पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ]
हैं। व्यास तथा मार्कण्डेय उनके स्वरूपको जानते हैं।
अब मैं भगवान्के अर्वाचीन रूपका वर्णन करूँगा, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। 'जिस समय सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा प्रजापति ब्रह्माजी स्वयं ही सबका संहार करके श्रीभगवान्के स्वरूपमें स्थित होते हैं और भगवान् श्रीजनार्दन उन्हें अपनेमें लीन करके पानीके भीतर शेषनागकी शय्यापर दीर्घकालतक अकेले सोये रहते हैं, उस समयकी बात है। महामुनि मार्कण्डेयजी जल और अन्धकारसे व्याकुल हो इधर-उधर भटक रहे थे। उन्होंने देखा सर्वव्यापी ईश्वर शेषनागकी शय्यापर सो रहे हैं। उनका तेज करोड़ों सूर्योंके समान जान पड़ता है। वे दिव्य आभूषण, दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण किये योगनिद्रामें स्थित हैं। उनका श्रीविग्रह बड़ा ही कमनीय है। उनके हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा विराजमान हैं।* उनके पास ही उन्होंने एक विशालकाय स्त्री देखी, जो काली अञ्जन-राशिके समान थी। उसका रूप बड़ा भयंकर था। उसने मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेयसे कहा—'महामुने ! डरो मत।' तब उन योगीश्वरने पूछा—'देवि! तुम कौन हो?' मुनिके इस प्रकार पूछनेपर देवीने बड़े आदरके साथ कहा—'ब्रह्मन् ! जो शेषनागकी शय्यापर सो रहे हैं, वे भगवान् श्रीविष्णु हैं। मैं उन्हींकी वैष्णवी शक्ति कालरात्रि हूँ।'
पिप्पलजी ! यों कहकर वह देवी अन्तर्धान हो गयी। उसके चले जानेपर मार्कण्डेयजीने देखा—भगवान्की नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ, जिसकी कान्ति सुवर्णके समान थी। उसीसे महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। फिर ब्रह्माजीसे समस्त चराचर प्राणी, इन्द्रादि लोकपाल तथा अग्नि आदि देवताओंका जन्म हुआ। इस प्रकार मैंने यह अर्वाचीनका स्वरूप बतलाया है। अर्वाचीन रूप शरीरधारी है और पराचीन रूप शरीररहित है, अतः ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता अर्वाचीन हैं। ये लोक भी, जो तीनों भुवनोंमें स्थित हैं, अर्वाचीन ही माने गये हैं। विद्याधर ! मोक्षरूप जो परम स्थान है; जिसे परब्रह्म कहते हैं, जो अव्यक्त, अक्षर, हंसस्वरूप, शुद्ध और सिद्धियुक्त है, वही पराचीन है।† इस प्रकार तुम्हारे सामने पराचीन स्वरूपका वर्णन किया गया।
विद्याधरने पूछा— सुव्रत ! आप अर्वाचीन और पराचीन स्वरूपके विद्वान् हैं। तीनों लोकोंका उत्तम ज्ञान आपमें वर्तमान है। फिर भी मैं आपमें तपस्याकी पराकाष्ठा नहीं देखता। ऐसी दशामें आपके इस प्रभावका क्या कारण है? कैसे आपको सब बातोंका ज्ञान प्राप्त हुआ ?
सुकर्माने कहा— ब्रह्मन् ! मैंने यजन-याजन, धर्मानुष्ठान ज्ञानोपार्जन और तीर्थ-सेवन—कुछ भी नहीं किया। इनके सिवा और भी किसी शुभकर्मजनित पुण्यका अर्जन मेरे द्वारा नहीं हुआ। मैं तो स्पष्टरूपसे एक ही बात जानता हूँ—वह है पिता और माताकी सेवा-पूजा। पिप्पल ! मैं स्वयं ही अपने हाथसे माता-पिताके चरण धोनेका पुण्यकार्य करता हूँ। उनके शरीरकी सेवा करता तथा उन्हें स्नान और भोजन आदि कराता हूँ। प्रतिदिन तीनों समय माता-पिताकी सेवामें ही लगा रहता हूँ। जबतक मेरे माँ-बाप जीवित हैं, तबतक मुझे यह अतुलनीय लाभ मिल रहा है कि तीनों समय
सर्वं पश्यति वै कर्म कृतं त्रैलोक्यवासिनाम्। तेषामुक्तमकर्णश्च स शृणोति सुशान्तिदः ॥
................................... । पाणिहीनः पादहीनः कुरुते च प्रधावति ॥
(६२ । २८—३२)
* भ्रममाणः स ददर्श शेषपर्यङ्कशायिनम्। सूर्यकोटिप्रतीकाशं दिव्याभरणभूषितम् ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं सर्वव्यापिनमीश्वरम्। योगनिद्रागतं कान्तं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥
(६२ । ३९-४०)
† मोक्षरूपं परं स्थानं परब्रह्मस्वरूपकम् । अव्यक्तमक्षरं हंसं शुद्धं सिद्धिसमन्वितम् ॥
(६२ । ५३)