पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 294, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिखण्ड ] * सुकलाका सतीत्व नष्ट करनेके लिये इन्द्र और काम आदिकी कुचेष्टा * २७७ *****************************************************************************************************
इन सबके भीतर मैं उक्त कुटुम्बियोंके साथ वास करता हूँ। जो जगत्के स्वामी, त्रिशूलधारी, वृषभवाहन तथा साक्षात् ईश्वर हैं, वे कल्याणमय भगवान् शिव भी मेरे निवास-स्थान हैं। कृकल वैश्यकी प्रियतमा भार्या मङ्गलमयी सुकला भी मेरा उत्तम गृह है; किन्तु आज पापी काम इसे भी जला डालनेको उद्यत हुआ है। ये बलवान् इन्द्र भी कामका साथ दे रहे हैं; कामकी ही करतूतसे अहल्याका सङ्ग करनेपर एक बार जो हानि उठानी पड़ी है, उस प्राचीन घटनाका इन्हें स्मरण क्यों नहीं होता। सतीके सतीत्वका नाश करनेसे ही इन्हें महान् दुःखमें पड़कर दुःसह शापका उपभोग करना पड़ा था। फिर भी आज कामदेवके साथ आकर ये धर्मचारिणी कृकल-पत्नी सुकलाका अपहरण करनेको उतारू हुए हैं।'
धर्मने कहा—मैं कामका तेज कम कर दूँगा; [मैं यदि चाहूँ तो] उसकी मृत्युका भी कारण उपस्थित कर सकता हूँ। मैंने एक ऐसा उपाय सोच लिया है, जिससे यह काम आज ही भाग खड़ा होगा। यह महाप्रज्ञा पक्षिणीका रूप धारण करके सुकलाके घर जाय और अपने मङ्गलमय शब्दसे उसको स्वामीके शुभागमनकी सूचना दे।
धर्मके भेजनेसे प्रज्ञा सुकलाके घरमें गयी और वहाँ मङ्गलजनक शब्दका उच्चारण किया। सुकलाने धूप-गन्ध आदिके द्वारा उसका समादर और पूजन किया तथा सुयोग्य ब्राह्मणको बुलाकर पूछा—'इस शकुनका क्या तात्पर्य है ? मेरे पतिदेव कब आयेंगे ?'
ब्राह्मणने कहा— भद्रे ! यह शकुन तुम्हारे स्वामीके शुभागमनकी सूचना दे रहा है। वे सात दिनसे पहले-पहले यहाँ अवश्य आ जायँगे। इसमें अन्तर नहीं हो सकता।
ब्राह्मणका यह मङ्गलमय वचन सुनकर सुकलाको बड़ी प्रसन्नता हुई।
उधर कामदेवकी भेजी हुई क्रीड़ा सती-स्त्रीका रूप धारण करके उस सुन्दरी पतिव्रताके घर गयी। उस रूपवती नारीको आयी देख सुकलाने आदरयुक्त वचन कहकर उसका सम्मान किया और अपनेको धन्य माना। उसकी पुण्यमयी वाणीसे पूजित होकर क्रीड़ा मुसकराती हुई बातचीत करने लगी। उसका मायामय वचन विश्वको मोहित करनेवाला था। सुननेपर सत्य और विश्वासके योग्य जान पड़ता था। क्रीड़ा बोली—'देवि ! मेरे स्वामी बड़े बलवान्, गुणज्ञ, धीर तथा अत्यन्त पुण्यात्मा हैं; परन्तु मुझे छोड़कर न जाने कहाँ चले गये हैं। वह मेरे पूर्वजन्मके कर्मोंका फल है, जो आज इस रूपमें सामने आया है; मैं कैसी मन्दभागिनी हूँ। महाभागे ! नारियोंके लिये रूप, सौभाग्य, शृङ्गार, सुख और सम्पत्ति—सब कुछ पति ही है; यही शास्त्रोंका मत है।'
पतिव्रता सुकलाने क्रीड़ाकी ये सारी बातें सुनीं। उसे विश्वास हो गया कि यह सब कुछ इस दुःखिनी नारीके हृदयका सच्चा भाव है। वह उसके दुःखसे दुःखी हो गयी, और अपनी बातें भी उसे बताने लगी। उसने पहलेका अपना सारा हाल थोड़ेमें कह सुनाया। अपने दुःख-सुखकी बात बताकर मनस्विनी सुकला चुप हो गयी; तब क्रीड़ाने उस पतिव्रताको सान्त्वना दी और बहुत कुछ समझाया-बुझाया। तदनन्तर एक दिन उसने सुकलासे कहा—'सखी ! देखो, वह सामने बड़ा सुन्दर वन दिखायी दे रहा है; अनेकों दिव्य वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वहाँ एक परम पवित्र पापनाशन तीर्थ है; वरानने ! चलो, हम दोनों भी वहाँ पुण्य-सञ्चय करनेके लिये चलें।'
यह सुनकर सुकला उस मायामयी स्त्रीके साथ वहाँ जानेको राजी हो गयी। उसने वनमें प्रवेश करके देखा तो उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो उसमें नन्दन-वनकी शोभा उतर आयी है। सभी ऋतुओंके फूल खिले थे; सैकड़ों कोकिलोंके कलरवसे सारा वन-प्रान्त गूँज रहा था। माधवी लता और माधव (वसन्त) ने उस उपवनकी शोभाको सब भावोंसे परिपूर्ण बनाया था ! सुकलाको मोहित करनेके लिये ही उसकी सृष्टि की गयी थी। उसने क्रीड़ाके साथ सबके मनको भानेवाले उस वनमें घूम-घूमकर अनेकों दिव्य कौतुक देखे। इसी समय रतिके साथ काम और इन्द्र भी वहाँ आये। इन्द्र सम्पूर्ण भोगोंके अधिपति होकर भी काम-क्रीडाके लिये व्यग्र थे। उन्होंने कामदेवको पुकारकर कहा—'लो, यह सुकला आ