पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण ]
पीड़ित मनुष्यको मंत्र, तप, दान, मित्र और बन्धु-बान्धव—कोई भी नहीं बचा सकते। विवाह, जन्म और मृत्यु—ये कालके रचे हुए तीन बन्धन हैं। ये जहाँ, जैसे और जिस हेतुसे होनेको होते हैं, होकर ही रहते हैं; कोई मेट उन्हें नहीं सकता।* उपद्रव, आघातदोष, सर्प और व्याधियाँ—ये सभी कर्मसे प्रेरित होकर मनुष्यको प्राप्त होते हैं। आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँच बातें जीवके गर्भमें रहते समय ही रच दी जाती हैं।† जीवको देवत्व, मनुष्यत्व, पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनियाँ और स्थावर योनि—ये सब कुछ अपने-अपने कर्मानुसार ही प्राप्त होते हैं।‡ मनुष्य जैसा करता है, वैसा भोगता है; उसे अपने किये हुएको ही सदा भोगना पड़ता है। वह अपना ही बनाया हुआ दुःख और अपना ही रचा हुआ सुख भोगता है। जो लोग अपने धन और बुद्धिसे किसी वस्तुको अन्यथा करनेकी युक्ति रखते हैं, वे भी अपने उपार्जित सुख-दुःखोंका उपभोग करते हैं। जैसे बछड़ा हजारों गौओंके बीचमें खड़ी होनेपर भी अपने माताको पहचानकर उसके पास पहुँच जाता है, उसी प्रकार पूर्व-जन्मके किये हुए शुभाशुभ कर्म कर्ताका अनुसरण करते हैं। पहलेका किया हुआ कर्म कर्ताके सोनेपर उसके साथ ही सोता है, उसके खड़े होनेपर खड़ा होता है और चलनेपर पीछे-पीछे चलता है। तात्पर्य यह कि कर्म छायाकी भाँति कर्ताके साथ लगा रहता है। जैसे छाया और धूप सदा एक-दूसरेसे सम्बद्ध होते हैं, उसी प्रकार कर्म और कर्ताका भी परस्पर सम्बन्ध है। शस्त्र, अग्नि, विष आदिसे जो बचाने योग्य वस्तु है, उसको भी दैव ही बचाता है। जो वास्तवमें अरक्षित वस्तु है, उसकी दैव ही रक्षा करता है। दैवने जिसका नाश कर दिया हो, उसकी रक्षा नहीं देखी जाती। यह मेरे पूर्वकर्मोंका परिणाम ही है, दूसरा कुछ नहीं है। इस स्त्रीके रूपमें दैव ही यहाँ आ पहुँचा है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। मेरे घरमें जो नाटक खेलनेवाले नट और नर्तक आये थे, उन्हींके सङ्गसे मेरे शरीरमें जरावस्थाने प्रवेश किया है। इन सब बातोंको मैं अपने कर्मोंका ही परिणाम मानता हूँ।'
इस प्रकारकी चिन्तामें पड़कर राजा ययाति बहुत दुःखी हो गये। उन्होंने सोचा—'यदि मैं प्रसन्नतापूर्वक इसकी बात नहीं मानूँगा तो मेरे सत्य और धर्म—दोनों ही चले जायँगे, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जैसा कर्म मैंने किया था, उसके अनुरूप ही फल आज दृष्टिगोचर हुआ है। यह निश्चित बात है कि दैवका विधान टाला नहीं जा सकता है।'
इस तरह सोच-विचारमें पड़े हुए राजा ययाति सबके क्लेश दूर करनेवाले भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। उन्होंने मन-ही-मन भगवान् मधुसूदनका ध्यान और नमस्कारपूर्वक स्तवन किया तथा कातरभावसे कहा—'लक्ष्मीपते! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मेरा उद्धार कीजिये।'
**सुकर्मा कहते हैं—**परम धर्मात्मा राजा ययाति इस प्रकार चिन्ता कर ही रहे थे कि रतिकुमारी देवी अश्रुबिन्दुमतीने कहा—'राजन्! अन्यान्य प्राकृत मनुष्योंकी भाँति आप दुःखपूर्ण चिन्ता कैसे कर रहे हैं। जिसके कारण आपको दुःख हो, वह कार्य मुझे कभी नहीं करना है।' उसके यों कहनेपर राजाने उस वराङ्गनासे कहा—'देवि! मुझे जिस बातकी चिन्ता हुई है, उसे बताता हूँ; सुनो। मेरे स्वर्ग चले जानेपर सारी प्रजा दीन
* न मन्त्रा न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः। शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम्॥
त्रयः कालकृताः पाशाः शक्यन्ते न निवर्तितुम्। विवाहो जन्म मरणं यथा यत्र च येन च॥
(८९। ३३-३४)
† पञ्चैतानि विसृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः। आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च॥
(८९। ४१)
‡ देवत्वमथ मानुष्यं पशुत्वं पक्षि ता तथा। तिर्यक्त्वं स्थावरत्वं च प्राप्यते वै स्वकर्मभिः॥
(८९। ४३)