभैश्च । दग्धोऽस्मि कृष्ण सततं मम देहि मोक्षं ज्ञानाम्बुनाथ परिषिच्य सदैव मां त्वम् ॥
कृष्ण ! मैं दुःखरूपी अग्नि, विविध प्रकारके मोहरूपी धुएँ तथा वियोग, मृत्यु और कालके समान