भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

भूमिखण्ड ] * कुञ्जल पक्षी और उसके पुत्र कपिञ्जलका संवाद * ३२५


दुःख और संताप होता है। जो पापात्मा एक बार भी उस तरहके फूलोंसे देवताओंकी पूजा करता है, उसे वे निश्चय ही दुःख देते हैं।

भगवान् श्रीविष्णुने पापी विहुण्डके पराक्रम और दुःसाहसपर दृष्टि डालकर देवर्षि नारदको उसके पास भेजा। उस समय वह दुरात्मा दानव कामोदाके पास जा रहा था। नारदजी उसके समीप जाकर हँसते हुए बोले—'दैत्यराज ! कहाँ जा रहे हो ? इस समय तुम बड़े उतावले और व्यग्र जान पड़ते हो।' विहुण्डने ब्रह्मकुमार नारदजीको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा—'द्विजश्रेष्ठ ! मैं कामोद पुष्पके लिये चला हूँ।' यह सुनकर नारदजीने कहा—'दैत्य ! तुम कामोद नामक श्रेष्ठ नगरमें कदापि न जाना; क्योंकि वहाँ सम्पूर्ण देवताओंको विजय दिलानेवाले परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीविष्णु रहते हैं। दानव ! जिस उपायसे कामोद नामक फूल तुम्हारे हाथ लग सकते हैं, वह मैं बता रहा हूँ। वे दिव्य पुष्प गङ्गाजीके जलमें गिरेंगे और प्रवाहके पावन जलके साथ बहते हुए तुम्हारे पास आ जायेंगे। वे देखनेमें बड़े सुन्दर होंगे। तुम उन्हें पानीसे निकाल लाना। इस प्रकार उन फूलोंका संग्रह करके अपना मनोरथ सिद्ध करो।'

दानवश्रेष्ठ विहुण्डसे यह कहकर धर्मात्मा नारदजी कामोद नगरकी ओर चल दिये। जाते-जाते उन्हें वह दिव्य नगर दिखायी दिया। उस नगरमें प्रवेश करके वे कामोदाके घर गये और उससे मिले। कामोदाने स्वागत आदिके द्वारा मुनिको प्रसन्न किया और मीठे वचनोंमें कुशलसमाचार पूछा। द्विजश्रेष्ठ नारदजीने कामोदाके दिये हुए दिव्य सिंहासनपर बैठकर उससे पूछा—'भगवान् श्रीविष्णुके तेजसे प्रकट हुई कल्याणमयी देवी ! तुम यहाँ सुखसे रहती हो न ? किसी तरहका कष्ट तो नहीं है ?'

कामोदा बोली—महाभाग ! मैं आप-जैसे महात्माओं तथा भगवान् श्रीविष्णुकी कृपासे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही हूँ। इस समय आपसे कुछ प्रश्नोत्तर करनेका कारण उपस्थित हुआ है; आप मेरे प्रश्नका समाधान कीजिये। मुने ! सोते समय मैंने एक दारुण स्वप्न देखा है, मानो किसीने मेरे सामने आकर कहा है—'अव्यक्तस्वरूप भगवान् हृषीकेश संसारमें जायँगे—वहाँ जन्म ग्रहण करेंगे।' महामते ! ऐसा स्वप्न देखनेका क्या कारण है ? आप ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ हैं, कृपया बताइये।

नारदजीने कहा—भद्रे ! मनुष्य जो स्वप्न देखते हैं, वह तीन प्रकारका होता है—वातिक (वातज), पैत्तिक (पित्तज) और कफज। सुन्दरी ! देवताओंको न नींद आती है न स्वप्न। मनुष्य शुभ और अशुभ नाना प्रकारके स्वप्न देखता है। वे सभी स्वप्न कर्मसे प्रेरित होकर दृष्टिपथमें आते हैं। पर्वत तथा ऊँचे-नीचे नाना प्रकारके दुर्गम स्थानोंका दर्शन होना वातिक स्वप्न है। अब कफाधिक्यके कारण दिखायी देनेवाले स्वप्न बता रहा हूँ। जल, नदी, तालाब तथा पानीके विभिन्न स्थान—ये सब कफज स्वप्नके अन्तर्गत हैं। देवि ! अग्नि तथा बहुत-से उत्तम सुवर्णका जो दर्शन होता है, उसे पैत्तिक स्वप्न समझो। अब मैं भावी (भविष्यमें तुरंत फल देनेवाले) स्वप्नका वर्णन करता हूँ—प्रातःकाल जो कर्मप्रेरित शुभ या अशुभ स्वप्न दिखायी देता है, वह क्रमशः लाभ और हानिको व्यक्त करनेवाला है। सुन्दरी ! इस प्रकार मैंने तुमसे स्वप्नकी अवस्थाएँ बतायीं। भगवान् श्रीविष्णुके सम्बन्धमें यह बात अवश्य होनेवाली है, इसी कारण तुम्हें दुःस्वप्न दिखायी दिया है।

कामोदा बोली—नारदजी ! सम्पूर्ण देवता भी जिनका अन्त नहीं जानते, उन्हें भी जिनके स्वरूपका ज्ञान नहीं है, जिनमें सम्पूर्ण विश्वका लय होता है, जिन्हें विश्वात्मा कहते हैं और सारा संसार जिनकी मायासे मुग्ध हो रहा है, वे मेरे स्वामी जगदीश्वर श्रीविष्णु संसारमें क्यों जन्म ले रहे हैं ?

नारदजीने कहा—देवि ! इसका कारण सुनो; महर्षि भृगुके शापसे भगवान् संसारमें अवतार लेनेवाले हैं। [यही बात बतानेके लिये उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।] इसीलिये तुम्हें दुःस्वप्नका दर्शन हुआ है।

बेटा ! यों कहकर नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये।