भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 287

२७० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


रहती है; मैं सदा उन्हींके लिये तपस्या किया करती हूँ।
मैं अपने धर्ममार्गपर स्थित थी, किन्तु तूने माया रचकर
मेरे धर्मके साथ ही मुझे भी नष्ट कर दिया। इसलिये रे
दुष्ट ! तुझे भी मैं भस्म कर डालूँगी।
गोभिल बोला— राजकुमारी! यदि उचित
समझो तो सुनो; मैं धर्मकी ही बात कह रहा हूँ। जो स्त्री
प्रतिदिन मन, वाणी और क्रियाद्वारा अपने स्वामीकी सेवा
करती है, पतिके संतुष्ट रहनेपर स्वयं भी संतोषका
अनुभव करती है, पतिके क्रोधी होनेपर भी उसका त्याग
नहीं करती, उसके दोषोंकी ओर ध्यान नहीं देती, उसके
मारनेपर भी प्रसन्न होती है और स्वामीके सब कामोंमें
आगे रहती है, वही नारी पतिव्रता कही गयी है। यदि स्त्री
इस लोकमें अपना कल्याण करना चाहती हो तो वह
पतित, रोगी, अङ्गहीन, कोढ़ी, सब धर्मोंसे रहित तथा
पापी पतिका भी परित्याग न करे। जो स्वामीको छोड़कर
जाती और दूसरे-दूसरे कामोंमें मन लगाती है, वह
संसारमें सब धर्मोंसे बहिष्कृत व्यभिचारिणी समझी जाती
है। जो पतिकी अनुपस्थितिमें लोलुपतावश ग्राम्य-भोग
तथा शृङ्गारका सेवन करती है, उसे मनुष्य कुलटा कहते
हैं। मुझे वेद और शास्त्रोंद्वारा अनुमोदित धर्मका ज्ञान है।
गृहस्थ-धर्मका परित्याग करके पतिकी सेवा छोड़कर
यहाँ किसलिये आयीं? इतनेपर भी अपने ही मुँहसे
कहती हो—मैं पतिव्रता हूँ। कर्मसे तो तुममें पातिव्रत्यका
लेशमात्र भी नहीं दिखायी देता। तुम डर-भय छोड़कर
पर्वत और वनमें मतवाली होकर घूमती-फिरती हो,
इसलिये पापिनी हो। मैंने यह महान् दण्ड देकर तुम्हें
सीधी राहपर लगाया है—अब कभी तुमसे ऐसी धृष्टता
नहीं हो सकती। बताओ तो, पतिको छोड़कर किसलिये
यहाँ आयी हो? यह शृङ्गार, ये आभूषण तथा यह
मनोहर वेष धारण करके क्यों खड़ी हो? पापिनी ! बोलो
न, किसलिये और किसके लिये यह सब किया है?
कहाँ है तुम्हारा 'पातिव्रत्य ? दिखाओ तो मेरे सामने।
व्यभिचारिणी स्त्रियोंके समान बर्ताव करनेवाली नारी !
तुम इस समय अपने पतिसे चार सौ कोस दूर हो; कहाँ
है तुममें पतिको देवता माननेका भाव। दुष्ट कहींकी !
तुम्हें लाज नहीं आती, अपने बर्तावपर घृणा नहीं होती?
तुम क्या मेरे सामने बोलती हो। कहाँ है तुम्हारी
तपस्याका प्रभाव। कहाँ है तुम्हारा तेज और बल। आज
ही मुझे अपना बल, वीर्य और पराक्रम दिखाओ।
पद्मावती बोली— ओ नीच असुर ! सुन; पिताने
स्नेहवश मुझे पतिके घरसे बुलाया है, इसमें कहाँ पाप
है। मैं काम, लोभ, मोह तथा डाहके वश पतिको
छोड़कर नहीं आयी हूँ; मैं यहाँ भी पतिका चिन्तन करती
हुई ही रहती हूँ। तुमने भी छलसे मेरे पतिका रूप धारण
करके ही मुझे धोखा दिया है।
गोभिलने कहा— पद्मावती ! मेरी युक्तियुक्त बात
सुनो। अंधे मनुष्योंको कुछ दिखायी नहीं देता; तुम
धर्मरूपी नेत्रसे हीन हो, फिर कैसे मुझे यहाँ पहचान
पातीं। जिस समय तुम्हारे मनमें पिताके घर आनेका भाव
उदय हुआ, उसी समय तुम पतिकी भावना छोड़कर
उनके ध्यानसे मुक्त हो गयी थीं। पतिका निरन्तर चिन्तन
ही सतियोंके ज्ञानका तत्त्व है। जब वही नष्ट हो गया,
जब तुम्हारे हृदयकी आँख ही फूट गयी, तब ज्ञान-नेत्रसे
हीन होनेपर तुम मुझे कैसे पहचानतीं।
ब्राह्मणी कहती है— प्राणनाथ ! गोभिलकी बात
सुनकर राजकुमारी पद्मावती धरतीपर बैठ गयी। उसके
हृदयमें बड़ा दुःख हो रहा था। गोभिलने फिर कहा—
'शुभे ! मैंने तुम्हारे उदरमें जो अपने वीर्यकी स्थापना की
है, उससे तीनों लोकोंको त्रास पहुँचानेवाला पुत्र उत्पन्न
होगा।' यों कहकर वह दानव चला गया। गोभिल बड़ा
दुराचारी और पापात्मा था। उसके चले जानेपर पद्मावती
महान् दुःखसे अभिभूत होकर रोने लगी। रोनेका शब्द
सुनकर सखियाँ उसके पास दौड़ी आयीं और पूछने
लगीं—'राजकुमारी! रोती क्यों हो? मथुरानरेश
महाराज उग्रसेन कहाँ चले गये?' पद्मावतीने अत्यन्त
दुःखसे रोते-रोते अपने छले जानेकी सारी बात बता दी।
सहेलियाँ उसे पिताके घर ले गयीं। उस समय वह
शोकसे कातर हो थर-थर काँप रही थी। सखियोंने
पद्मावतीकी माताके सामने सारी घटना कह दी। सुनते
ही महारानी अपने पतिके महलमें गयीं और उनसे

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